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शुक्रवार, 22 सितंबर 2023

लक्ष्मी जी सदा सहाय...?

 

सुरेश सर्वेद

व्यापार से जुड़े रहने के बावजूद लक्ष्मीनारायण की आर्थिक स्थिति ज्यों की त्यों थी. उसे आश्चर्य तो उस समय हुआ जब उसके पुत्र महायज्ञ का पत्र आया.उसमें महायज्ञ ने अपनी उन्नति का समाचार लिखा था.एक बार पत्र पर लक्ष्मीनारायण को विश्वास नहीं हुआ पर जब अपनी आंखों से देखा तो उसे पूरा विश्वास हो गया. उसने दीपावली के दिन धनलक्ष्मी से प्रश्न किया.धनलक्ष्मी के उत्तर से वह अवाक रह गया मगर जब वह धनलक्ष्मी के बताएं मार्ग पर चला तो आशा से अधिक सफलता पाई.

बीते चालीस वर्षों तक लक्ष्मीनारायण अपने पिता से रुष्ट था.इसका कारण यह था कि उसका नाम लक्ष्मीनारायण क्यों रखा गया ? उसका मत था कि लक्ष्मीनारायण उस व्यक्ति का नाम होना चाहिए जो वास्तव में लक्ष्मी का स्वामी हो. जबकि वह इतने दिनों तक मात्र नाम का लक्ष्मीनारायण था.

लक्ष्मीनारायण की गांव में किराने की दूकान थी.उसका लेन - देन साफ था.लोगों का उस पर पूरा विश्वास था.उसके साफ लेन - देन की वजह से आसपास के लोग भी उससे प्रभावित थे और आंख मूंद कर लेन - देन करते थे.लक्ष्मीनारायण शहर से वस्तु लाता. उसे बेचता. लाभ नहीं के बराबर निकालता.गाड़ी - भाड़ा और दो समय की रोटी के लायक ही लाभ कमाता था. लक्ष्मीनारायण के मन में कभी - कभी विचार उठता - वह अन्य व्यवसायियों की तरह मोटा ताजा क्यों नहीं बन पाया ? इतने परिश्रम के बावजूद वह बंगला - कार - मोटर का मालिक क्यों नहीं बन पाया ? धन भी संचय नहीं हुआ.रईसों का स्विस बैंक में खाता है उसका भारतीय बैंक में भी खाता क्यों नहीं है ?  इन सारे प्रश्नों का उत्तर ढूंढते - ढूंढते वह परेशान हो जाता.

लक्ष्मीनारायण जब भी शहर जाता, पूरे शहर की पदयात्रा करता.उसके कंधे पर बड़ी - बड़ी थैलियां होती.वह इस दूकान से उस दूकान जाकर सामान खरीदता. वह न तो होटल में खाता और नहीं विश्रांतिगृह में विश्राम करता. घर से निकलते समय उसकी पत्नी गंगोत्री जो भी भोज्य पदार्थ डिब्बे में डाल देती उसे वह खा लेता.कई बार उसकी इच्छा होटल में भोजन और विश्रांतिगृह में विश्राम करने की हुई पर उसकी इच्छा धरी की धरी रह गई. न तो वह पान - तम्बाखू खाता और न ही बीड़ी - सिगरेट फूंकता था. इतने त्याग के बावजूद वह कहने मात्र का व्यापारी था.

दान धर्म उसके जीवन का एक आवश्यक अंग था.कोई भी भिक्षुक उसके दहलीज से खाली हाथ नहीं लौटता.वह सत्यनारायण की पूजा करवाता और यज्ञों में भाग लेता. धार्मिकता की ओर झुकाव का कारण यह था कि वह अब तक पुत्र विहीन था. बिना पुत्र के मोक्ष असंभव है इस पर उसे अटल विश्वास था.वह पुत्र - प्राप्ति के लिए ही धार्मिक आयोजन में रुचि लेता था.

धर्म के प्रति झुकाव के कारण धर्म के ठेकेदार उसके घर पधारते. वे अपनी चिकनी - चुपड़ी बातों के द्वारा उसे फाँसते और मोटी रकम हड़प कर चले जाते. गला - थैली कटवाकर वह धर्म के ठेकेदारों का चरणामृत पान करता.

लक्ष्मीनारायण की पत्नी गंगोत्री उसकी ईमानदारी से चिढ़ी रहती. वह सदैव बाधा उत्पन्न कर देती. लक्ष्मीनारायण उसे ईमान और धरम की परिभाषा समझाता था .भविष्य में इनसे मिलने वाले फलों क ो बताता पर गंगोत्री की बुद्धि में उसकी बात नहीं समाती थी. गंगोत्री कहती - देखो जी, तुम इस तरह दोनों हाथों से लुटाते रहे तो निश्चय है हमें एक दिन भूखों मरना पड़ेगा.

- तुम व्यर्थ बातें करती हो गंगोत्री । लक्ष्मीनारायण कहता.

- व्यर्थ नहीं सत्य कहती हूं. विश्वास न हो तो आजमा कर देख लो.

- क्या मिलावट - बेईमानी करुं ? नहीं, मुझसे ये सब नहीं हो सकता. मैं लोगों की आँखों में धूल नहीं झोंक सकता.

- इसमें आँख में धूल झोंकने की क्या बात है ? सभी व्यापारी लोगों की आंखों में धूल झोंकते हैं ?

- अन्य व्यापारी निर्वस्त्र नाचें इससे हमें क्या, मात्र रुपयों के लिए हम अपनी विश्वनीयता नहीं खो सकते .

- फिर रहो जीवन पर्यन्त फिसड्डी की फिसड्डी. तुम कभी पनप नहीं सकते .४

गंगोत्री की यही भविष्यवाणी होती.लक्ष्मीनारायण उसकी बातों में नहीं आता. गंगोत्री झल्लाकर मौन धारण कर लेती.

गंगोत्री तब फिर उग्र हो जाती जब लक्ष्मीनारायण दान करता. वह कहती - इन मुसन्डों को क्यों खिलाते - पिलाते हो ? हमारी मेहनत की कमाई ये खाये मुझे पसंद नहीं.

- ओहो, तुम समझती क्यों नहीं. इससे स्वर्ग का रास्ता खुलता है ? लक्ष्मीनारायण कहता.

- हूंह, स्वर्ग का रास्ता क्या खाक खुलेगा. हां, हमें भिखमंग्गों की भीड़ को प्रवेश कराने के लिए हमें दो चार दरवाजें और बनवाने होंगे .

- तुम नासमझ हो,ये भिखमंग्गे नहीं, योगी है ज्ञानी है .

- खूब समझती हूं, ज्ञानी - योगी हलूवा पूरी देखकर लार नहीं टपकाते.

इस तरह दोनों में झड़पें होती रहती.

संयोग ही कहा जाए कि जिस वर्ष लक्ष्मीनारायण ने यज्ञ कराया, उसी वर्ष गंगोत्री गर्भवती हो गई. लक्ष्मीनारायण ने इसे यज्ञ की देन माना.पत्नी ने एक पुत्र को जन्म दिया. लक्ष्मीनारायण ने उसका नाम महायज्ञ रख दिया.

महायज्ञ का रंग लुभावना था.वह चंद्रमा की तरह बढ़ता गया. वह मेहनती निकला. पढ़ाई - लिखाई में भी होशियार था.उसने गांव की माध्यमिक शाला से आठवीं उत्तीर्ण कर ली.अब आगे की पढ़ाई करनी थी.अतः उच्च शिक्षा के लिए शहर चला गया.

शहर की गलियों में कदम रखते ही महायज्ञ को दुनियादारी की बातें मालूम होने लगी. लक्ष्मीनारायण जिन व्यापारियों से वस्तु खरीदता था उसके पुत्रों से महायज्ञ की जान पहचान हो गई. परिचय से मित्रता बढ़ गयी. महायज्ञ को जितने रुपए की आवश्यकता होती लक्ष्मीनारायण तत्काल भेज देता. महायज्ञ मित्रों के साथ भरपूर रुपयों का दुरुपयोग करता. जब लक्ष्मीनारायण को जानकारी हुई तो उसने तत्काल रुपये भेजना बंद कर दिया.अकस्मात् कटौती से महायज्ञ हड़बड़ा गया.

लक्ष्मीनारायण अब महायज्ञ से नाराज रहने लगा. दरअसल उसक े कानों तक खबर पहुंच चुकी थी कि महायज्ञ अवैध कार्य करने लगा है.एक दिन महायज्ञ के पास जाकर उसे बहुत डाँटा - फटकारा. गंगोत्री को खबर लगी तो वह अत्यधिक प्रसन्न हुई कि चलो, पति नहीं तो पुत्र तो रुपये कमाने का गुन सीख लिया.

महायज्ञ की बिगड़ती आदत से लक्ष्मीनारायण परेशान रहने लगा. उसकी आदत सुधर जाये यह विचार कर उसने पूजा - पाठ करवाया. दान - दक्षिणा दिया लेकिन महायज्ञ की आदत में परिवर्तन नहीं आया. अब लक्ष्मीनारायण का मन पुनः यज्ञ कराने की ओर गया.

लक्ष्मीनारायण चर्चित आचार्य का पता करने लगा. उन दिनों आचार्य सदानंद की खूब चर्चा थी. लक्ष्मीनारायण उनके चरण कमल में गिर यज्ञ कर देने की प्रार्थना की. सदानंद ने एक लाख रुपये की मांग की. एक लाख की बात सुन कर लक्ष्मीनारायण का कलेजा मुंह में आ गया. वह कुछ कटौती करने गिड़गिड़ाने लगा. आचार्य सदानंद अटल रहे. उन्हें तटस्थ देख लक्ष्मीनारायण अपना सा मुंह लिए वापस लौट गया.

इसकी खबर ग्रामीणों को मिली. लक्ष्मीनारायण सम्माननीय तो था ही ग्रामीणों ने चंदा एकत्रित कर आचार्य को बुलाने की सोची. इससे ग्रामीण भी अपना लाभ समझे कि धर्म के पन्ने पर उनका भी नाम अंकित हो जायेगा.

चंदा की रकम एकत्रित हुई.आचार्य सदानंद को गांव में लाया गया. उनका आदर सत्कार किया गया. उनके साथ चेले - चपाटों की भीड़ थी.

दिन - तिथि बांधी गई और निश्चित दिन से यज्ञ शुरु हो गया. यह यज्ञ सात दिनों तक चला. सातवें दिन आचार्य को दक्षिणा के रुपये दिए गए. इसकी खबर महायज्ञ को लग गई. वह ठीक समय पर गांव पहुंचा और उसने ऐसा नाटक खेला कि पूरा गांव दंग रह गया.

महायज्ञ आते ही आचार्य के चरणों पर गिरा फिर लक्ष्मीनारायण के चरणों पर गिरा. अपने कृत्यों के लिए क्षमा मांगी. कहा - भविष्य में मैं आपकी आज्ञा की अवहेलना नहीं करुंगा. लक्ष्मीनारायण ने इसे यज्ञ का प्रताप माना. उसने आचार्य को दो हजार अलग से दान दिए.

यज्ञ की अंतिम रात थी.ग्रामीणों ने आचार्य से अनुरोध किया - आप रात भर काट लें , प्रातः चले जाएं. बहुत ना - नुकुर के बाद आचार्य रुकने तैयार हुए. ग्रामीणों ने रात में उनसे भजन - कीर्तन सुनने की इच्छा व्यक्त की.पहले आचार्य ने साफ अस्वीकार कर दिया क्योंकि वे मोटी रकम पा चुके थे. वे चाह रहे थे , तुरंत लौट जाएं . पर ग्रामीणों के बारम्बार अनुरोध ने उन्हें रात रुकने मजबूर कर दिया.

रात्रि का भोजन लक्ष्मीनारायण के घर बनाया गया. आचार्य चेले - चपेटियों के साथ भोजन पर बैठे. गांव के प्रतिष्ठित लोगों ने भी साथ दिया.आचार्य का ध्यान भोजन के समय भोजन पर कम रुपये से भरे बैग पर अधिक था. इसका अनुमान महायज्ञ ने लगा लिया.उसने कहा - आचार्य जी, आपका ध्यान भोजन पर कम, बैग पर अधिक है. आप बैग मुझे दे दीजिए. मैं उसे सुरक्षित स्थान पर रख दूंगा.वापस होते समय लौटा दूंगा.

आचार्य ने अस्वीकार कर दिया.महायज्ञ चुप हो गया.भोजनोपरांत भजन शुरु हुआ पर आचार्य की स्थिति भोजन के समय की तरह ही थी.अब की बार लक्ष्मीनारायण ने रुपये को सुरक्षित स्थान पर रख देने की बात कही.ग्रामीणों ने भी आग्रह किया.सबकी एक राय सुनकर आचार्य उनकी बात मान गये. उन्होंने रुपये लक्ष्मीनारायण को दे दिए.

भजन सुबह खत्म हुआ.रात भर सब भजन में इतने भाव - विभोर थे कि उन्हें स्वयं की सुधि नहीं रह गई थी.सूरज की किरणों ने जब ग्रामीणों को स्पर्श किया तो वे आलस्य से भर उठे. उन्हें नींद सताने लगी.वे एक एक कर अपने - अपने घर लौट गए. अंत में आचार्य,उनके चेले, लक्ष्मीनारायण तथा दो - तीन ग्रामीण शेष रह गये.

आचार्य और चेलों ने स्नान - ध्यान किया. उनके लौटने का समय आया तो लक्ष्मीनारायण रुपये वापस लाने तिजोरी के पास गया.तिजोरी खुली पड़ी थी.यह दृश्य देखकर लक्ष्मीनारायण का कंठ सूख गया.वह घबराया आचार्य के चरणों पर गिरा.आचार्य हड़बड़ाये पूछा - क्या बात है लक्ष्मीनारायण ... ?

- चोरी.... । लक्ष्मीनारायण इतना ही कह पाया.

चोरी की खबर गांव भर फैल में गई.अलसाये ग्रामीणों की निंद्रा उजड़ गई.खोजबीन की गई. अंत में पता लगा - महायज्ञ गांव से फरार है.

आचार्य ने इसे लक्ष्मीनारायण की चालाकी कहा.इससे ग्रामीण आचार्य पर बिगड़े.आखिर उनका लक्ष्मीनारायण की ईमानदारी पर अटूट विश्वास था.आचार्य की मनः स्थिति बिगड़ गई.उल्टा ग्रामीणों ने ही उन्हें चार सौ बीस की उपाधि दे डाली.ग्रामीणों ने आचार्य को चेले - चपाटियों समेत नजरबंदी बना लिया. वे मान बैठे कि आचार्य ने मंत्र के द्वारा महायज्ञ का अपहरण कर लिया है.साथ ही रुपये भी हड़प गये हैं.आचार्य बड़ी आफत में फंसे थे.लक्ष्मीनारायण ने उन्हें फटकारा - मैं कुछ नहीं जानता, मेरा पुत्र वापस लाओ वरना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा.. ।

आचार्य पर संकट का पहाड़ टूट पड़ा था.साथ ही चेलों पर भी. वे समझ नहीं पा रहे थे कि इस पहाड़ को कैसे हटाया जाए ? आचार्य ने ग्रामीणों से अनुरोध किया - पहले आसपास के गांव व महायज्ञ जिस शहर में पढ़ता था वहां पता कर लो फिर हम पर दोषारोपण करो.

ग्रामीणों ने ऐसा ही किया.आसपास के गांव का चप्पा - चप्पा छाना गया.शहर के कोने - कोने में पता लगाया गया.यहां तक कि लक्ष्मीनारायण के संबंधियों के घर भी पता लगाया गया पर महायज्ञ नहीं मिला.अब ग्रामीणों को पूर्ण विश्वास हो गया कि महायज्ञ को आचार्य ने ही अद्य्ष्य किया है.

ग्रामीणों ने जिनका चरणामृत पान किया था उन्हें ही उल्टा - सीधा कहने लगे. उन्हें लातें मारी,दाढ़ी - मूंछ खींची. उन पर खूब अत्याचार किया गया. आचार्य तथा उनके चेले - चपाटे किसी तरह प्राण बचाकर वहां से भागे...।

इस घटना के कुछ वर्षों बाद महायज्ञ का एक पत्र आया. उसमें उसने अपनी उन्नति के संबंध में लिखा था.पत्र पढ़कर लक्ष्मीनारायण अचम्भित रह गया कि उसका पुत्र क्या से क्या बन गया ? उन्नति के शिखर पर कैसे चढ़ गया ? उसे पत्र पर अविश्वास हुआ लेकिन जब अपनी आंखों से देखा तो विश्वास करना पड़ा.

वास्तव में महायज्ञ बहुत विकास कर चुका था. उसके पास नौकर - चाकर थे.आवास के लिए भवन हो गया था. चार पहिया गाड़ी हो चुकी थी. वह करोड़पति बन बैठा था.लक्ष्मीनारायण ने उसके विकास के रहस्य को जानना चाहा पर महायज्ञ ने नहीं बताया.

दीपावली की रात्रि लक्ष्मीनारायण ने धनलक्ष्मी की खूब पूजा - अर्चना की. उसे प्रसन्न करने मेवा - मिष्ठान्न चढ़ाया. लक्ष्मी उसके सेवा भाव से प्रसन्न हो प्रकट हुई.लक्ष्मीनारायण ने हाथ जोड़ कर पूछा - हे लक्ष्मी ! मुझसे ऐसा अन्याय क्यों ? मैंने जी -जान से तुम्हारी सेवा की पर तुमने मुझ पर कोई ध्यान नहीं दिया.आखिर मेरी गलती क्या है ? मां, मुझ पर नाराज क्यों हो ?

- वत्स, तुम व्यापारी अवश्य हो लेकिन तुममें व्यापारिक गुण नहीं. इसीलिए मैं तुम्हारे घर प्रवेश नहीं कर सकी. और तुम ज्यों की त्यों रहे .  लक्ष्मी ने उत्तर दिया.

- तुम क्या कह रही हो मां, मुझमें कौन सा व्यापारिक गुण नहीं है ?

- तुम्हारे पुत्र को देख लो. मैंने सिर्फ कुछ ही वर्षों में उसे क्या से क्या बना दिया. मुझे पाने के लिए ईमानदारी नहीं, बेईमानी चाहिए, शुद्धता नहीं मिलावट चाहिए.

- क्या ... ?  लक्ष्मीनारायण का मुंह आश्चर्य से खुल गया.

- आश्चर्य में मत पड़ो वत्स, विश्वास करो. तुम मेरे बताए पथ पर चल कर तो देखो... । और लक्ष्मी अद्य्ष्य हो गई.

लक्ष्मीनारायण का होश ठिकाने पर आ गया था. वह धनलक्ष्मी के बताये पथ पर चलने लगा. उसके घर लक्ष्मी की बरसात शुरु हो गई. ग्रामीणों को लक्ष्मीनारायण पर पूरा विश्वास था. इसका लक्ष्मीनारायण ने भरपूर लाभ उठाया....।

रविवार, 24 जुलाई 2016

सत्‍य से अनभिज्ञ

          सुरेश सर्वेद 

सरपंच  श्रीकांत एक पैर से लंगड़े थे . उनकी मुख्य  पोशाक चमड़े के काले जूते, बंगाली धोती थी। वे चलते तो जूतों से '' खट - खट '' की आवाज निकलती। मूंछें ऐंठी रहती। यही उनकी शान थी। चलते तो छाती तानकर जिसमें अभिमान की गठरी बंधी हुई होती। उनके चलने से धरती कांपने लग जाती थी फिर तो नौकरों का विसात ही क्‍या ? उनके जूतों की '' ठाप '' सुनते ही नौकर अपने - अपने कार्य में ऐसे रम जाते जैसे शिल्पकार तस्वीर में खो जाता है। वे जिसके पास से गुजरते, वह उन्हें सलामी अवश्य  बजाता।
          वे घर से निकलते ही राम राम, जय राम, नमस्कार जैसे संबोधन शब्‍द प्राप्त करने लगते । जिनमें से वे चलते - चलते ही कुछ लोगों को उत्तर दे पाते । जिसका अभिवादन के बदले अभिवादन नहीं मिलता, वह मनमसोस कर रह जाता। किसी में इतना साहस नहीं था कि अपना अपमान का प्रतिकार  कर सके । इसका कारण वे संपन्‍न कृषक थे । नेतागिरी भी वे करते थे । कई नौकर उनके घर पल रहे थे। थाने के थानेदार से लेकर अनेक नेताओं का उनके घर आना - जाना होता था। यहां एक और व्‍यक्ति था - रामगोपाल। वह भी श्रीकांत से कम नहीं था। उसकी भी खेती किसानी थी। नेतागिरी भी वह करता था। अथार्त गांव में उन दोनों के अतिरिक्‍त प्रभावशाली  तीसरा व्यक्ति कोई नहीं था । उन दोनों में अक्‍सर ठनी रहती। यही कारण था कि गांव का मजदूर भी दो भागों में बंट हुए थे। मजदूरों को भी उनके प्रतिव्‍दंदिता में मजा आता । एक से व्यवहार बिगड़ने के बाद मजदूर दूसरे के पास चला जाता । दोनों की अहमियत यह था कि वे जिसके विरूद्ध चाहे न्यायालय  में अपराध पंजीबद्ध करा सकते थे। मगर उनके विरूद्ध जो भी जाने का साहस करता उसकी दुगर्ति निश्चित होती। यह भी संभव हो जाता कि जो भी उनके विरूद्ध अपराध दर्ज कराने जाता थाने में उसे ही बिठा दिया जाता और उसके विरूद्ध ही कानूनी कायर्वाही शुरू हो जाती। यही कारण था कि लोग उनके अत्याचार सह कर भी उनके विरूद्ध जाने का साहस नहीं कर पाते थे।
           उन दिनों धान मिंजाई का कार्य चल रहा था। मजदूर रात भर दौरी हांकते और दिन भर धान ओसाते। उस दिन श्रीकांत खलिहान में आये। वे जिनके पास से निकले अभिवादन पाते गये। कुछ ही दूर जाकर उनके पैर ठहर गया। वहां पर सुमेर धान ओसा रहा था। वह श्रीकांत को देखे बगैर धान ओसा रहा था। श्रीकांत ने खांसा - खंखारा, आवाज सुनकर भी सुमेर अपने काम में व्यस्त रहा। यह तो श्रीकांत का अपमान था। एक अदना सा मजदूर उन्हें पास खड़े जानकर भी अनजान बना हुआ था। न दुआ, न सलाम। यह अपमान ही तो था। श्रीकांत तिलमिला गये। बौखला कर चीखे - सुमेर........?''
           सुमेर धान ओसाता ही रहा। उसने न ही श्रीकांत की ओर देखा और न ही राम- राम कहा। यह तो सरासर अपमान था। पहले तो सुमेर दिन में दस बार हाथ जोड़ कर नमस्कार करता। वह इतना निडर हो चुका था कि श्रीकांत की ओर देखने की आवश्यकता तक महसूस नहीं किया। श्रीकांत को आज तक ऐसी स्‍िथति का सामना करना का अवसर नहीं मिला था। उनका जलना- भूनना जायज था। उन्होंने कहा- सुमेर,शाम को तुम अपना हिसाब कर लेना।''
           सुमेर ने '' हां '' में सिर हिला दिया.
          श्रीकांत आगे बढ़ने के बजाय जल भून कर वहीं से लौट गये। आराम कुसी र्में धंस कर क्रोध को शांत करने की कोशिश करने लगे।
          संध्या हो चली थी। सुमेर, श्रीकांत के पास आया। श्रीकांत किताब पढ़ने मशगूल थे। उन्हें सुमेर के आगमन का अहसास हो चुका था। उन्होंंने किताब से नजरें हटा कर सुमेर पर टिकाया। कहा- सुमेर,तुम कल आकर अपना हिसाब कर लेना। मुझे तुम्हारा काम पसंद नहीं। अब तुम जा सकते हो।''
           सुमेर अपना घर लौट गया।
          रात में उसे देर तक नींद नहीं आयी। सोचता रहा कि आखिर मुझसे त्रुटि कहाँ पर हुई ? श्रीकांत को मेरा काम क्यों पसंद नहीं आया ? पूर्व में तो वे उसके कामों की खूब प्रशंसा किया करते थे। अचानक परिवर्तन क्यों ? वह जान चुका था कि उसने अभिवादन नहीं किया इसी का प्रतिशोध ले रहे हैं श्रीकांत। उसने मंथन किया कि क्या व्यक्ति के काम का वह मूल्य नहीं होता जो मूल्य चाटुकारिकता का है। क्या काम से बढ़कर चाटुकारिता हो चुकी है। नहीं, कदापि नहीं। काम का पूजा होता रहा है और होता रहेगा। इतना अवश्य है कि व्यक्ति चापलूस व्यक्ति को पसंद करते हैं। शायद लोगों को दिखावे से ही पसंद है क्योंकि चाटुकार व्यक्ति का काम सिर्फ चाटुकारिता ही होती है, काम से उसे कोई मतलब नहीं रहता।
          दूसरे दिन सुबह सुमेर श्रीकांत के घर पहुंचा। उस क्षण सुमेर के मन में किसी भी प्रकार से मलाल नहीं था। उसे शिकायत भी नहीं थी। श्रीकांत चाय पी रहे थे। सुमेर को सामने देखकर कहा - सुबह - सुबह आ गये। कम से कम सूरज को तो चढ़ने देना था।''
- मैंने काम छोड़ दिया है, फिर सूरज उगने या डूबने का इंतजार क्‍यों ? मैंने काम किया है उसी की मजदूरी लेने आया हूं। कायदे के अनुसार अब बिना समय  गंवाये मेरा हिसाब कर देना चाहिए।''
- आजकल खूब बात करने लगे हो सुमेर ।''
- यहां एक ही चीज की तो स्वतंत्रता है.हर व्यक्ति कह कर अपनी बात रखने स्वतंत्र है फिर मैंने गलती कहां पर किया।''
         '' स्वतंत्रता '' शब्‍द से श्रीकांत तिलमिला गये। वे स्वतंत्रता के घोर विरोधी थे । उनकी मंशा यही रहती कि स्वतंत्रता सिर्फ उन्हें ही मिले और बाकी सब उनके गुलाम रहे। .पर क्‍या यह संभव था । कदापि नहीं..वे बिफर कर  आवाज लगायी - रघु ... ऐ रघु .. सुन रहा है, नहीं बे...?''
           दस बारह वर्ष का बालक सरपट दौड़ता। आया.श्रीकांत के तेवर चढ़े हुए थे। रघु एकटक श्रीकांत के मुंह को ताकता रहा। श्रीकांत उस पर टूट पड़े - टकटकी बांधे क्‍या देख रहा है ? कभी मेरी सूरत नहींं देखी है क्‍या बे  ? स्साले सब निकम्में हो गये हैं। पता नहीं तुम लोग स्वयं को क्‍या समझते हो ? जहां पेट भरा कि भूल गये भोजन परोसने वाले को....।''
           रघु घबराया था। वह श्रीकांत को ताकता ही रहा.वह समझ नहीं पा रहा था कि उसने यिा गलती कर डाली.उसने साहस एकत्रित कर पूछा - '' मगर मुझे करना क्‍या है ?''
- '' देवेश से पचास किलो धान निकलवा कर इसे दिलवा दो.....।''
            दूसरे दिन से सुमेर रामगोपाल के घर काम पर जाने लगा.
          सुमेर के परिवार में तीन ही सदस्य  थे. एक सुमेर उसकी पत्नी और पुत्री अमृता . मजदूरी करने सुमेर और उसकी पत्नी ही जाते थे . अमृता लगभग सोलह - सत्रह वर्ष की थी.पर सुमेर उसे अन्य  परिवार  के लड़कियों की तरह काम पर नहीं भेजता था .
          श्रीकांत सुमेर से बदला लेना चाहता था . श्रीकांत सुमेर को फंसाने षड़यंत्र  रचने लगा . सुमेर ने हर बार अपने को बचा लिया . पर श्रीकांत हार मानने वाले नहीं था .
          रामगोपाल सुमेर की ईमानदारी से खुश था . उसने एक दिन सुमेर को सामान खरीदने शहर जाने कहा तो सुमेर आश्चर्य में पड़ गया . क्‍योंकि रामगोपाल ने कभी किसी पर विश्वास ही नहीं किया.वह स्वयं शहर से सामान खरीद लाता था . रूपये स्वयं चुकाता था . पर आज उसने सुमेर को सामान खरीदने शहर जाने कहा तो आश्चर्य की ही बात थी . रामगोपाल सुमेर की भावना को समझ गया . उसने कहा - '' सुमेर , मैंने तुम्हें शहर से सामान खरीद लाने इसलिए कहा क्‍योंकि मुझे तुम्हारी ईमानदारी पर पूरा विश्वास हो गया है . मैं यह जान चुका हूं कि तुम रूपए देखकर भी अपना ईमान नहीं खोवोगे.''
        रामगोपाल ने उसे सामान की सूची एवं रूपए दे दिया.सुमेर सामान लाने शहर चला गया.
        इधर श्रीकांत समय  के तलाश में था . उसने समय  का लाभ उठा ही लिया.घिनौना कृत्य  करके.
       सुमेर दूसरे दिन सामान लेकर गांव आया . वह सामान रामगोपाल के घर रखकर जैसे ही अपने घर पहुंचा तो उसने देखा -  कुछ महिलाएं उसके घर के  सामने खड़ी है . वे आपस में कानाफूंसी कर रही हैं . उनमें से एक ने कहा - '' अमृता के पिता आ गये .''
- '' बेचारी कितनी सुंदर थी ? आदत व्यवहार सबमें . '' दूसरी महिला ने कहा .
- '' मगर उसने आत्महत्या क्‍यों की ...।''
        '' आत्महत्या '' शब्‍द ने सुमेर के माथे को झनझना दिया . उसके चलते पैर ठहर सा गये . वह आगे बढ़ा   . जैसे ही घर में प्रवेश किया . उसकी पत्नी उसे देख बिलख - बिलख कर रोने लगी . सामने सफेद कपड़े से लिपटी अमृता की लाश पड़ी थी . वह लाश के समीप पहुंचा . उसने अमृता को चीरनिन्द्रा में देखा . उसकी आंखों से आंसू छलक पड़े . वह दहाड़ मार कर रो पड़ा .
          अमृता का बलात्कार हुआ था . उसने इसी सदमें से आत्महत्या कर ली थी . बलात्कारी कौन यह अज्ञात था पर सुमेर को रामगोपाल पर ही शक हो चुकी थी . कभी किसी पर विश्वास न करने वाले रामगोपाल ने उस पर विश्वास करके एक तरह से अपराधी बन गया था.हालांकि कुकर्म किसी और ने किया था पर सुमेर को तो रामगोपाल ही पुत्री के बलात्कारी दिख रहा था . उसे रामगोपाल से घृणा हो चुकी थी . वह मौके की तलाश में था और एक दिन उसने रामगोपाल की हत्या ही कर दी.
        रामगोपाल के हत्या की जांच  हुई . सुमेर ने सहज रूप से रामगोपाल की हत्या करना स्वीकार लिया . उसने कह दिया - '' इसने मेरी कन्या का बलात्कार किया . उसे आत्महत्या के लिया बाध्य  किया इसलिए मैंने इसकी हत्या कर दी .''
        सुमेर को पकड़ कर पुलिस ले गयी.उसका प्रकरण न्यायालय  में पंजीबद्ध हुआ.कुछ दिनों बात श्रीकांत सुमेर को जमानत पर छुड़ा लाया.
        श्रीकांत की यह चालाकी थी.सुमेर सत्य  से अनभिज्ञ था.वह श्रीकांत के पैरों तले गिर गया.
       श्रीकांत को सफलता मिल चुकी थी.उसने सुमेर को उठा लिया.कहा- अरे,इसमें पैर में गिरना क्‍यों ? आदमी ही तो आदमी का काम आता है न.एक मानव का जो कतर्व्य  होता है मैने उसी का निवर्हन किया है.हूं..च ल अब ढ़ंग से रहना....।
        सुमेर और उसकी पत्नी श्रीकांत के घर काम पर लग गये.    

सोमवार, 18 जुलाई 2016

अधुरी कहानी

निजर्न और सूनसान स्थान को देखकर नहीं लगता था कि इधर कोई देवालय  होगा.य ह भी विश्वास करने योग्य  नहीं था कि इधर कोई मनुष्य  भी निवास कर सकता है.मगर विशालकाय  भवन के सामने जाकर हमारी गाड़ियां रूक गयी.हम गाड़ी से नीचे आये.विशालकाय  भवन की जीणर्-शीणर् क्स्थति को देखकर य ह स्पý हो गया था कि बरसों से इसके जीणोर्धार नहीं किया गया है.विशालकाय  भवन की अवस्था को अपलक निहार कर पत्नी की Òýि मुझ पर आ टिकी.मैंने पत्नी से कहा- आओ.....
पत्नी मेरे साथ च ल पड़ी.मेरी नजर अचानक पत्नी के हाथों पर गयी.मैंने कहा- तुम नारिय ल लेना भूल गयी...?
अचानक पत्नी को ध्यान आया कि हम देवालय  आये हैं देवताओं का दशर्न करने.कुछ क्षण तो वह समझ ही नहीं पा रही थी कि हम देवालय  जा रहें हैंया फिर ख·डहर में घूमने.संभवत: इसी सोच  विचार ने उसे गाड़ी में रखे नारिय ल और मिठाई को विस्मृत कर दिया था.
पत्नी वापस गाड़ी के पास गयी.उसमें से नारिय ल और मिठाई का डिबबा उठा लायी.मैंने पत्नी से कहा- तुम इतने गुमशुम यिों हो ?यिा तुम्हें य हां आना अच्छा नहीं लगा.
पत्नी ने कहा- नहीं तो.....।मगर मुझे एक बात समझ नहीं आयी कि इस देवालय  की स्थिति इतनी जीणर्-शीणर् है फिर इसके जीणोYधार का काम यिों नहीं कराया गया है?शाय द य हां कोई रहता भी नहीं होगा.
- ऐसी बात नहीं है.य हां पुजारी रहता है,अपने परिवार के साथ....।
- यिा....? पत्नी ने अविश्वास मिश्रित आश्च य र् से पूछा.
- हां य हां पुजारी सपरिवार रहता है.कुछ ही दूरी पर उनका आवास है.
हम देवालय  तक पहुंच ने सीढ़ियां च ढ़ने लगे.हम मूतिर्यों के समक्ष पहुंचे.भीतर दीप जल रहा था.अगरबत्ती हुम की सुगंध नाक और मक्स्तष्क को तरोताजा कर दिया.भीतर विराज मान मूतिर्यों को देखकर मेरे हाथ श्रद्धावश अनायास जुड़ गये.पत्नी की Òýि छत की ओर दौड़ी.वहां छड़ से लटक रही घंटी को देख रही थी.उसने घंटी बजायी.मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ.मैंने भी तत्काल घंटी बजा दी.घंटी की आवाज से देवालय  झनक उठा.उसकी आवाज मंद्धिम नहीं हो पायी थी कि खड़ाऊ की आवाज सुनाई दी.मेरी Òýि खड़ाऊ की ओर दौड़ी.माथे में तिलक, पीछे की ओर हाथ भर लटक रही चोंटी.पेट थोड़ा निकला हुआ.तन में मात्र धोती और कांधे में साफी.लम्बा- तगड़ा मानव खड़ाऊ खटकाते हमारे समाने आया.उसकी वेश भूषा को देख कर मैं जान गया कि य ही है इस मंदिर का पुजारी.उसने आते ही कहा- पास ही मेरा निवास है. मंदिर खाली था सो घर च ला गया था.घंटी की आवाज सुनी तो दौड़ा च ला आया.
हम कटघरे से बाहर खड़े थे.पुजारी ने कहा - आप लोग भीतर जाइये. दीप को थाली में रख आरती पूजा कीजिये.
- हम लोग भीतर जाये और आप....।
- मैं आज मंदिर भीतर नहीं जा सकता...।
- यिों...? मैंने कारण जानना चाहा.
- आप मेरी बात मानिये...
मेरे प्रश्न का उत्तर दिये बिना पुजारी मंत्रो‚ार का उ‚ारण करने लगा.मैं भीतर गया.पत्नी भी साथ हो ली.वहां दीप जल रहा था उसे थाली में रखा. मूतिर्यों की पूजा अच र्ना की फिर हम आरती करने लगे.आरती समाÄि बाद पुजारी ने लोटे की ओर संकेत कर कहा- उसमें पानी है.उसका आच मन कर लीजिये.और हां प्रसाद भी आप ही को लेना पड़ेगा.
मैंने वही किया जो पुजारी ने कहा.हालांकि मैं और पत्नी पुजारी के कहे अनुसार कर रहे थे पर मेरे भीतर प्रश्न उठ रहा था कि आखिर पूजा पंडित यिों नहीं करवा रहा है.हमने प्रसाद ली शेष प्रसाद और कुछ रूपये थाली में रख दिये.पुजारी ने कहा- थाली खाली करके प्रसाद और च ढ़ोतरी मुझे दे दो.मैंने ऐसा ही किया.च ढ़ोतरी को देखकर पुजारी के मन में मैने संतोष के भाव पढ़ा.
हम मूतियों के पास से बाहर आ गये.वहां पर बैठ गये.पुजारी भी हमसे थोड़ी दूरी बना कर बैठ गया.उसने कहा- य हां जो भी कामना के लिए आते हैं उनकी कामना पूरी होती है.आप सही स्थान पर पहुंचे है.देखना इस वषर् के आते तक आपके घर ब‚े की किलकारी गूंजेगी.
मैं ही नहीं पत्नी भी आश्च य र्च कित थी कि आखिर पुजारी को कैसे पता च ल गया कि हम संतान कामना के लिए आये हैं.मैंने कहा- पुजारी जी यिा आप हाथ भी देखते है..?
पुजारी ने हंस कर कहा- नहीं, मैं मन देखता हूं.और जान जाता हूं कि भI किस मुसीबत की वजह से य हां आया है.
उसके इस वायि  ने मुझे मंदिर की मूतियों के साथ पुजारी के लिए भी श्रद्धावान बना दिया.पुजारी ने आगे कहा - इन्हीं की दया से मैं संतान संपÛ हूं.
- आपकी कितनी संतान है...।
- दो लड़की दो लड़का ..एक और आने वाली है. वह लड़का होगा या लड़की मुझे पता नहीं.

शनिवार, 16 जुलाई 2016

खत्‍म हुई संकट की घड़ी

सुरेश सर्वेद

       युगांक प्रसन्‍न था.वह प्रसन्‍न हो भी क्‍यों नहीं ? आखिर उसकी नियुक्ति शवदाह गृह में न होकर सफाई दरोगा के पद पर हो गई थी.अब वह शहर के वार्डों में जाता वहां गंदगी होती , उसे सफाई कमर्चारियों से सफाई करवाता.
       प्रति दिनानुसार उस दिन वह वाड क्र.3 में गया.वहां आते ही मोहल्लेे के मधुकर सहित अनेक लोग उस पर टूट पड़े - तुम्हें यहां आने की फूर्सत आज मिली.हमारे वार्ड में कितनी गंदगी फैली है , इसका तुम्हें भान है.जब आंत्रशोध, मलेरिया जैसे संक्रामक रोग फैलेंगे तब जाकर तुम्हारी बुद्धि जागेगी । यहां की गंदगी हटाओ , वरन हम आंदोलन करेंगे ।''
       मधुकर युगांक को उस स्थान पर ले गया, जहां गंदगी का साम्राज्य  था.उसकी सड़ांध से दुर्गंध फैली थी . दुर्गंध सीधी युगांक की नाक में घूसी . युगांक को नाक बंद कर लेनी पड़ी.वह वहां से सीधा कमर्चारियों के पास आया.वह सफाई कमर्चारियों को लेकर उसी स्थान पर उपस्थित हुआ, जहां गंदगी का साम्राज्य था . कमर्चारी भी मानव थे . उन्होंने भी नाक - भौं सिकोड़ना शुरू कर दिया . उन्होंने कहा - यहां की सफाई हमसे नहीं की जाएगी ''.
       एक ओर कर्मचारियों का अस्वीकार था, दूसरी ओर वार्ड के लोग युगांक पर चढ़ाई कर रहे थे। सफाई कर्मचारियों पर दबाव डालने से मामला उलझ सकता था। युगांक ने कर्मचारियों को मना लेना उचित समझा। उसने शराब मंगायी। कर्मचारियों को पिलाई। कर्मचारियों ने शराब की नशे में गंदगी साफ कर दिए। यद्यपि युगांक को अपनी जेब के रुपये खर्चने पड़े थे पर उसे संतुष्टि थी कि उच्चाधिकारियों के पास मेरी शिकायत नहीं हुई। मैंने अपने कार्य तो करवा ही लिया।
       उसने मन ही मन सोचा- क्‍या हुआ मैं गंदगी साफ करवाता हूं.मुझे लासों के तो बीच  नहीं सोना पड़ता .हर हाल में मेरी नौकरी शवदाह गृह की नौकरी से श्रेष्‍ठ हैं .''
       उस दिन नगर निगम के कमर्चारी हड़ताल पर थे . वे वेतन बढ़ाने की मांग कर रहे थे . उन्होंने रैली निकाली.उस रैली में युगांक भी था.रैली शहर के मध्य  पहुंची कि युगांक के पास एक व्यक्ति आया . कहा -  युगांक तुम मेरे साथ चलो ।''
- कहां ... क्यों ? ''
- तुम्हारे घर, तुम्हारे पिताजी की मृत्यु हो गयी है।'' उस व्यक्ति का उत्तर था।
       उत्तर से युगांक को झटका लगा। वह सीधा घर आया। परिवारजन रो रहे थे। युगांक पिता के लाश के पास बैठ गया। पिता के चेहरा को देख वह तड़फ उठा।
       युगांक को पिता के साथ बिताए याद क्षण आने लगे. जब युगांक चार वर्ष का था, तभी मां मर गयी.सारा दायित्व उसके पिता पर आ गया.पिता ने युगांक को कभी मां की कमी का अहसास नहीं होने दिया.युगांक से त्रुटियां हुई पर पिता ने धमकाने या मरने के बजाय  उसे प्रेम से समझाया.रास्ता बताया और आज उसी पिता की मृत्यु हो गयी थी.अर्थी तैयार की गई। उसमें शव रखा गया . युगांक सहित लोगो ने अर्थी को कंधा दिया.युगांक की आंखों से आंसू बहने से थम नहीं रहा था. उसकी आंखें रास्ते भर आसूं बहाती रही . शवदाहगृह के सामने पहुंच  कर उन्होंने अर्थी नीचे उतारा शवदाहगृह का मुख्य  दवार बंद था.युगांक बाजू के छोटे द्वार से भीतर गया.उसकी दृष्टि वहां टंगी एक बोर्ड पर गयी.उसमें लिखा था- कमर्चारी हड़ताल पर है अत: शवदाह का कार्य  बंद है । सूचना पढ़कर युगांक के आसूं सूख गए.सामने नटराजन पुस्तक पढ़ने तल्लीन था. सामने युगांक को देख पूछ बैठा - अरे,युगांक तुम यहां ।''
- हां, मेरे पिता की मृत्यु हो चुकी है। उनकी अंतेष्टि करनी है।''
- आज तो अंतेष्टि का कार्य नहीं हो पायेगा।''
       नटराजन के वाक्य ने युगांक को हिला दिया। पिता के निधन की जो पीड़ा उसे थी वह क्षण भर में ही गायब हो गई। वह तनाव में आ गया कि अब क्या किया जाए ?
       मृतदेह का अंतिम संस्कार करना ही था। युगांक गिड़गिड़ाने लगा। नटराजन ने कहा - मैं तुम्हारी पीड़ा समझ सकता हूं। तुम मेरी विवशता समझने का प्रयास करो। मुझे भी तुम्हारे पिता की मृत्यु का उतना ही दुख है जितना कि तुम्हें। पर मैं तुम्हारी सहायता करने में असमर्थ हूं। तुम तो जानते ही हो यदि मैं भावना में आकर तुम्हारा सहयोग किया तो कर्मचारी संघ के लोग मुझ पर चढ़ाई कर देंगे।''
       युगांक जिस पद को हेयदृष्टि  से देखता था उसके अधिकार को देख उसे श्रेष्‍ठ समझने लगा.समस्याएं दोनो ओर थी यदि नटराजन शवदहन करने देता तो संघ के लोग उसकी बारा बजाते ,और युगांक पिता की लाश को वापस नहीं ले जा सकता था.
       अनुनय  - विनय  का नटराजन पर कोई असर नहीं दिखा,युगांक के पास एक ही चारा था वह अनुनय  -विनय  के स्थान पर नटराजन को पटा ले .उसने नटराजन की जेब में रूपए  ढ़ूंस दिए .नटराजन का अटल निश्चय  डगमगा गया.उसने गंभीरता धारण कर ली.कहा- वास्तव में नियम - कानून आदमी को अपाहिज बना देता है .वह सहायता की इच्छा रखकर भी कुछ नहीं कर पाता.पर अब मुझे  किसी का भय  नहीं .मैंं तुम्हारी सहायता अवश्य  करूंगा लेकिन एक समस्या हैं ..... ।''
- क्‍या समस्या.....? '' युगांक ने पूछा.
- हड़ताल के कारण शासकीय  लकड़ियां उपलबध नहीं है .हां,मैने अपने लिए रखी है .उसे दे सकता हूं.लेकिन कीमत अधिक  लगेगी .''
       युगांक को खर्च करने की चिंता नहीं थी.उसकी प्रमुख चिंता - पिता की चीता थी . वह लकड़ियों की बढ़ी कीमत चुकाने तैयार हो गया.
       नटराजन ने बड़ी दरवाजा खोल दिया.अर्थी भीतर आयी.उसकी अंतिम संस्‍कार कर दी गई.युगांक लौटने लगा तो नटराजन ने उसे पास बुलाकर कहा - इस क्रिया - कर्म के रहस्य  को कहीं मत खोलना वरना हम दोनो पचड़े में पड़  जाएंगे .
       युगांक को कहीं बताने की क्‍या पड़ी थी.उसे मानसिक तनाव से जुझना पड़ा . आर्थिक हानि उठानी पड़ी पर उसे आंतरिक प्रसन्‍नता थी कि पिता का अंतिम संस्‍कार हो तो गया .उसे वापस ले जाने की नौबत तो नहीं आयी.

पता
ममता नगर
राजनांदगांव

आस्‍तीन का सांप

सुरेश सर्वेद 

       नगर निगम का चुनाव होने  वाला था.हम वार्ड क्र.तीन के सदस्य  थे.हमने अपने वार्ड के वीरेन्द्र से पार्षद पद के लिए चुनाव लड़ने कहा.उसने अस्वीकार दिया.कहा - मैं किसी पद के लिए नहीं लड़ना चाहता.पद में नहीं हूं फिर भी यथाशक्ति वार्ड वालों के लिए काम करता हूं.फिर पचड़ें में क्‍यों पड़ू ?''
        वास्तव में लोगों का कोई हमदर्द था तो वह था वीरेन्द्र.वह किसी की भी किसी भी समय सहायता करने तत्पर रहता.बीमार को अस्पताल ले जाना हो या फिर किसी के घर शादी बयाह हो वीरेन्द्र सबसे पहले और सबसे आगे होता.उलझन को सुलझाने में उसे समय  नहीं लगता था.ललित की पुत्री उमा की शादी उसी के कारण संपन्‍न हो सकी.जब तक सात फेरे न पड़ जाये लड़की के पिता नदी किनारे का पेड़ होता है.उसे चिंता रहती है कि बराती गड़बड़ी न कर दे . दूल्हा रूठ न जाये.उसके तो रूतबे का कहना ही क्‍या ? यार दोस्तों ने भड़काया कि कुछ भी मांग बैठते हैं.मांग पूरी नहीं हुई कि मंडप से भागने को तैयार . यही स्‍िथत ललित के घर भी निर्मित हो गयी.दूल्हें ने मौर - कटारी फेंक दी . कहा- मुझे मोटरसाइकिल चाहिए.नहीं दोगे तो शादी रद्द. '' सुनकर ललित की हालत खराब हो गई.वह मोटर साइकिल देने में असमर्थ . उसने कहा कि मुझसे पहले क्‍यों नहीं मांगी गयी.मेरे साथ धोखा हुआ है.मैं इसकी रिपोर्ट थाने में दर्ज करवाऊंगा.अब तो दोनों पक्ष महाभारत को खड़े हो गये.तभी वीरेन्द्र बीच में आ खड़ा हुआ. उसने कहा कि इससे दोनों पक्षों को हानि होगी.दूल्हा जेल जायेगा और दुल्हन रह जायेगी अविवाहित.ये झंझट यहीं खत्म करो.उसने ललित से कहा- मोटरसाइकिल की कीमत पचास हजार है.उससे आधा पच्‍चीस हजार.तुम पच्‍चीस हजार दे दो और पच्‍चीस हजार तुम्हारा दामाद देगा.''
       लो समझौता होकर रहा.बेचारे ललित की जग हंसाई बच  गई.लोगों ने आलोचना की कि  वीरेन्द्र तो दहेज विरोधी अभियान में अगुवा रहता है फिर उसने दहेज क्‍यों दिलवाया.आलोचक यह भूल गये कि यदि वीरेन्द्र ऐसा नहीं करता तो लड़की की शादी रूक जाती और उसकी जिन्दगी बर्बाद हो जाती.वीरेन्द्र ने मध्यस्थता करके ठीक ही किया.
       हम इसलिये तो वीरेन्द्र को चुनाव लड़वाना चाहते थे.किसी अच्छे कार्य को पूरा करने में उसके हिस्से बदनामी आती उसे भी वह सह लेता.वैसे एक उम्मीदवार और था - अरविन्द.वह पूर्व में पार्षद रह चुका था.उसका व्यवहार बड़ा रूखा था.मदद देने की बात तो दूर वह किसी से सीधे मुंह बात भी नहीं करता था.उसका चरित्र भी संदेहास्पद था.हमें हर हाल में अरविन्द का पत्ता साफ करना था.और वीरेन्द्र को पाषर्द बनना था.वीरेन्द्र ने बड़ी मुश्किल से हमारी बात मानी.वह चुनाव लड़ा और चुनाव समर में उसने विजय  श्री पायी.अरविन्द की ऐसी दुगर्ति हुई कि कई दिनों तक वह दिखा ही नहीं....।
       सड़क दुघर्टना में मेरे पति यशवंत की मौत हो गई.इसकी खबर मुझे मिली. मैं दौड़ी - दौड़ी वीरेन्द्र के पास गई . वह भोजन करने बैठ था . मैने कहा - मैं तो लूट गई.मेरे पति सड़क दुघर्टना में मारे गये.''
        वीरेन्द्र भोजन छोड़ उठ खड़ा हुआ.पूछा- कहां पर...।''
- एम.जी.रोड में...।'' मेरा उत्तर था.
       वीरेन्द्र ने जल्द हाथ धोया . कुर्ता पजामा पहना और मोटर साइकिल मे सवार होकर  घटना स्थल पर पहुंच  गया. 
       वहां भीड़ एकत्रित थी.पुलिस वैन में लाश रखी जा चुकी थी.उसे शव परीक्षण के लिए चीरघर ले जाया गया.शव परीक्षण बाद हमें सौप दी गई.वीरेन्द्र ने अंतिम संस्‍कार  के  कार्य में बराबर हाथ बंटाया.उसने अर्थी र्तैयार करवायी.हमें ढ़ांढ़स बंधवाया.
       मेरी पुत्री उषा बी.ए.द्वितीय वर्ष में थी.उसे मैं बहुत पढ़ाना चाहती थी मगर उसके पिता के निधन से आय  के श्रोत रूक गये.घर का खर्च मुश्किल से निकल रहा था.जैसे तैसे दिन कट रहे थे.
       एक दिन वीरेन्द्र आया . मैने उसे बैठने कहा . उसने कहा- मैं अभी जल्दी में हूं.तुम्हें ये रूपए देने आया हूं.''
       उसके हाथ में सौ सौ के नोट थे.मैं आश्चर्य  में थी . उसने कहा- तुम इस तरह क्‍यों देख रही हो.मैने ट्रक मालिक से लड़ झगड़ कर हर्जाना वसूला है . इन्हें रखो - पूरे पांच  हजार है.जब भी किसी काम की आवश्यकता हो मुझसे कहना.
       उसने रूपये थमाये और चला गया.
       मुझे तो वह देव तुल्य  लगने लगा था.श्रद्धा से मेरा मस्तक  झुक गया.उन रूपयों में से ऊषा के लिए पुस्तक कापियां ली . कालेज का शुल्क पटाया.आवश्यक वस्तुओं की पूर्ति की . उधारी थी उसे पटाया.वीरेन्द्र के दिये रूपये कुछ ही दिनों में खत्म हो गये.पुन: पूर्व की तंगी आ धमकी.पर आये समय  पर मुझे विजय  पाना था.मैं उस संध्या उधेड़ बुन में थी कि ऐसा क्‍या किया जाये जिससे परिवार चल सके.मुझे रह - रह कर पति के साथ बिताये क्षण याद आ रहे थे . उनका चेहरा मेरी आंखों के सामने नाच  रहा था . मैं उन्हीं में लीन थी कि एक छाया मेरे पास आयी . मेरी तंद्रा टूटी . मैं हड़बड़ा कर उठ खड़ी हुई . अनायास मेरे मुंह से शब्‍द निकले- तुम....।''
- हां,अरी तुम चौंक क्‍यों गई.मैं अपरिचित तो हूं नही.''
       वीरेन्द्र ने मुस्करा कर जवाब दिया.मैं कुछ क्षण खड़ी रही . अचानक याद आया - मैंने उसे बैठने नहीं कहा है.मैं झेप गयी.कुर्सी की ओर संकेत करते हुए कहा- बैठिये न,मैं चाय  बना लाती हूं.''
       कुर्सी पर बैठते हुए उसने इधर उधर दृष्टि दौड़ाई .पूछा - ऊषा नहीं दिख रही,कहां गयी है ?''
- अपनी सहेली के घर ...।'' कहते हुए मैं चाय  बनाने चली गयी.
       चाय बनाकर लायी.उसने चाय  का घूंट लेकर कहा - सरकार विधवाओं को प्रतिमाह पेंशन दे रही है.तुम्हें भी मिल जाये तो...?''
- इसमें पूछना क्‍या ,मेरी स्‍िथति तुमसे छिपी नहीं है.बहुत अच्छा होगा..।'' वही जमीन पर बैठती हुई मैंने कहा.
       चाय  पी कर कप जमीन पर रखा.मैने अनुभव किया कि उसकी नजर मेरे शरीर पर है.मेरे भीतर एक प्रकार से अजीब हलचल होने लगी.मैं अब वहां से उठ जाना चाह रही थी कि उसने कहा-मालती,क्‍या तुम्हें पति विहीन जिन्दगी नहीं खलती...?
मैं खामोश रही.वह मुस्काया.उसने जेब से कुछ रूपये निकाले.मुझे जबरदस्ती थमा दिया.
        ऊषा को ज्ञात हो चुका था कि  वीरेन्द्र के साथ मेरा अवैध संबंध है.वह मुझसे घृणा करने लगी थी.मैंंने बुरा नहीं माना.वह समझदार थी.उसका विरोध जायज था.पर मैं करती भी क्‍या ? मुझे घर भी तो चलाना था.
       एक दिन  ऊषा ने कहा - मां अब बर्दाश्त से बाहर है . लोग हम पर ऊंगली उठा रहे हैं . हमें बदनामी से बचना चाहिये.मैं जानती हूं - हम आथिर्क  तंगी में है.मैं प्रेस में काम करने जाऊंगी.कुछ तो खर्च निकलेगा.''
- नहीं,मुझे यह पसंद नहीं.प्रकाशक संपादक तुम्हारी खूब सूरती निचोड़ लेगे.मैं तुम्हें कालगर्ल के रूप मेंं देखना नहीं चाहती.और फिर प्रेस में स्थायी जीविका नहीं मिलती.'' मैंंने उसे समझाया.
       ऊषा वीरेन्द्र को जब तब खरी खोटी सुना देती.वीरेन्द्र मुस्करा कर झेल लेता.
       उस दिन वीरेन्द्र मुझे रुपये देने हाथ बढ़ाये ही थे कि ऊषा आ धमकी। वही वीरेन्द्र पर टूट पड़ी - तुम यहां से चले जाओ। तुम समझते हो कि इन रुपयों से हमें खरीद लोगे। मैं अंतिम बार कह देती हूं - अब कभी इधर सूरत मत दिखाना। हमारा घर कोई चकला घर नहीं है ....।''
       वीरेन्द्र चुपचाप चला गया.
       मैं प्रसव पीड़ा से व्याकुल थी.मेरी सहायता के लिए कोई आया नहीं था.सभी तो मुझसे घृणा करते थे.करते भी क्‍यों नहीं,विधवा गर्भधारण करेगी तो लोग उससे घृणा ही करेंगे.उससे दूर ही रहना चाहेगे. बाहर बूंदाबंदी हो रही थी.बादल गरज रहे थे.बिजली चमक रही थी.जब भी पीड़ा बढ़ती तो मैं ईश्वर से प्रार्थना करती - हे प्रभू,बादल को जोरदार आवाज के साथ गरजने दे ताकि मेरी पीड़ा आवाज दब जाये.आखिर मैं पापिन हूं न,हरामी नवजात शिशु को जन्म देने वाली...एक लम्बी चीख के साथ मैंने एक बच्‍ची को जन्म दिया.वह खूबसूरत थी या बदसूरत यह नहीं बताऊंगी क्‍योंकि उसे तो बस नफरत ही मिलनी है.
       रात का समय  था.किसी ने दरवाजा थपथपाया.मैंने दरवाजा खोला.सामने वीरेन्द्र था.मैंने ऊषा के कमरे में झांककर देखा.वह नींद में थी.वीरेन्द्र मेरे साथ - साथ आया.साधिकार पलंग पर बैठ गया.पलंग पर मेरी नवजात कन्या अन्‍नू सोयी थी.उसने उसे स्पर्श करते हुए कहा - यही है न,हमारी बच्‍ची ?''
       उसके मुंह से '' हमारी '' शब्‍द निकलना मुझे अच्छा नहीं लगा.मुझे आश्चर्य  भी हुआ.उसने मुझसे कहा - तुम बोलती क्‍यों नहीं.क्‍या तुम मुझसे नाराज हो ?''
        उसने मुझे अपने पास खींच  लिया.इस स्पर्श में प्यार था या स्वार्थ मुझे समझ नहीं आया.मेरी आंखें छलछला आयी. मैंने पूछा - लोग पूछते हैं ,इस बच्‍ची के पिता कौन है,क्‍या मैं तुम्हारा नाम लोगों को बता दूं ?''
       उसने कहा- ओह् ! तुम परेशान क्‍यों होती हो ? लोग पूछते हैं तो पूछने दो.दूसरों के घर झांकने की लोगों की आदत बन चुकी है.तुम व्यर्थ की बातों में क्‍यों पड़ती हो....।''
- मगर...।''
-अगर -मगर कुछ नहीं,जब तुम दारिद्र जीवन जी रही थी तब तो किसी ने यह जानने का प्रयास नहीं किया कि तुम्हारे घर चूल्हा जला भी है या नहीं...।''
       उसने सौ - सौ के सात नोट मेरे हाथ में रख दिया और चलता बना.
       उस दिन मैं अन्‍नू को लेकर अस्पताल गयी थी.उसे गठिया हो गया था.उसके इलाज उपरांत घर लौटी.वहां दरवाजा बंद था.मैंने खिड़की से झांककर भीतर देखा .वहां ऊषा और वीरेन्द्र थे.वहां के दृष्‍य  का वर्णन किस मुंह से करूं ? उफ , कुछ मत पूछो...।''
       थोड़ी देर बात दरवाजा खोलकर वीरेन्द्र मेरे पास आया.उसने एक हजार रूपये मेरे हाथ में थमाये और शैतानी मुस्कान के साथ चलता बना.मैं रूपयों को देखती रही.मुझे समझ नहीं आ रहा था कि उन्हें फाड़कर फेंक दूं या फिर आड़े समय  के लिए सुरक्षित रख दूं....?

सांप केंचूल बदल रहा है

सुरेश सर्वेद

       गांव का जमींदार मर गया.लोग औपचारिकता वश शोक मना रहे थे.वास्तव में उन्हें  प्रसन्‍नता थी.जमींदार के अत्याचार सहते आये लोगों को अब लगा कि वे अब स्वतंत्र हो गये.पर क्‍या सचमुच  वे पूर्णरूपेण स्वतंत्र हो चुके थे ? नहीं,अभी तो जमींदार का पुत्र अभिनव जीवित था.लोग शंकित थे कि अभिनव भी आदत व्यवहार में अपने पिता के ही समान निकलेगा.सांप का बच्‍चा, सांप ही होता है.सांप के बच्‍चा विषधर न हो यह क्‍या संभव है.अभिनव शिक्षा पाने  विदेश गया था.पिता का राजपाठ सम्हाना था.वह वापस आया.जब वह ऊंगली पकड़ कर चलता था तभी गांव वालों ने उसे देखा था मगर अब तो वह जवान हो चुका था.दूसरों को ऊंगली में नचाने योग्य  हो चुका था.
       अपने नये अन्‍नदाता के दशर्न के लिये लोगों की भीड़ लग गयी.अभिनव ने सबको दशर्न दिया.जो भी आया उसका मुस्करा कर स्वागत किया.अच्छी बातें की.हाल चाल पूछा.और क्‍या चाहिये गांव वालों को .वे आंकलन लगा लिए कि जमींदार का पुत्र उससे लाख गुना अच्छा है.अभिनव व्यवहारिक तो था ही साथ ही न उसके मुंह से किसी के लिए ऐसी गालियां नहीं निकलती थी जैसे कि जमींदार के मुंह से निकला करती थी.वह शोषक किसम का भी नहीं लगता था.मजदूरों का बराबर मजदूरी देता .किसी के घर दुख आता तो सुख आता तो वह अवश्य  पहुंच  जाया करता था.उसके इस व्यवहारिकता का परिणाम यह था कि उसके विरूद्ध में कोई कुछ सुनना पसंद ही नहीं करते थे.
       प्रणव का मुंह अभिनव की प्रशंसा करते थकता नहीं था.वह अभिनव के घर काम करता था.यहीं उसने मोटर साइकिल चलाना सीखा.जब अभिनव  ने ट्रेक्‍टर  खरीद कर लाया तो उसका चालक प्रवीण बन बैठा.अब तो वह अपने आपको अभिनव के एकदम निकट का मानने लगा.उसे जिस जमींदार के घर एक ग्लास पानी नहीं मिलता था वहां अब चाय  और समय  बे समय  नास्ता भी मिल जाया करता था.जमींदार की बात ही कुछ और थी.वह जहां बैठा होता वहां पर जाने का साहस भी कोई नहीं कर पाता था.वह जो कहता पत्थर की लकीर होती.मगर अभिनव का व्यवहार इससे ठीक विपरित था.वह सब के साथ बैठता भी और कभी कभार चाय  नास्ता तक कर लेता था.गप्पेें हांक लिया करता.वह एक साधारण जन जीवन की तरह जीवन जी रहा था.प्रवीण अधिकतर समय  अभिनव के घर में बिताता था सो वह एक प्रकार परिवारिक व्यक्ति बन गया था ,ऐसा गांव वालों का भ्रम था.उसके घर में ही रहने के कारण घर का छोटा मोटा काम भी वह निपटा देता था.वह अभिनव की पत्नी अमृता से घुलमिल गया था.
       अकसर अभिनव की पत्नी और प्रवीण आपस में चर्चा करते और कभी कभार जी खोल कर हंस भी लेते.उस दिन भी किसी प्रसंग को लेकर वे खिलखिलाकर हंस रहे थे कि अभिनव आ धमका. उसे बुरा तो लगा पर उसने कहा - अमृता,तुम कपड़े खरीदने शहर जाना चाहती थी न ? मैं अपने काम में व्यस्त हूं तुम प्रवीण के साथ शहर जाओ और सामान खरीद लाओ.''
       प्रवीण जिस समय  अभिनव की पत्नी को मोटर साइकिल के पीछे सीट में बिठा कर गांव से निकला उस क्षण वह काफी प्रफुल्लित था.गांव वालों ने देखा तो देखते  ही रह गये . उस पर टिका टिप्पणी करने की किसी ने साहस नहीं किया.पर गांव वाले इतना समझ चुके थे कि अब प्रवीण का भविष्य  कुछ अच्छा नहीं है मगर किसी में टिका - टिप्पणी करने की साहस नहीं था.
       अभिनव के पास किसी चीज की कमी नहीं थी.उसे अकसर सालता तो अब तक पिता नहीं बन पाना.विवाह हुए दस वर्ष से भी अधिक समय हो चुके थे  पर पिता कहलाने का वह सौभाग्य उसे मिल नहीं पाया था.मगर कुछ दिनों से अमृता प्रसन्‍न नजर आने लगी थी । अभिनव को भी इस अमृता के प्रफुल्लित होने के राज का पता चल ही गया.हालांकि अभिनव प्रसन्‍न था पर उसकी प्रसन्‍नता आत्मा से नहीं ऊपरी थी.एकांत में वह विचार करता कि अमृता इतने वर्षों तक मां नहीं बन सकी पर अचानक वह कैसे मां बनने चली . इसका उत्तर भी उसके पास था पर जगजाहिर करना उचित नहीं समझता था.हां इतना अवश्य  है कि वह भीतर ही भीतर जल रहा था.
       जब अमृता ने एक स्वस्थ बच्‍चे को जन्म दिया तो सारा गांव खुशी से झूम उठा.अभिनव ने भी तामझाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी.गांव वालों ने जैसी खुशी मांगी,उसने दी.मगर वह भीतर से पीड़ित था.जिस प्रवीण पर वह पूरा विश्वास करता था हर काम में साथ लेता था अब उसे देख देखकर वह जल उठता था.
       एक दिन अभिनव ने प्रवीण से कहा - मेरे पास एक ट्रेक्‍टर  सागौन की लकड़ियां है.उसे शहर छोड़ आओ.''
प्रवीण अकसर ऐसा काम किया करता था.वह ट्रेक्‍टर  में लकड़ियां डलवा शहर की ओर चल पड़ा.ट्रेक्‍क्‍टर  जैसे ही शहर में प्रवेश किया उसे पकड़ लिया गया.ट्रेक्‍टर समेत प्रवीण को आरक्षी केन्द्र ले जाया गया.उससे वहां पूछताछ शुरू कर दी गई.दरअसल अभिनव ने ही पुलिस को सूचना दी थी कि किसी ने उसके ट्रेक्‍टर को चुरा लिया है और आज उस ट्रेक्‍टर सागौन की लकड़ियां पार करने की जानकारी मिली है.अभिनव आरक्षी केन्द्र में ही उपस्थित  था.प्रवीण यह सब नहीं जानता था.जब  उसने अभिनव को सामने देखा तो उसका हाथ सहायता के लिए जुड़ गये.अभिनव ने कहा- मैं तुम्हारा सहायता अवश्य  करूंगा.तुम्हारा मुझ पर बहुत बड़ा उपकार है भला मैं उसे कैसे भूल सकता हूं.'' और अभिनव वापस गांव आ गया तथा प्रवीण जेल के सलाखों के पीछे चला गया.
       गांव में खबर फैली कि प्रवीण के फंसने पर अभिनव ने उसे बचाने खूब प्रयास किये.जमानत तक के लिए प्रयास किये पर न मामला सलटाया जा सका और न हीं प्रवीण को जमानत मिल सकी.हालांकि ऐसा कुछ नहीं था .देखने तो कोई गया नहीं था.अभिनव ने जो गांव वालों को बताया उसी को  लोगों ने सच  माना यही वजह थी कि अभिनव की प्रशंसा करने अब तक नहीं छोड़ पाये थे ग्रामीण.अभिनव ने एक दिन गांव के प्रियतम से कहा-तुम कृषक हो.कृषि भी करते हो मगर कृषि के आधुनिक तरीके को अपनाते नहीं यही कारण है कि तुम पर्याप्‍त मात्रा में कृषि उत्पादन नहीं पा सकते.''
- तुम्हारी बात गलत नहीं मगर अथार्भाव के समक्ष मैं कर भी क्‍या सकता हूं.चाह कर भी मैं आधुनिक कृषि नहीं कर पाता .''
- तुम नाहक परेशान होते हो . हमारी सरकार ने तुम्हारे जैसे असहाय  किसानों के लिए ऋण सुविधा चालू करी है.तुम ऋण क्‍यों नहीं ले लेते.कर्ज लेकर बोर करवाओ.पम्प बिठाओ. सिंचाई का साधन जुटाओ।''
- मगर ऋण लेने का नियम मैं नही जानता.बैंक के किसी अधिकारी से भी मेरी पहचान नहीं है.''
- बस इतनी सी बात.मैं हूं न.''
       अभिनव प्रियतम को बैंक लेकर गया.वहां ऋण के लिए आवेदन जमा करवाया.अधिकारी को रूपये देने पड़े.प्रियतम के पास पैसा नहीं था अभिनव ने उधार में खर्चा उठाया.पच्चीस हजार का ऋण स्वीकृत हुआ.उसमें से आठ हजार का पम्प आया.पांच  हजार अधिकारियो को खिलाना पिलाना पड़ा शेष बचा उससे बोर करवाया मगर वहां पानी ही नहीं निकला.पम्प घर पर ही पड़ा रहा.बैंक का कर्ज ब्‍याज बढ़ता ही गया.एक अवसर ऐसा आया कि ऋण अदा नहीं करने के कारण बैंक ने उसकी जमीन की नीलामी की सूचना निकाल दी.
       प्रियतम दौड़ा - दौड़ा अभिनव के पास आया.अभिनव ने सूचना पढ़ी.कहा -  बैंक ने कर्ज इसलिए दी कि तुम कृषि कार्य कर उत्पादन करो और समय  पर ऋण अदा करो मगर न तो तुमने सही ढ़ंग से कृषि कार्य किया और न हीं एक भी बैंक का किस्त पटाया तो जमीन की नीलामी होगी ही.''
- मैं मानता हूं सारी गलती मेरी है.जमीन की नीलामी होने से मेरी बदनामी होगी.इसलिए चाहता हूं तुम बैंक का ऋण अदा कर दो और जमीन खुद रख लो.
       अभिनव यही चाहता था.उसने पानी के मोल जमीन खरीद ली.प्रियतम अभिनव के घर काम पर जाने लगा.वह जिस जमीन का मालिक था उसका  नौकर बन गया.पर वह खुश था.कहता फिरता था कि यदि समय  पर अभिनव उसकी सहायता नहीं करता तो उसकी इज्‍जत दांव पर थी . अभिनव के कारण ही उसकी इज्जत बची है.।'' इतना सब कुछ होने के बावजूद अभिनव का सम्मान बढ़ता ही गया.गांव वाले उसे हितैषी मानने से नहीं चुकते थे.

बुधवार, 13 जुलाई 2016

उल्‍टी गंगा

एक ओर मां की लाश पड़ी थी,दूसरी ओर नियुिित पत्र.इसी नियुIि पत्र के लिए परितोष ने अपना वह समय  खोया है जब उसका खेलने -खाने के दिन थे.वह य ह सुखद समाचार अपनी मां को देना चाहता था पर वह जिस सुखद क्षण का एहसास मां को करना चाहता थ.मां इस दुनिया से उस अनुभव को प्राÄ किए बिना ही च ल बसी.परितोष को समझ नहीं आ रहा था कि ऐसे क्षण में खुशी मनाया जाये या गम.उसके समक्ष सुखद एवं दुखद दोनो क्षण उपक्स्थत था.उसकी आंखों न आसू झर रहे थे और न ही  ओठ में मुस्कान तैरने का नाम ले रही थी.अब उसके समक्ष मात्र स्मृति ही शेष रह गई थी....।
उस दिन मां ने कहा- बेटा आसुतोष,तुम कितने दुबले हो गये हो.तुम्हारा खााना भी टूट चुका है.तुम्हें निराश नहीं होना चाहिए.व्य Iि के जीवन में धूप-छांव आती रहती है. य दि व्य Iि को मात्र सुख ही मिलता रहा तो वह मदमस्त हो दुनियांदारी भूल जाता है और उसमें अहंकार आ जाता है.समय  आने पर तुम्हारे सामने  भी सुख हाथ फैला कर खड़ा हो जायेगा.तुम निराश का त्याग कर प्रयास जारी रखो.सफलता तुम्हारी कदम चुमेंगी.
- मां,आखिर कब तक आशा के ही बल बूते रहूं.तुम तो देख ही रही हो कितने दिनों से नौकरी पाने की लालसा लिए फिर रहा हूं पर सफलता मिलती ही नहीं आखिर कब तक च लेगा य ह ,कब तक.
- संघषर् का नाम ही जीवन ही.सफलता उसमें है जबकि संघषर् जारी रहे.संघर्ष से मुंह मोड़ लेने से सफलता भी हाथ नहीं आती....अच्छा,च ल एक रोटी और ले...।
मां ने उसकी थाली में एक रोटी डालना  चाहा. उसने मना करते हुए कहा-बस मां पेट भर गया.
उसने हाथ मुंह धो कर मां से पूछा- सिदू कहां गयी हैं.
- विमला के घर गयी है ...विमला को देखने वर पक्ष वाले आये हैं...।
सामने की ख·डहर में गजब की धूप थी.गमीर् के दिन थे.आसमान से आग बरस रहा था.परितोष आराम करने अपने कमरे में च ला गया.
कुछ क्षण वह पलंग पर लेटा रहा.सोच ता रहा- आखिर नौकरी मिलेगी भी या नहीं.बहुत मंथन करने पर भी वह किसी निश्च य  पर नहीं पहुंच  पाया अंतत: उसने एक पुस्तक निकाल पढ़ने लगा.वह कुछ पÛे पलटा ही था कि उसकी बहन सिदू की आवाज उसके कान से टकरायी-मां आज तो गजब हो गया.वो अमित हैं न उसने आत्महत्या कर ली.
बहन की आवाज से परितोष के हाथ कांप गये.मां सÛ रह गयी.सिदू दौड़ कर आयी थी. वह हांफ रही थी.परितोष दौड़ कर उनके पास आया.तीनों ने आंखों ही आंखों से बात की,जुबान तो नि:शबद हो चुकी थी.पल भर गंवाये बगैर परितोष घटना स्थल की ओर दौड़ा.
परितोष वापस आया.अब तक धूप नहीं उतर पायी थी. मां एवं बहन सोयी हुई थी.परितोष पुन: अपने कमरे में जाकर पलंग पर पड़ गया.उसकी आंखों  के सामने अमित का चेहरा घूम आया. काली काली तलवार की तरह तीखी मूंछें,घूंघराले बाल,ओठ पर सदैव मुस्कान.वह परितोष के हमउम्र का ही था.उसका मित्र भी था.आज सुबह ही उन दोनों में हंसी ठिठोली भी हुई थी.
जिन्दगी का मोड़ कब किस क्षण किधर मुड़ जाये अज्ञात है.समय  बलवान होता है समय  पर आदमी सफल नहीं होने पर या तो वह हताश होेकर अपना इहलीला समाÄ कर लेता है या फिर सब्र से काम लेने समय  का इंतजार करता है.समय  वह धन है जो कुछ लेता है तो बहुत कुछ देता भी है.समय  परिवतर्नशील होता है.इस परिवतर्न को जो महसूस नही करता वह अमित के ही पद चि न्हों पर च लने बाध्य  हो जाता है.समय  और संघषर् का साथ साथ च लता है जो समय  के साथ संघषर् करने पर विश्वास रखता है उससे संघषर् हार जाता है और वह समय  पर विजय  पा लेता है.मगर जो संघषर् से आंखे चुराता है उसका इंतजार समय  भी नहीं करता है य ही कारण है कि कई संघषर् के बाद भी परितोष ने हार नहीं मानी और आज भी विजय  पाने समय  पर च ल रहा है जबकि अमित ने संघषर्  से डर कर अपना इहलीला समाÄ कर समय  से भी हार गया.
परितोष को अमित को साथ बिताये क्षण याद आने लगे.वह सोने का प्रयास करता रहा मगर वह सो नहीं सका.मां और सिदू की आंखें खुलुचुकी थी.बहन सिदू ने चाय  बनाकर परितोष को चाय  पीने बुलाने आयी.परितोष उसके साथ हो लिया.तीनों चाय  पीने लगे. मां ने पूछा- यिों परितोष, अमित ने आत्महत्या यिों की...?
- वह जीवन से उब चुका था मां.नौकरी खोजते खोजते वह परेशान हो चुका था.घर वाले उसे दिन रात कुछ कुछ कहते रहते थे.वह अपमानित जीवन जी रहा था.अपमानित जीवन जीने से अच्छा तो मर जाना हैं न मां...? परितोष ने कहा.
- गलत,अपमान से बच ने का य ह तरीका किसी भी क्स्थति मे ठीक नहीं.अपमानित व्य Iि ही संघषर् के बाद वह सम्मान पाता है जिसका वह कल्पना नहीं किया रहता.समय  के अनुसार सारे घाव भर जाते है.....।
समय  बीतता गया.अमित की याद सबकी मानस पटल से धूंधला गयी.एक समय  ऐसा आया कि प्राय : लोग अमित को भूल सा गये ठीक उसी प्रकार जैसे किसी व्य Iि के मरने के बाद उसे कु छ  दिनों बाद भूला दिया जाता है.
आषाढ़ का महीना था.च ौबीसों घ·टे बादल छाये रहते.सूय र् जाने कई दिनों से बादल के किस ओट में जा छिपा था कि उसके दशर्न ही दुलर्भ हो गया था.परितोष को सरकारी नौकरी नहीं मिल पायी थी. वह एक बतर्न की दुकान पर काम पर जाने लगा था.वह सरकारी नौकरी पाने भी प्रयास रहा था.
उस दिन वह दोपहर को घर आया. मां ने  परितोष को भोजन परोसते हुए पूछा- यिों रे परितोष ,कुछ रूपए तुम्हारे सेठ ने दिए..।
- नहीं मां...। परितोष भोजन का निवाला मुंह में डालतेे हुए कहा.
-खैर,कोई बात नहीं.कल तुम्हें साक्षात्कार में जाना है न.माधुरी के सामने अपनी समस्या को रखी तो उसने झट से पचास रूपए निकाल कर दी है.कह रही थी - मां जी दुनिया में भगवान किसी को जन्म देता है तो वह उसके पेट की भी व्य वस्था करता है.जब भी तकलीफ हो मुझसे कह दिया करो.मैं सहयोग करदिया करूंगी...पर बेटा उसे यिा पता कि पैसा ही आपस में फूट पैदा करता है.पर वह मानी नहीं उसने कहा मानव मानव का काम आये य ही दुनिया की सबसे बड़ी संपत्ति है .
माधुरी तो सेठ की कन्या पर उसके पिता जी और उसमें काफी असमानता थी.जहंा एक नंबर का कंजूस उसके पिता थे उससे कही ज्यादा कंजूसी में आगे उसकी मां थी.कंजूसी उन दोनों को ऐसा कोई भी काय र् करने से रोक देता था जो जनहिताथर् हो मगर उनकी पुत्री माधुरी उन दोनों के व्य वहार से एकदम अलग थी. वह सदैव दूसरों के हित की सोच ती.य ही कभी कभी सोच ने बाध्य  कर देता कि उनका खून होते हुए भी व्य वहार मे असमानता यिों ?संभव है रI एक होते हुए भी विचार में असमानता आ जाये य ही कारण ही तो था उनके माता पिता और माधुरीक के व्य वहार में असमानता का.इसे खानदान की देन न मान कर स्वयं के व्य क्तिव कहा जाये तो ठीक रहेगा.
समय  निकलता गया.एक अवसर ऐसा आया जब उसने बहन केे हाथ भी पीले कर दिया.अब मां भी बीमार रहने लगी थी. एक दिन उसकी मां भी इस दुनियां से सिधर गयी. इस क्षण को परितोष सुखद क्षण माने या दुखद क्षण यिोंकि जहां एक ओर मां की लाश पड़ी थी वहीं दूसरी ओर उसकी सरकारी नौकरी लगने की कागज पोýमेन थमा गया था.परितोष को मां की वह वायि  याद आने लगा जिसे उसने बार बार परितोष से कहा था-समय  पर सारे घाव भर जाते हैं.आदमी को अपने कमर् क्षेत्र मे डंटे रहना चाहिए उसे सफलता मिलती ही है....।
वास्तव में समय  पर उसे सफलता मिल गयी थी.उसका घाव तो भर गया था पर वह न जी भर कर रो पा रहा था और न हंस पा रहा था.....।

रविवार, 6 मार्च 2016

देवकुंवर

     सुरेश सर्वेद

     डबरी गाँव के बाहर एक झोपड़ी थी। उस झोपड़ी में एक महिला रहती थी। उस महिला का नाम देवकुंवर था। देवकुंवर के विषय में ग्रामीणों की धारणा कुछ अच्छी नहीं थी। ग्रामीण मानते थे  - वह सोधी हुई टोनही है। उसकी नजर जिस पर पड़ती है, वह समस्याग्रस्त हो जाता है। उसके परिवार में अनिष्ठ ही अनिष्ठ होता है। अमंगल ही अमंगल होता है। वह ग्रामीणों से उपेक्षित थी। अनादरित थी। वह चाह कर भी उस गाँव को त्याग नहीं सकी। वह उस गाँव में बहू बन कर आई थी। विवाह के कुछ महीने बाद उसके पति का निधन हो गया। उसके बाल बच्चे नहीं हुए थे। उस पर परिवार जनों द्वारा तरह तरह के आरोप लगाए गए। उसे घर परिवार, गाँव छोड़कर जाने विवश किया गया। पति के निधन के लिए भी उसे जिम्मेदार ठहराया गया पर सच्चाई कुछ और था।  उसने ठान ली थी कि डाोली आई है तो लाश भी इसी गाँव से निकलेगी। ग्रामीण उससे दूर भागते थे। उसे देखकर रास्ता बदल लेते थे। उसने गाँव के बाहर एक झोपड़ीनुमा मकान का निर्माण किया। वह उसी में रहने लगी। उसे गाँव के लोग काम नहीं देते थे। वह आस पास के गाँव में जाकर मजदूरी करती थी।
     उसी गाँव में एक ब्राम्हण परिवार रहता था। ब्राम्हण गाँव डबरी में यजमानी तो करता था, आस पास के गाँवों में भी उसकी यजमानी चलती थी। इसी से उस ब्राम्हण के परिवार का पालन पोषण होता था। ब्राम्हण की पत्नी भी देवकुंवर से भय खाती थी। गाँव की अन्य महिलाएं जैसे देवकुंवर को देखकर अपने बच्चे को  छिपा लेती थी, ब्राम्हण की पत्नी भी अपने बच्चे को छिपा लेती थी।
     उस वर्ष आकाल की आशंका सिपच रही थी। बारिस का माह था। आसमान साफ रहता था। बारिस की संभावना थम गई थी। अकाल की आशंका से सिर्फ किसान ही निराश नहीं थे, मजदूर वर्ग भी परेशान थे। देवकुंवर तक को उसने अपने लपेटे में ले लिया था।
     उस दिन देवकुंवर ब्राम्हण के घर पहुंच गई। ब्राम्हण के बच्चे छपरी में थे। बच्चे नंग - धड़ंग खेलने में मशगुल थे। देवकुंवर को देखकर ब्राम्हण और उसकी पत्नी हड़बड़ा गए। अवसर ऐसा था - बच्चों को छिपाना भी मुश्किल था। देवकुंवर ने आग्रह अनुग्रह का अवसर नहीं दिया। वह छपरी में ही बैठ गई। ब्राम्हण, देवकुंवर के समक्ष आया। भीतर के भूचाल को दबाते हुए पूछा - माई, यहां आना कैसे हुआ।
- महाराज, कुछ दिनों से मेरे मन में एक आकांक्षा जागृत हुई है। देवकुंवर ने कहा।
- कौन सी आकांक्षा ....। ब्राम्हण ने पूछा।
     छपरी से आकाश साफ - साफ दिख रहा था। देवकुंवर ने आकाश की ओर देखते हुए कहा - लगता है, इन्द्रदेव नाराज है। बारिस हो नहीं रही है। अकाल की संभावना बढ़ती जा रही है।
- हाँ माई, पर हम कर भी क्या सकते हैं?
- सोचती हूं, इन्द्रदेव को प्रसन्न करने पूजा - पाठ कराऊं। संभव है - जप - तप से बारिस हो जाये। मेरे हाथ कुछ जनहित का कार्य हो जाये।
     देवकुंवर की बात सुनकर ब्राम्हण के साथ उसकी पत्नी भी अवाक थी। जिस महिला के प्रति गाँव के सौ प्रतिशत लोगों में दुर्भावना थी। जिससे लोग कतराते थे। हेय - दृष्टि  से देखते थे। जिसकी छाया से ग्रामीण भय खाते थे। उसके मुख से गांव हित की बात निकलना आश्चर्य ही था। दोनों के मन में आया - वह महिला जो सदैव अपमान, निरादर का जीवन व्यतीत कर रही है, वह गाँव हित, जनहित की भावना रख सकती है। ब्राम्हण ने पूछा - मुझसे क्या चाहती है माई ?
- मैं जानती हूं, आप गरीब ब्राम्हण हैं। आप अन्न या द्रव्य सहयोग नहीं कर सकते। मैंने इधर - उधर से कुछ धन संग्रह किया है। संग्रहित धन इतना तो अवश्य है जिससे पूजा की सामाग्री खरीदी जा सके। ब्राम्हण को दक्षिणा दिया जा सके।
     ब्राम्हण और उसकी पत्नी देवकुंवर की बात सुनते रहे। देवकुंवर कहती चली गई - मैं चाहती हूं, यह पूजा पाठ तीन दिनों तक चले। आप पुजारी बने। इस अवधि में आप सपरिवार अन्न - जल मेरे घर में ही ग्रहण करें...। मैं इतना अवश्य जानती हूं- जिस प्रकार ग्रामीणों के मन में मेरे प्रति विचार है, आप लोग भी  उस विचार से मुक्त नहीं है। पर विश्वास है, आप मेरे आग्रह का अनादर नहीं करेंगेे।
     देवकुंवर अपनी बात रखी। उठी और अपनी झोपड़ी की ओर चल पड़ी। देवकुंवर चली गई थी। उसका प्रस्ताव ब्राम्हण के घर पड़ा था। ब्राम्हण और उसकी पत्नी में रायशुमारी चलने लगी। ब्राम्हण के परिवार का भरण पोषण पूजा - पाठ से होता था। फसल होगी तभी तो लोग पूजा पाठ करवाएंगे। ब्राम्हण परिवार के लिए अकाल मृत्यु दोनों ओर थी  - टोन्ही के खा जाने से या फिर अकाल की स्थिति में पूजा पाठ नहीं होने से। बार - बार उनके सामने यही बात उभरती रही कि देवकुंवर सोधी टोन्ही है। कई लोगों को उसकी नजर लग चुकी है। कई लोगों को वह खा गई है। उस महिला के प्रस्ताव को स्वीकार किया जाये या खरीज। बहस के बाद ब्राम्हण और उसकी पत्नी में एक राय बनी - क्यों न देवकुंवर के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जाये। ब्राम्हण ने देवकुंवर की झोपड़ी में पूजा - पाठ करने का निश्चय कर लिया। ग्रामीणों ने बहुत समझाने की कोशिश की गई। उसे व उसके परिवार को उस झोपड़ी में न जाने कहा गया पर ब्राम्हण नहीं माना। वह परिवार समेत झोपड़ी में पहुंच गया। देवकुंवर ने ब्राम्हण परिवार का स्वागत किया। कहा - मुझे विश्वास था, आप परिवार मेरे आग्रह को अस्वीकार नहीं करेंगे।
     देवकुंवर की जो तस्वीर गाँव में खीची गई थी। जिस प्रकार की कहानियाँ उसके प्रति गढ़ी गई थी, भांतियां फैलाई गई थी। ब्राम्हण व उसकी पत्नी देवकुंवर की झोपड़ी में पहुंचकर भी शंका - आशंका के बीच झूल रहे थे। ब्राम्हण ने देवकुंवर की आतिथ्य स्वीकारते हुए कहा - माई, आपके प्रति गाँव में कई तरह की चर्चाएं हैं, बावजूद मैं आपके आग्रह पर सपरिवार यहां आया हूं। आप अकेली हैंं। कहीं भी मजदूरी कर जीवन चला सकती हैं। मेरे पीछे चार और पेट हैं। आप किस उद्देश्य से ऐसा आयोजन कर रही हैं, आप ही जाने पर मेरा उद्देश्य एकदम साफ है - मैं अपने परिवा के हित के लिए आपकी बात स्वीकारी है। मैं और मेरा परिवार जाते जाते आपको उम्र भर स्वस्थ, सानंद, समृद्ध रहने का आशीष देते जायेंगे। मेरे परिवार का अहित न हो इसका आपको ख्याल रखना पड़ेगा।
     देवकुंवर ने कुछ नहीं कहा। वह ब्राम्हण परिवार को झोपड़ी के भीतर एक खोली में ले गई। वहां पूजा के समान रखे थे साथ ही ब्राम्हण परिवार के भोजन के लिए सामग्रियाँ रखी गई थी।
     पूजा शुरु हुई। झोपड़ी की खपरैल को पार कर हवन कुंड से धुआँ उड़ने लगी। शंख और घंटी के साथ ब्राम्हण का शास्त्र उच्चारण आकाश में तैरने लगा। गाँव में कौतुहल थी। ग्रामीण जानना चाहते थे - आखिर, देवकुंवर क्या करवा रही है? वह कौन सा अनुष्ठान करवा रही है? अनुष्ठान किस उद्देश्य से करवा रही है। गाँव के हित के लिए या अहित के लिए। ग्रामीण जानना चाहते थे पर अज्ञात आशंका और भय ने उन्हें रोक रखा था।
     आज पूजा - पाठ - हवन का तीसरा दिन था। सुबह से ही सूर्यदेव नदारत थे। काले - काले बादल आसमान में मंडरा रहे थे। हवा शांत थी। उमस की तीव्रता बढ़ गई थी। उमस की व्यापता के कारण ग्रामीण बेचैन थे। धरती की बेचैन भी बढ़ चुकी थी। शांत पवन, उमस की तीव्रता संकेत दे रही थी कि आज बारिस होकर रहेगी। देवकुंवर की झोपड़ी से झोपड़ी के खपरैल को चीरकर ब्राम्हण का मंत्रोच्चार और हवन कुंड का धुआँ आकाश की ओर गमन कर रहा था। पूर्णाहुति का समय जैसे - जैसे निकट आ रहा था, बादल की गड़गड़ाहट तेज होती जा रही थी। बिजली चमकने लगी थी। अंतिम पूर्णाहुति के साथ शंख, घंटी की ध्वनि जैसे - जैसे तेज हो रही थी - मेघ ज्योति कड़क रही थी। बादल तड़क रहे थे। कुछ ही देर में धरती की उमस मिटाने बूंदा बांदी शुरू हो गयी। धीरे - धीरे बिजली की कड़क और बादल की गरज के साथ मूसलाधार पानी बरसना शुरु हो गया।
     देवकुंवर मारे खुशी के झोपड़ी से बाहर निकल गई। वह बारिस में भींगने लगी। ग्रामीण आश्चर्य में थे। जहाँ वर्षा की कोई संभावना नहीं थी, वहां मूसलाधार बारिस शुरु हो गयी थी। किसान - खेतिहर मजदूरों की बांछे खिल गई। मुरझाये चेहरे पर मुस्कान तैरने लगी। किसान मजदूर भूल गये कि यह बारिस उस महिला कि तपस्या, जप, तप से हो रही थी, जिससे सब भय खाते थे। वे हल लेकर खेत की ओर दौड़ पड़े। उत्सुकता इतनी थी कि कई किसान धोती भर लपेटे खेत की ओर उस दिशा से दौड़ पड़े जिधर देवकुंवर की झोपड़ी थी। किसान, मजदूरों की पत्नियाँ हिदायत देती रही कि उघड़ा देह जाओगे तो देवकुंवर की नजर लग जायेगी पर किसी ने नहीं सुनी। उन्हें तो इसी क्षण की प्रतीक्षा थी। वे खेतों में पहुंच गये - खेत जोतने, बीज बोने, फसल उगाने ....।
     देवकुंवर खुश थी, बहुत खुश। उसने ब्राम्हण को दान दक्षिणा दी। ब्राम्हण परिवार अपने घर की ओर प्रस्थान करने लगे। इसी क्षण कुछ किसान देवकुंवर की दरवाजे पर आकर खड़े हो गये। देवकुंवर असमंजस में थी। वह परात भर प्रसाद ले आयी। ग्रामीण प्रसाद लेने हाथ बढ़ा दिये। देवकुंवर उन्हें प्रसाद देने लगी। ब्राम्हण ने कहा - माई की नजर लग गयी तो .....।
     किसी ने कहा - जब की तब देखा जायेगा। और उपस्थित ग्रामीण हंस पड़े । इसी के साथ बरस रहा पानी में सभी लोग नाचने लगे साथ ही देवकुंवर भी ....।    
गली नं: 5, एकता चौंक ,ममता नगर,
राजनांदगांव(  छत्‍तीसगढ़ )

गुरुवार, 7 जनवरी 2016

दयामृत्‍यु

सुरेश सर्वेद

          स्कड प्रक्षेपास्त्रों को आकाश में ही नष्ट करने पैट्रियड का अविष्कार हो चुका हैं पर तार पेट्रोल और बेल्ट बम धड़ल्ले से प्रयुक्त हो रहे है. आतंकी अपनी कमर में बेल्ट बम बांध कर जाता है और बटन दबाकर विस्फोट कर देता है. इससे लाशें बिछ जातीं हैं. यद्यपि मेटल डिटेक्टर बमों की उपस्थिति की जानकारी देता है पर उन्हें तत्काल नष्ट नहीं कर पाता. इसी विषय को लेकर वैज्ञानिकों की ‘ विज्ञान भवन ‘ में बैठक थी. वहां आकाश और नीलमणी भी उपस्थित थे. नीलमणी ने अपनी बात रखी - ‘ मित्रों,हम एक ऐसे बम का निर्माण करें कि बमों की उपस्थिति का पता तो लगे साथ ही वे तत्काल निष्क्रिय भी हो जाये. साथ ही अपराधी की पहचान भी बता दें. . . . ।‘
          वैज्ञानिक गंभीरता पूर्वक विचार कर ही रहे थे पर उन्हें प्रश्न का उत्तर नहीं मिल रहा था . उधर आकाश के ओंठो पर मुस्कान थी. दरअसल उसने पूर्व में ही इस विषय पर विचार किया और उसने ‘सेफ्टी लाइफ‘ नामक यंत्र बनाने का काम भी प्रारंभ कर दिया. इस यंत्र में उपरोक्त चिंतन के समस्त उत्तर समाहित थे. आकाश ‘सेफ्टी लाइफ‘ बनने के बाद वैज्ञानिकों को हतप्रभ करना चाहता था इसलिए उसने अपने अनुसंधान की चर्चा अब तक कहीं नहीं की थी. अभी वैज्ञानिक चिंतन कर ही रहे थे कि एक धमाका हुआ. दरअसल प्रणव उच्‍च शिक्षा प्राप्त युवक था. वह शासकीय सेवा में नहीं था. उसने कई विषयों पर वैज्ञानिक द्य्ष्टि से शोध किया था. उसने अपनी उपलब्धियों का प्रदर्शन करना चाहा पर उसकी बातों को सबने हंसी में उड़ा दिया. संवादहीनता और उपेक्षा के कारण उसकी प्रतिभा दबती गई. इससे क्षुब्ध होकर वह एक हिंसक गुट में शामिल हो गया. उस गुट का नाम ‘क्रांतिकारी चीता दल ‘ था. जिसे संक्षिप्त में ‘ क्राचीद ‘ कहा जाता था. उस गुट मे कानून विद् ऋषभ , अर्थशास्त्री विश्वास जैसे अनेक लोग थे. विश्वास को पकड़ने के लिए सरकार ने दस लाख का पुरस्कार रखा था.
          ‘ क्राचीद ‘ आर्थिक दृष्टि  से कमजोर था. विश्वास चाहता था कि रुपये ‘ क्राचीद ‘ के काम आयेउसने स्वयं को पकड़वाने के लिए पुलिस को अपना पता दे दिया. साथ ही कहा कि पुरस्कार के रुपये प्रणव को मिले. पर सरकार ने विश्वास को गिरफ्तार तो करवा ली मगर पुरस्कार की राशि प्रणव को देने के बजाय उसकी खोज बीन शुरु कर दी इसकी खबर जैसे ही प्रणव को लगी वह छिपे -छिपे रहने लगा. उसमें उग्रता आ गई थी. उसे जैसे ही विज्ञान भवन में वैज्ञानिको की बैठक होने की सूचना मिली. वह बेल्टबम कमर में बांध कर ‘विज्ञान भवन ‘ में जा पहुंचा और बटन दबा दिया इससे जोरदार धमाके के साथ विस्फोट हुआ . इस विस्फोट से सात वैज्ञानिको के अंग क्षत -विक्षत हो गए. नीलमणी की टांगे और भुजाएं शरीर से अलग हो गयी. प्रणव का शरीर कई टुकड़ों में बंट गया. प्रणव ने दूसरों के तो प्राण लिया पर स्वयं के प्राणों की रक्षा नहीं कर सका. आत्मघाती का भयावह पक्ष यही होता है कि वह दूसरों पर हमला करने से पूर्व स्वयं को मृत समझता है. घायल और बेहोश वैज्ञानिकों को अस्पताल लाया गया. उसमें आकाश भी था. उसके शरीर से छर्रे निकाले गये. रक्त देकर उपचार की व्यवस्था की गई. कई घण्टों बाद उसकी चेतना लौटी.
          चेतनावस्था में आते ही आकाश पीड़ा से छटपटा उठा. चिकित्सकों ने उसे ढाढस बंधाया पर सहानुभूति से उसकी पीड़ा खत्म नहीं होनी थी. उसकी व्याकुलता को देखना सामर्थ्य से बाहर था. यद्यपि आकाश का सतत उपचार चल रहा था पर कोमल स्थल पर चोंट लगने के कारण उसकी पीड़ा ज्यों की त्यों बनी हुई थी. आकाश ‘सेफ्टी लाइफ ‘ को पूरा करना चाहता था इसके लिए वह जीना चाहता था पर असहनीय पीड़ा ने उससे जीने का साहस छीन लिया था. अब वह मृत्यु चाहने लगा था. उसने अपने अधिवक्ता सुमन के द्वारा न्यायालय में ‘ दयामृत्यु ‘ के लिए आवेदन कर दिया. ‘दयामृत्यु ‘ एक जटिल प्रश्न है. विश्व की न्याय पालिका असमंजस में है कि दयामृत्यु दी जाये या नहीं. आवेदन प्रस्तुत होने के बाद शासकीय अभिभाषक बालकृष्ण ने इसका विरोध किया. कहा-न्यायालय को दयामृत्यु की छूट नहीं देनी चाहिए. यदि न्यायालय दयामृत्यु को इजाजत देना शुरु कर दिया तो इसका दुष्परिणाम यह होगा कि चिकित्सक अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटेगे. वे असाध्यरोग से ग्रस्त व्यक्तियों और वृद्धों को स्वस्थ करने की जिम्मेंदारी से पीछे हटेगें. व्यक्ति सामान्य से रोग को लेकर बवाल पैदा करेगा और छोटे छोटे रोगेा से मुक्ति पाने दयामृत्यु की मांग करेगा जबकि ऐसे रोगों का उपचार से निदान संभव होगा. आकाश के अधिवक्ता सुमन ने अपना पक्ष रखा. कहा-शासकीय अभिभाषक का तर्क ग्राह्य है लेकिन जिसका जीवन मृत्यु से बदतर हो. भविष्य कष्ट के सागर में गोते खा रहा हो,वह दयामृत्यु पाने का अधिकारी है. जहां तक मेरे पक्षकार आकाश की बात है तो वर्तमान में वह इसी वर्ग में आता है. न्यायालय से निवेदन है कि वह मेरे पक्षकार की स्थिति को देखते हुए उसके आवेदन पर सहानुभूति पूर्वक विचार करने की कृपा करें.
          माननीय न्यायाधीश नागार्जुन ने वकीलों के तर्को को गंभीरता पूर्वक सुना. वे स्वयं आकाश की स्थिति को देखना चाहते थे ताकि निर्णय देने में आसान हो . वे अस्पताल परिसर पर पहुंचे कि एक पीड़ायुक्त चीख से वे ठिठक गये . उन्होंने उस पीड़ायुक्त चीख के संबंध में जानना चाहा तो उन्हें बताया गया कि यह चीख आकाश की है. आकाश की तड़पन और व्याकुलता ने न्यायाधीश को झकझोर कर रख दिया. उन्होंने आकाश के ‘दयामृत्यु ‘ के आवेदन को स्वीकृति दे दी. आवेदन स्वीकृति की चर्चा दावानल की तरह फैली. इसका समाचार चन्द्रहास को मिला. वह बेचैन हो गया. चन्द्रहास ‘ मानव सुरक्षा संघ‘ संस्था से संबन्धित था. यह संस्था ‘मासुस ‘ के नाम से चर्चित था. उसमें भी अनेक प्रतिभावान व्यक्ति शामिल थे. मासुस के सदस्य हिंसा एवं आतंकवाद के विरोधी थे. वे क्राचीद के हिंसक प्रवृत्ति क ी आलोचना करते. उनका मानना था कि व्यक्ति हिंसा करने के बाद अपने मूलउद्देश्य से भटक जाता है. वह समाज का हितैषी बनने के बदले समाज का शत्रु बन जाता है. उसे छिपकर रहना पड़ता है तो वह अपनी विद्या या अनुसंधान को कहीं बता नहीं पाताऔर इस तरह वह अपने हाथों अपनी प्रतिभा को नष्ट कर लेता है. मासुस का कहना था कि क्राचीद अपने कार्यशैली में बदलाव लाकर समाज हितार्थ कार्य का सम्मादन करें. आकााश के द्वारा बनाया जा रहा सेफ्टी लाइफ की जानकारी चन्द्रहास को थी.
          यदि आकाश की मृत्यु हो जाती तो सेफ्टी लाइफ का कार्य अधर में लटक जाता. चन्द्रहास ने ‘मासुस ‘ के सदस्यों की बैठक रख कर कहा कि किसी भी स्थिति में आकाश को जीवित रखना है. इसके लिए चाहे कोई भी कदम उठाना क्यों न पड़े ? इधर न्यायालय ने आकाश को दयामृत्यु देने डा. महादेवन को नियुक्त किया था. डा. महादेवन अस्पताल जाने निकला ही था कि उसका पुत्र सौरभ सामने आ गया. वैसे सौरभ उसका सगा पुत्र नहीं था. एक महिला अस्पताल में आयी. वह गर्भवती थी. उसने सौरभ को जन्म दिया और उसे वहीं छोड़ कर कहीं चली गयी. सौरभ का कोई पालक था नहीं इधर डा. महादेवन की एक भी संतान नहीं थी. उसने सौरभ को अपने पास रख लिया और उस पर पिता का प्यार उड़ेलने लगा. सौरभ ने रुष्ट स्वर में कहा- पापा, आप मुझ पर कभी ध्यान नहीं देते . सदैव मरीजों के पीछे भागते रहते हैं. आपको दूसरों की जान बचाने की ही चिंता रहती है. सौरभ के आरोप से महादेवन विचलित नहीं हुआ. उसने प्यार का हाथ उसके सिर पर फेर कर आगे बढ़ लिया. . . . . । दवाई के दुष्प्रभाव से धंनजय की मृत्यु हो गयी. इससे डा. महादेवन को जनाक्रोश का सामना करना पड़ा. उसे हत्यारा तक कहा गया. महादेवन को मानसिक त्रासदी भोगनी पड़ी. उसे अपमानित भी होना पड़ा मगर उसमें न हीनता आयी और न हताशा आया क्योंकि उसने जो दवाई मरीज को दिया था वह उसके जीवनदान के लिए थी मगर उसका प्रभाव उल्टा पड़ा. आज महादेवन विचलित था उसे ऐसे व्यक्ति को मारना था जिसने न उसका अहित किया था और न उससे किसी प्रकार की शत्रुता थी. डा. महादेवन आकाश के पास पहुंचा. आकाश ने उसे देखा. महादेवन को लगा -आकाश व्यंग्य कर रहा है. कह रहा है- आओ डा. ,आओ. तुम उपचार करके मेरी पीड़ा तो खत्म नहीं कर सकते. हां,अपनी जिम्मेदारी को कायम रखने मुझे मार अवश्य सकते हो. . . . ।
          डा. महादेवन मन ही मन बड़बड़ा उठा- हां-हां,मैं तुम्हें अवश्य मारुंगा. . . . . । डा. महादेवन अपना कार्य प्रारंभ करना चाहता था. वह आकाश के पास गया. उसका साहस जवाब देने लगा. उसने साहस संचय करने का प्रयास किया. मगर वह अपने को असहाय सा महसूस करने लगा. वह मन ही मन बड़बड़ा उठा-यह व्यक्ति मेरा लगता ही क्या है. न्यायालय ने मुझे इसके प्राण हरने का आदेश दिया है. मैं न्यायालय के आदेश का निरादर कर न अपनी नौकरी खोना चाहूंगा और न ही इसे जीवन दान देकर हंसी का पात्र बनाना चाहूंगा. मृत्यु मशीन को आकाश के पास लाया गया. डा. महादेवन को अब बस बटन दबाना था. उसके हाथ बटन के पास पहुंचा कि लगा-‘लकवा मार गया. उसकी बटन दबाने की शक्ति जाती रही. ‘ डा. महादेवन चुपचाप कमरे से बाहर निकल गया. कमरे से बाहर आते ही उसे लगा - सिर से भारी बोझ उतर गया. उसने शान्ति का अनुभव किया. न्यायालय के आदेश नहीं मानने के कारण डा. महादेवन को निलम्बित कर दिया गया . उसके स्थान पर डा. सुरजीत को यह कार्य सम्पादन करने की जिम्मेदारी सौंप दी गई. ‘मासुस ‘ अपने उद्देश्य की सफलता के लिए योजना बनाने लगे. वह वहां से आकाश को हटाकर एक लाश को चुपचाप रख दिया. इस सफलता से मासूस के सदस्य प्रसन्न थे.
          इधर डा. सुरजीत को अपना कार्य संपन्न करना था. वह जब आकाश के पास गया तो उसने पाया वह चुपचाप पड़ा है. डा. सुरजीत ने उसका चेहरा तक नहीं देखा और लाश को आकाश समझ उसके भुजा में एक सुई चुभोयी. इससे खारा जल प्रविष्ठ हुआ. फिर उसने मृत्यु मशीन का बटन दबा दिया कि सुई के द्वारा उसके हृदय में दर्दनाशक प्रशामक द्रव्य प्रवाहित हुआ अंत में घातक पोटेशियम क्लोराइड प्रवेश कर गया. बाद में उसे मृत घोषित कर दिया गया. न्यायालयीन कार्यवाही के अनुसार तो आकाश की मृत्यु हो चुकी थी पर वास्तव में वह जीवित था. उसे तो ‘मासुस ‘ ने पूर्ण सुरक्षा के साथ अपने पास रखा था. मासुस आकाश का उपचार अपनी विधी से करने लगा. उपचार से आकाश स्वस्थ हो गया. वह पुनः ‘ सेफ्टी लाइफ ‘ को पूरा करने जुट गया. एक अवसर ऐसा आया कि उसने सेफ्टी लाइफ को पूर्णरुप देने में सफलता हासिल कर ली. मासुस को समय -धन-बुद्धि का व्यय करना पड़ा था. इसका पुरस्कार यह मिला कि ‘सेफ्टी लाइफ ‘ के निर्माण में उसके योगदान को महत्वपूर्ण माना गया. कर्तव्य के निर्वहन में उदासीनता के आरोप से डा. महादेवन बच नहीं पाया था. उसकी जीविका छीन गई थी. उसे आर्थिक कठिनाइयों से जूझना पड़ रहा था. एक दिन उसे पता चला कि आकाश तो जीवित है. वह आकाश की खोज करने लगा और उसने आकाश को पा ही लिया. उसने आकाश से कहा- तुम यहां छिपे बैठे हो. तुम्हारे कारण मेरी नौकरी गई. लोग मुझे कायर की संज्ञा दे रहे है. तुमने मानवहित के लिए ‘सेफ्टी लाइफ बनाया है. इसे अंधेरे में न रखो. इसे प्रकाश में लाओ और साथ ही मेरी जीविका वापस दिलवाओ. ‘ आकाश को अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करना था. साथ ही डा. महादेवन को न्याय दिलाना था. वह न्यायालय जाने तैयार हो गया. . . ।
          ‘ क्राचीद‘ के सदस्य ऋषभ ने एक पुस्तक लिखी थी. उसका नाम ‘न्याय और अधिकार चाहिए‘ था. उस पुस्तक में ‘ दयामृत्यु‘ पर भी विचार कि या गया था कि किस परिस्थिति में दयामृत्यु को स्वीकृति देनी चाहिए . उसने उक्त पुस्तक को कानूनविदों को पढ़ाया मगर उसे सम्मान न मिलकर उसकी लेखनी को हंसी में उड़ा दिया गया. इससे वह आक्रोशित हो गया और ‘क्राचीद में शामिल हो गया. चूंकि वह ‘क्राचीद ‘ का सदस्य थाउसमें उग्रता कूट कू ट कर भर गयी थी. व्यक्ति वातावरण और संगति के अनुसार व्यवहार करने लगता है अतः ऋषभ अवहेलित हुआ था तोउसमें उग्रता आ ही गयी थी. उसने सोचा-जब मुझे कहीं न्याय नहीं मिला तो क्यों न न्यायालय को ही उड़ा दूं ? ऋषभ ने कमर मे बेल्टबम बांधा और न्यायालय जा पहुंचा. आकाश भी डा. महादेवन के साथ वहां उपस्थित था. ऋषभ ने न्यायालय को उड़ाने बटन दबाया. बार-बार बटन दबाया पर विस्फोट नहीं हुआ. वस्तुतः आकाश के पास सेफ्टी लाइफ थी. उसके कारण बेल्टबम निष्क्रिय हो गया. ऋषभ बेल्टबम पर खींझ गया अचानक उसकी नजर आकाश की ओर गयी. उसने देखा-वह मुस्करा रहा है कार्य की असफलता से वह खीझा तो था ही उल्टा आकाश को मुस्कराते देख उसका क्रोध फनफना उठा. वह आकाश की ओर कीटकीटा कर दौड़ा. आकाश चिल्ला पड़ा- ‘ इसे पकड़ो,इसके पास बेल्ट बम है. ‘ न्यायालय में देखते ही देखते भगदड़ मच गयी.
         ऋषभ प्राण बचाकर भागना चाहा पर वह पकड़ा गया. न्यायालय ने आकाश को जीवित देखा तो अवाक रह गया. न्यायालय में विचार उठा-यह पीड़ित जीवन जी रहा था. यदि इसके आवेदन को न्यायालय द्वारा अमान्य कर दिया जाता तो स्वच्छ न्याय नहीं होता लेकिन इसे दयामृत्यु दी वह भी एक भूल थी क्योंकि यदि यह मर जाता तो मानव कल्याण के लिए जो कार्य इसने किया है वह नहीं हो पाता. न्यायालय ने स्वयं से प्रश्न किया कि उसका निर्णय सही था या गलत कोई तो बताये. . . . ।‘
          न्यायालय दुविधा में था कि ऋषभ ने अपनी पुस्तक न्यायालय को सौंपते हुए कहा-सर,सदा से यही चला आ रहा है. मेरे समान अपराधी पकड़ा जाता है. उस पर न्यायलयीन कार्यवाही होती है और अपराध प्रमाणित होने की स्थिति में उसे दण्ड दे दिया जाता है. चाहे अपराध करने के पीछे कारण कुछ भी क्यों न हो. क्या यह प्रथा चलती ही रहेगी. ‘ न्यायालय ने कहा- नहीं. . नहीं,अब ऐसी कहानी बार-बार नहीं दुहरायी जायेगी. उन्होंने पुस्तक की ओर इंगित करते हुए कहा- ‘ सेफ्टी लाइफ ‘ ने अपनी प्रतिभा का प्रमाण प्रस्तुत कर दिया. अब इसकी योग्यता को कौन नकार सकता है. यदि यह पुस्तक अपने उद्देश्य में सफल रही तो इसका सम्मान होकर रहेगा. . . . . ।

खोल न्‍याय का बंद कपाट

सुरेश सर्वेद 

'' नीलमणी भवन '' के सामने जीप चरमरा कर रुक गयी. वह भवन वनक्षेत्र पाल हिमांशु का था. जीप से आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो के क ई आरक्षक सहित अधीक्षक नित्यानंद नीचे आये. उनकी दृष्टि ने '' नीलमणी '' की भव्यता देखी. भव्यता ने स्पष्ट कर दिया कि इसके निर्माण में कम से कम पचास लाख का खर्च आया होगा. विजयानंद का आदेश मिलते ही आरक्षकों ने नीलमणी को घेर लिया. कुछ आरक्षक सहित विजयानंद भीतर गये. उन्होंने भीतर से मुख्य द्वार को भी बंद कर दिया. इस कार्यवाही से भगदड़ मचनी ही थी. आसपास के लोगो का ध्यान इस ओर खींच गया. लोग जिज्ञासा वश नीलमणी भवन के सामने जुट गये. वे आपस में कानाफूंसी करने लगे. भीतर वनक्षेत्रपाल हिमांशु उपस्थित था. विजयानंद ने उसे अपना परिचय पत्र दिखाया. कहा- हमें आपके यहां छापा मारने का अधिकार मिला है. . . ।‘
          फिर उन्होंने आरक्षकों को छानबीन करने का आदेश दिया. आरक्षक इधर उधर बिखर गये. हिमांशु को पूर्व से पता चल चुका था कि उसके घर छापा पड़ने वाला है. छापे से पूर्व स्वीकृति पत्र लेना पड़ता है. विजयानंद स्वीकृति लेने वनमंडलाधिकारी चन्द्रभान के पास गये वनमंडलाधिकारी चन्द्रभान वनसंरक्षक सीमांत की बैठक में गये थे. विजयानंद को वहां दौड़ना पड़ा । उन्होंने जब वनमण्डलाधिकारी से वनक्षेत्रपाल के घर में छापा मारने की स्वीकृति मांगी तो वनमण्डलाधिकारी ने शंका व्यक्त करते हुए कहा- स्वीकृति देना मेरे अधिकार क्षेत्र में आता है या नहीं मुझे इसकी जानकारी लेने दो तब ही मैं आपका सहयोग कर पाऊंगा. ‘ विजयानंद शंकित हो गये. उन्हें लगा- वनमण्डलाधिकारी वनक्षेत्रपाल को बचाना चाह रहे हैं. उन्होंने कहा- देखिये,यह शासकीय कार्य है. इसमें आपको सहयोग देना चाहिए. आप समय खराब मत करिये. इस बीच यदि हिमांशु अवैध सम्पति का अफरा तफरी करेगा या कहीं भाग जायेगा तो इसकी जिम्मेदारी आप पर आ सकती है. ‘ चन्द्रभान भला क्यों आफत मोल लेते. उन्होंने स्वीकृति दे दी. हिमांशु को अवसर मिल गया था. उसने बहुमूल्य वस्तुओं सहित पांच सौ ग्राम स्वर्णाभूषण कुछ जमीन के कागजात इधर उधर कर दिया. उसे लगा कि अब वह आर्थिक अपराधी के रुप में नही पकड़ा जायेगा. हिमांशु से विजयानंद पूछताछ करने लगे. यद्यपि हिमांशु निश्चिंतता व्यक्त कर रहा था पर उसकी बुद्धि अस्थिर थी. उसे कंपकंपी छूट रही थी. उसने उत्तर दिया- आपको गलत जानकारी मिली है. मेरे पास अवैध सम्पति नहीं है. ‘
          लेकिन हिमांशु का कालाधन पकड़ाता गया. उसके यहां एक करोड़ रुपए की पासबुक मिली . बैंक लाकर से पांच सौ ग्राम स्वर्णाभूषण जप्त हुआ. पचास लाख के जमीन के कागजात पकड़े गये साथ ही नीलमणी भवन तो अवैध सम्पति का साक्ष्य था ही. हिमांशु का अपराध पकड़ा गया. उसके विरुद्ध मामला दर्ज किया गया. उस न्यायालय का न्यायाधीश निर्द्वन्द थे. हिमांशु का प्रकरण दर्ज होते ही उसकी निंदा शुरु हो गयी. अधिकारी मित्र उसकी स्तरीय जीवन पद्धति से जलते थे. उन्हें प्रसन्नता होने लगी. कुछ दिन हिमांशु अधिकारी मित्रों के बीच बैठ नहीं सका. मित्रों से सामना होता तो वे मुस्काते वह भी हिमांशु के लिए असहनीय होता. उसे लगने लगा था कि उनके फंसने से अधिकारी मित्र प्रसन्न है. हां ऐसा ही होता है. व्यक्ति का जीवन सामान्य रहता है तब तक उस पर ऊंगली नहीं उठती. जैसे ही उस पर कष्ट आया या किसी प्रकरण में फंसा तो वह दुनियाँ का सबसे बड़ा अपराधी बन जाता है. उसकी बदनामी शुरु हो जाती है. यह स्थिति हिमांशु के लिए भी उपस्थित हो रही थी. वह अपने अधिवक्ता पल्लवी से मिल कर आ रहा था कि रास्ते में भाविका मिल गयी. वह नगर निगम में आयुक्त थी. हिमांशु उसे देख कर कटना चाहा मगर आमने सामने हो ही गया.
          भाविका ने हिमांशु से कहा- तुम्हारे बारे में सुना तो अच्छा नहीं लगा. मुझे तो लगता है- तुम्हारे किसी परिचित जलनखोर ने ही तुम्हें फंसाया है. ‘ भाविका की बातों ने हिमांशु को अप्रभावित रखा. उसने कहना चाहा- तुम मेरे हितैषी नहीं, तुम तो जले में नमक झिड़क रही हो. मेरे फंसने पर तुम्हें भी उतनी ही प्रसन्नता हो रही है जितनी मेरे विरोधियों को. . . ।‘ पर कुछ नहीं कह सका. वह अपनी पीड़ा दबा गया. भाविका आगे बढ़ गयी. वह ठेकेदार कामेश्वर के घर गयी. दरअसल शासन ने पांच स्थानों पर सुलभ शौचालय बनाने की स्वीकृति दी थी. भाविका इसका ठेका कामेश्वर को देना चाहती थी. उसने कहा-तुम्हें पाँच स्थानों पर सुलभ शौचालय का निर्माण करवाना है. जिसके लिए पच्‍चीस लाख की स्वीकृति मिली है. उसमें पांच प्रतिशत मुझे देना पड़ेगा. ‘ कामेश्वर ने भाविका की शर्त स्वीकार कर ली. उनमे इधर उधर की चर्चा होने लगी. इसी मध्य भाविका ने हिमांशु के संबंध में चर्चा करते हुए कहा- मैं तो हिमांशु की कर्तव्य निष्ठा से प्रभावित थी. वह तो भ्रष्ट निकला. वास्तव में वन विभाग ही भ्रष्टाचार का केन्द्र है. जब अपराधी को कठोर दण्ड मिलेगा तभी बेईमानी खत्म होगी. ‘ जब तक व्यक्ति स्वतः फंस नहीं जाता, वह अपने आप को निर्दोष ही मानता है. कामेश्वर को अपना स्वार्थ सिद्ध करना था. वह भाविका की बातों से असहमत होते हुए भी हामी भर रहा था. हिमांशु की अधिवक्ता पल्लवी थी. पल्लवी ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि तुम्हारे विरुद्ध साक्ष्य है. कानूनी कार्यवाही से अपराध प्रमाणित होने के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं. तुम्हें सजा भी हो सकती है. पर तुम घबराना मत यहां हार गये तो हम उच्‍च न्यायालय तक लड़ेगे. . . . ।
          हिमांशु सजा की बात सुन कर कांप उठा था. वह परेशान सा रहने लगा. इधर न्यायाधीश निर्द्वन्द अपने बंगले के बरामदे में बैठे थे. उनकी द्य्ष्टि चहचहाती गौरैया चिड़ियों पर थी. वस्तुतः वहां चिड़ियों की पंचायत जुड़ी हुई थी. उसमें काली नामक चिड़िया के विरुद्ध कार्यवाही हो रही थी. दरअसल चिड़ियों ने अन्न के दाने संचय कर रखे थे ताकि भविष्य में अन्न का अभाव होने पर उसकी पूर्ति हो सके. काली ने संचित अन्न से आधे को ही चुरा लिया था. सभी चिड़ियां काली के अपराध से उत्तेजित थी. सुनहरी ने कहा- काली का अपराध अक्षम्य है. उसे कड़ा से कड़ा दण्ड मिलना चाहिए. ताकि दूसरी चिड़ियां अपने समाज को हानि पहुंचाने का दुस्साहस न कर सके. ‘ - हमारे समाज की दण्ड संहिता में अपराधी को जान से मारने या एक पैर और चोंच तोड़ने का प्रावधान है. भूरी ने वजनी शब्दों में कहा- यही दण्ड काली को भी मिलनी चाहिए. ‘ पीली गंभीर मुद्रा में बैठी थी. वह पूर्व के नियमों में संशोधन कराना चाहती थी. उसने अपना तर्क प्रस्तुत किया- नहीं,हमें इस लीक से हटना चाहिए. वरना हमारे प्रजाति के लुप्त होने का खतरा बढ़ जायेगा. साथ ही जो प्रजाति बचेगी वह अपंग रहेगी. अतः दण्ड में परिवर्तन आवश्यक है. ‘
          पीली के विचारों पर सबने ध्यान दिया. उनमें जोरदार बहस छिड़ी. वे कानून में परिवर्तन करने तैयार हो गये. पंचायत ने अपने निर्णय से काली को अवगत कराया- काली,पंचायत इस निर्णय पर पहुंची है कि तुम्हें शारीरिक दण्ड न दिया जाये. तुमने आर्थिक अपराध किया है. तुम्हें इंक्यावन चोंच अन्न के दाने क्षतिपूर्ति के रुप में लाने होगे. तुम्हें यह निर्णय स्वीकार है या नहीं. . ?‘ काली अपंगता या मृत्यु दण्ड की आशंका से भयभीत थी. पर पंचायत के सौहाद्रपूर्ण निर्णय से उसके प्राण लौट आये. वह मन ही मन प्रसन्नता से बड़बड़ायी-मैं परिश्रम से और पेट काटकर अन्न जमा कर दूंगी. उसने पंचायत से कहा- मुझे कोई आपत्ति नहीं . पंचायत का निर्णय मुझे स्वीकार्य है. ‘ काली अपने कार्य में जुट गयी. उसे अन्न के दाने लाने थे. वह उड़ी तथा न्यायाधीश के बंगले की ओर गयी. वह सीधा पाकगृह में घुसी. न्यायाधीश निर्द्वन्द की जिज्ञासा प्रबल थी. उनकी दृष्टि काली को खोजने लगी. अंततः उसने खोज ही निकाला. काली चांवल के भरे ड्रम पर बैठी थी. काली ने न्यायाधीश को देख लिया. उसने चांवल निकालना बंद कर दिया. वह चुपचाप बैठी दूसरी ओर देखने लगी. तथा वह तिरछी नजर से न्यायाधीश की ओर देखने लगी. न्यायाधीश ने जानबूझ कर दृष्टि दूसरी ओर कर ली. काली को अवसर मिला. उसने चांवल पर चोंच मारा और फूर्र से उड़ गयी. न्यायाधीश देखते ही रह गये. काली को अपने कार्य की सफलता पर प्रसन्नता थी.
          न्यायाधीश के भी विचारों में उथल पुथल मचने लगा - हमारी भी न्याय व्यवस्था का जल रुककर गंदा हो गया है. समयानुसार उसका प्रवाहमान होना आवश्यक है. परिवर्तन होना चाहिए तभी मानव समाज को लाभ मिलेगा. आज हिमांशु के प्रकरण का निर्णय था. वह न्यायालय जाने निकला कि नित्यनंदन मिल गया. नित्यनंदन ने कृतज्ञता ज्ञापित करने पहले से नमस्कार किया. हिमांशु ने उसे सम्मान देने हाथ मिलाया. नित्यनंदन वन विभाग में दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी था. वह अस्थायी था. उसे कभी बिठा दिया जाता. कभी काम पर बुला लिया जाता. वह परेशान था. नित्यनंदन ने अपनी समस्या हिमांशु को बतायी. हिमांशु ने दौड़धूप कर नित्यनंदन को स्थायी वनरक्षक का पद दिलवा दिया. इससे नित्यनंदन हिमांशु का आभारी था. नित्यनंदन को ज्ञात था कि हिमांशु का आपराधिक प्रकरण दर्ज है. उसका निर्णय आज है. उसकी दृष्टि हिमांशु पर जा टिकी. वह कह रही थी- इसने मेरी रोजी रोटी की व्यवस्था की. मेरा भविष्य बनाया. मैं इसकी विपत्ति के समय सहायता करने में असमर्थ हूं. हिमांशु वहां से न्यायालय पहुंचा. न्यायाधीश निर्द्वन्द अपनी कुर्सी पर बैठ चुके थे.
          वहां भृत्य पक्षकारों की पुकार करने लगा. हिमांशु कारावास की सजा मिलने के डर से भयभीत था. उसकी पुकार हुई तो वह कटघरे में जा खड़ा हुआ. न्यायाधीश निर्द्वन्द उत्साहित दिख रहे थे. मानों किसी विजय यात्रा पर निकले हो. उन्होंने निर्णय दिया- हिमांशु का अपराध प्रमाणित हो गया है. न्यायालय इस निर्णय पर पहुंचा है कि हिमांशु पद पर पूर्ववत बना रहेगा. उसे पदोन्नति का भी अवसर दिया जायेगा. लेकिन उसके वेतन से पच्‍चीस प्रतिशत की कटौती होगी और पेंशन से बीस प्रतिशत. वह धनराशि शासकीय कोष में जमा होगी. ‘
          इस निर्णय से हिमांशु ही नहीं अपितु अधिवक्ता पल्लवी भी अवाक रह गयी. कानून में उपरोक्त दण्ड का प्रावधान नहीं था. पल्लवी ने हिमांशु से कहा-न्यायालय का निर्णय तुम्हारे लिए हानिकारक है. तुम्हारा वेतन कटेगा. पेंशन में भी कटौती होगी. तुम क्या खाओगे. तुम्हारा भविष्य अंधकार में चला जायेगा. इसके विरुद्ध तुम उच्‍च न्यायालय में मुकदमा लड़ो. तुम्हें बचाने मैं हर संभव प्रयास करुंगी. तुम निरपराध सिद्ध होकर रहोगे. हिमांशु को अधिवक्ता का कहना अपने पक्ष में लगा. उसके बहकावे में आता कि उसे न्यायालय की दौड़धूप का स्मरण आ गया. उसे कई पेशी दौड़नी पड़ी थी. आर्थिक हानि तो उठानी पड़ी साथ ही मानसिक त्रासदी के साथ समय भी गंवाना पड़ा था. अब वह इस क्रमबद्धता को दुहराना नहीं चाहता था. उसने सोचा-अपराध प्रमाणित होने पर भी मेरी नौकरी नहीं गयी. कारावास का दण्ड नहीं मिला. हां,वेतन और पेंशन में कटौती होगी. मैं उच्‍च स्तरीय जीवन यापन से वंचित रहूंगा लेकिन निकिृष्ट जीवन तो जीना नही पड़ेगा और फिर पदोन्नति के लिए भी तो बाधक नहीं है. उसने उच्‍च न्यायालय मे अपील करने की बात अस्वीकार कर दी. हिमांशु के प्रकरण की जानकारी भाविका को मिली.
            वह सकते में आ गयी. वह विचारने लगी- जो व्यक्ति घूस देता है वही पकड़वा देता है. मुझे भी किसी ने फंसा दिया तो प्रकरण दर्ज होगा. अपराध प्रमाणित होने पर वेतन कटेगा. उसके विचार ने दूसरा पहलू बदला-शासन आराम से मुझे खाने पीने लायक परिवार चलाने लायक रुपये दे रहा है फिर घूंस लेकर कर मुसीबत मोल लेने का प्रयास क्यों करुं ? वह कामेश्वर के पास गयी. कहा- देखो,सुलभ शौचालय को मजबूत और टिकाऊ बनाना है. उसमें उच्‍च स्तर का छड़ सीमेंट ईंट लगना चाहिए. रुपये जनता के है. जनहित में कार्य होना चाहिए. अगर किसी प्रकार की धांधली हुई या शिकायत मिली तो बिल रोक दूंगी. ‘ कामेश्वर क्षण भर भाविका का मुंह ताकता रहा. उसमें शंका उत्पन्न हो गयी-भाविका को अधिक प्रतिशत देने वाला कोई दूसरा ठेकेदार तो नहीं मिल गया. उसने कहा- यदि आपको पांच प्रतिशत कम पड़ रहे हैं तो मैं और बढ़ा सकता हूं. ‘ - मुझे लेन देन से मतलब नहीं है. बस रुपयों का सदुपयोग होना चाहिए. ‘ भाविका अपनी बात पर अटल थी. अंततः कामेश्वर को उसकी बात माननी ही पड़ी. कहा- ठीक है. आपकी मंशा के अनुरुप ही सुलभ शौचालय बनेंगे. ‘ भाविका को लगा कि अपराध के फंदे से उसका गला मुक्त हो गया. साथ ही उसके वेतन की कटौती नहीं हो रही है. . . . . ।
          न्यायाधीश निर्द्वन्द जितने भी निर्णय दे रहे थे वह द. प्र. सं. के अनुसार न होकर स्व विवेक से लिये गये निर्णय के अनुसार था. उनके निर्णय स्वस्थ और मौलिक थे. वे आरोपियो के हित में थे. लाभकारी निर्णय पक्षकारों पर भारी नहीं पड़ रहा था. पर अधिवक्ताओं को इसमें अपना अहित दिखा. पक्षकार दण्डित होने पर उसे सहजता से स्वीकार कर लेते. वे उकसाने पर भी आगे मुकदमा लड़ने से इंकार कर देते. साथ ही वे अधिवक्ताओं से बचने लगे. इससे अधिवक्ताओं की रोजी रोटी छिनने लगी. उन्होंने न्यायाधीश निर्द्वन्द का विरोध करना शुरु कर दिया. अपना प्रभुत्व पुनः स्थापित करना था अतः वे षड़यंत्र रचने लगे. इसे कार्य रुप में परिणित करने वे कानून का सहारा लेने लगे. अधिवक्ताओं का संघ था. उसने न्यायाधीश निर्द्वन्द की कार्य विधि के विरुद्ध उच्‍च न्यायालय में याचिका दायर कर दिया. दायर याचिका में कहा गया कि न्यायाधीश निर्द्वन्द ने न्याय प्रक्रियाओं का उल्लंघन किया है. उन्होंने शासन के संहिता के अनुरुप निर्णय न देकर घर का कानून लागू कर दिया है. उनका निर्णय द.प्र.सं. के अनुसार नहीं है. इससे दप्रस की अवमानना हुई है. उनकी मनमानी से लगता है कि उनकी बुद्धि विक्षिप्त हो चुकी है.
          न्यायपालिका का भविष्य खतरे में है अतः न्यायाधीश निर्द्वन्द को निर्णय देने के अधिकार से वंचित रखा जाये. अधिवक्ता संघ के कर्मों की जानकारी न्यायाधीश निर्द्वन्द को मिली. वे विचलित हो उठे. वे अंर्तसोच में पड़ गये- क्या मेरी बुद्धि विक्षिप्त हो चुकी है ? ‘ उन्होेने अपने निर्णय का विश्लेषण किया. पुनर्परीक्षण से दिया गया निर्णय सही लगा. पर उन्हें बुद्धि विक्षिप्तता पर अभी भी शक था. वे परीक्षण कराने मनोचिकित्सक अनुश्री के पास पहुंचे. वहां सचिन भी था. वे न्यायाधीश के निर्णय से अवगत हो चुके थे. अनुश्री ने सचिन से कहा-न्यायाधीश निर्द्वन्द ने न्यायक्षेत्र में नया रास्ता खोला है. इससे दण्डित व्यक्ति अपराध की ओर उन्मुख नहीं होगा. वह समाज से अपमानित-उपेक्षित भी नहीं होगा. हर स्थिति में न्यायाधीश की बुद्धि कौशल एवं विवेक को प्रतिष्ठा मिलनी ही चाहिए. ‘ न्यायाधीश निर्द्वन्द ने मनोचिकित्सक के मुंह से अपनी बुद्धि स्वस्थता की प्रशंसा सुनी. वे पूर्ण आश्वस्त हो गये. उन्हें किसी प्रकार के परीक्षण कराने की आवश्यकता नहीं थी. वे मनोचिकित्सक से मिले बगैर ही लौट गये. यद्यपि न्यायाधीश निर्द्वन्द की विचारधारा की प्रशंसा यत्र तत्र सर्वत्र हो रही थी पर अधिवक्ता संघ द्वारा दायर याचिका की याद आते ही उनका चित्त छिन्न-भिन्न हो जाता. उस रात उनकी आँख देर से लगी. स्वप्न में उन्होंने स्वयं को न्यायालय में पाया. वे वहां एक न्यायाधीश के रुप में नहीं अपितु एक अभियुक्त के रुप में वहां उपस्थित थे. न्याय की कुर्सी में न्यायाधीश प्रेमपाल बैठे थे.
          न्यायालय ने उनसे पूछा-आपने नियमों का उल्लंघन करके दप्रस की अवमानना की है. आप अपराध पर अंकुश लगाने नियुक्त हुए है पर स्वयं आपने अपराध किये है. आप अपराधी है ? ‘ न्यायाधीश निर्द्वन्द छटपटा उठे. उन्होंने कहा- नहीं,मैं अपराधी नहीं. मैंने अपने अधिकार क्षेत्र की सीमा में कार्य किया हैं. न्यायाधीश का कर्म अपराधियों को दण्डित करना ही नहीं है. वे व्यक्ति को सही दिशा देने और स्वस्थ समाज निर्मित करने नियुक्त होते है. . . . । चिकित्सक रोगी की प्राण रक्षा के लिए दवाईयाँ बदल देता है. अध्यापक विद्यार्थी को उत्तीर्ण करने कृपांक देता है तो जनहित में दण्डसंहिता में परिवर्तन क्यों संभव नहीं. मैने कानूनों की पुस्तकों के अनुरुप निर्णय न देकर भी न्यायापालिका की शाख बढ़ाई है. मैं निरपराध हूं. . . . . . . . . । ‘
          अचानक उनकी नींद टूट गयी. यद्यपि स्वप्न के दृष्‍य लुप्त हो गये पर वे असुरक्षा के भय से मुक्त नहीं हो पाये. स्वतंत्र न्यायपालिका में पदस्थ होकर भी वे चारों ओर से घिर गये थे. दूसरे दिन न्यायाधीश निर्द्वन्द ने अपने द्वारा दिये निर्णय की प्रतियां उ, न्यायालय को भेज दी. ताकि उसमें निष्पक्ष मंथन हो सके. साथ ही त्यागपत्र भी प्रस्तुत कर दिये. उच्‍च न्यायालय ने न्यायाधीश निर्द्वन्द के प्रपत्रों और अधिवक्ता संघ की याचिका को उच्‍चतम न्यायालय को विचारार्थ प्रेषित कर दिया. उच्‍चतम न्यायालय जांच कार्य में संलग्न हो गया. उसने तीन न्यायाधीशों की एक खण्डपीठ बिठायी. खण्डपीठ ने प्रश्न रखा- न्यायाधीश के निर्णय से क्या शासन और समाज पर आर्थिक बोझ पड़ा? उनका अहित हुआ? ‘
          उत्तर मिला- नहीं,न्यायाधीश के निर्णय से अभियुक्तों को कारावास नहीं हुआ. कारागृह में बंदियों की संख्या कम हुई. इससे शासन के खर्च में बचत हुई साथ ही उसे नकद लाभ भी मिला. पक्षकारों ने दण्डीत होने के बावजूद अपील करने से इंकार कर दिये इससे स्पष्ट होता है कि निर्णय अनुचित नहीं. इससे न्यायालय में प्रकरणों की संख्या कम हुई. न्यायालय में पड़े प्रकरणों को समय पर निदान का अवसर मिलेगा. ‘ प्रश्न- क्या अपराधी को उचित दण्ड नहीं मिला? क्या आपराधिक कार्यों को बढ़ावा मिला ? ‘ - नहीं, आपराधियों को उचित दण्ड ही मिला, यही कारण है कि अपराध की संख्या में कटौती आयी हैं । अधिकारी वर्ग में धन संचय का भय व्याप्त है । उनमें वेतन और पेंशन कटौती का दहशत है । अन्य आपराधिक प्रवृत्तियों में भी गिरावट आयी है ।‘ खण्डपीठ ने न्यायाधीश निर्द्वन्द से कहा - आपके प्रकरण पर खण्डपीठ विचार कर रही है । कार्यवाही पूर्ण होने पर आपको सूचना दी जायेगी । आप अपने पद पर रह कर कार्य करें . . . . . . ।‘

यंत्रणा

सुरेश सर्वेद

सुरेश सर्वेद
          मेरे खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज होते ही मैं निकृष्ट जीवन व्यतीत करने लगा. मुझ पर विद्युत कर्मचारी से मारपीट करने का आरोप था. मेरे खिलाफ दो दो धाराएं लगी थी. हालांकि मैंने न मारपीट की थी न ही जान से मारने की धमकी दी थी चूंकि विद्युत कर्मचारी ने आरक्षी केन्द्र में मेरे विरुद्ध रिर्पोट दर्ज करा दी थी अतः मामला बना कर मेरे विरुद्ध कार्यवाही शुरु कर दी गई थी. मेरा प्रकरण न्यायाधीश मित्तल के न्यायालय में विचाराधीन था. लगी धाराओं के अनुसार प्रमाणित होने पर मुझे सात वर्ष तक की सजा मिल सकती थी. सात वर्ष के कारावास की सजा की याद से ही मैं कांप उठता. वैसे तो एक दिन की सजा भी सजा होती है पर मेरे विरुद्ध जो आपराधिक प्रकरण दर्ज किये गये थे. वह तो लम्बे समय तक जेल यात्रा की ओर संकेत कर रहे थे. सुनी सुनायी कहानी यह थी कि कारागृह का न सिर्फ प्रभारी ही अपितु वहां एक सिपाही से लेकर पुराने कैदी तक नये लोगों से वह व्यवहार करते है जो किसी भी स्थिति में उचित नहीं. सिपाही हवलदार और प्रभारी तो पिटते ही हैं वहां के पुराने कैदी भी अपनी बात मनवाने के लिए पिटाई कर देते हैं.
         वहां काम भी बेहद लिया जाता है. न करने पर दण्डित किया जाता है. हालांकि मेरे अधिवक्ता तपन मुझे निर्दोष घोषित करवाने कृतसंकल्प थे. जब भी पेशी होती मुझे सांत्वना का अमृत अवश्य पिलवा देते . मुझे उनकी सांत्वना से थोड़ी राहत मिलती मगर क्षण भर बाद ही मैं फिर अपने विचारों में उलझ जाता मुझे हर क्षण यही अनुभव होता कि मेरा अपराध प्रमाणित हो चुका है और मैं कारागृह में सजा भोगने पहुंच चुका हूं. मैं जब भी न्यायालय जातामेरी द्य्ष्टि न्यायालय के भृत्य पूर्णेन्दू पर जा टिकती. मैं उसे हर पेशी में दस रुपये देता. वह उल्टा पुल्टा नामपुकारने में माहिर था. जो पैसा देने में अनाकानी करता उसका नाम बिगाड़ कर पुकार देता और वह व्यक्ति उपस्थित नहीं हो पाता जिसकी पेशी होती. उस पर कार्यवाही शुरु हो जाती. मैं भी डरते रहता कि मेरा भी नाम बिगाड़ के पुकार न दे इसलिए उसे बिना मांगे ही दस का नोट थमा देता. मेरी मुलाकात विकास से हुई. वह अधिवक्ता तपन का मुंशी था. उसने मुझसे कहा कि यदि तुम्हारे अपराध प्रमाणित हो गये तो समझो तुम्हारी नौकरी गयी. मैं सोचने लगा कि इसका कहना गलत नहीं .
          नौकरी तो जायेगी ही साथ ही कारावास की सजा भी भोगनी पड़ेगी. कारावास की सजा मिली नहीं कि वे लोग ही मुझसे घृणा करने लगेंगे जो मुझे मान सम्मानदेते हैं. व्यक्ति जब समुद्र में डूबने लगता है तो वह तिनके को ही सहारा समझ कर उससे किनारे लगने की सोचता है पर यह संभव नहीं हो पाता पर आशा नहीं छूटती. यही हाल मेरा था हालाकि मैं यह जानता था कि मुंशी मेरी क्या मदद करेगा वह मुझे क्या बचायेगा बावजूद जाने क्यों मुझे ऐसा लगने लगा कि यही तिनका मुझे किनारा लगा सकता है. मैंने कहा-विकास तुम कोई ऐसा उपाय करो कि मैं बाईज्जत बरी हो जाऊं मेरी नौकरी भी बचेगी और जगहसाई भी. एक मुंशी होकर भी मेरी बात को उसने जिस गंभीरता से लिया उससे मेरा विश्वास उस पर जम गया. जब किसी को सजा होती या दण्ड मिलता तो मुझे लगता उसे निर्णय उसके विरुद्ध नहीं अपितु मेरे विरुद्ध गया है और मैं परेशान हो उठता उस दिन मैं न ढंग से खा पाता था और नहीं रात में चैन की नींद सो पाता था. मगर जब कोई बाईज्जत बरी होता तो मैं खुश हो जाता. उस दिन मैं भर पेट खाता और रात में चैन की नींद सोता. मैं यह जान चुका था कि न्यायालय में जीत उसकी होती है जिसके पक्ष में गवाह गवाही देता है. मुझे सदैव अपने विरोधी गवाह की गवाही पर शक लगा रहता मैं यह मान गया था कि मेरे विरुद्ध गवाही दी जायेगी और मेरा अपराध करना मान लिया जायेगा.
          हालांकि मेरे अधिवक्ता अक्सर यह कहा करते थे कि यदि तुम यहां से दण्डित हो गये तो हम आगे के न्यायालय में अपील करेंगे पर मैं तो यहां एक ही न्यायालय के चक्कर काट कर पस्त हो चुका था. दूसरे न्यायालय में अपील करने की सोचना भी मेरे लिए भारी पड़ता था. मन तो कई बार अपने विरोधी गवाह से बात करने की होती मगर बात नहीं कर पाता था. उससे मेरी कोई दुश्मनी भी नहीं थी. हम अक्सर मिलते. उसके सामने होते ही जहां मैं आंखे चुरा लिया करता था वहीं वे चिल्लाकर मुझे नमस्कार किया करता था. मुझे लगता कि वह मुझे सम्मान न देकर मेरी हंसी उड़ा रहा है और कह रहा कि मैं ऐसी गवाही दूंगा कि तुम जिन्दगी भर जेल की हवा खाओगे. यह तो था उसके प्रति मेरे मन का विचार पर वह मेरे बारे में वास्तव में क्या सोचता था यह तो वही जाने पर जिस दिन उसकी गवाही हुई. गवाही के बाद अधिवक्ता तपन ने जिस प्रकार से बातें मुझे बतायी इससे मैं अनुभव कर लिया कि वह मेरा दुश्मन नहीं बना. यानि उसने मेरे विरुद्ध बयान नहीं दिया.
          हर पल हर क्षण मैं भयभीत भयाक्रांत रहता . न मैं किसी से ढंग से बात कर पाता था न किसी से खुल कर मिल पाता था. तरह तरह के विचार मेरे मन में उठते रहते. मैं स्वयं को कभी कारावास में पाता तो कभी स्वतंत्र विचरण करते हुए. जिस दिन मेरे प्रकरण का निर्णय होने वाला था. अदालत तो ग्यारह बजे लगती थी मगर मैं नौ बजे ही वहां टिक गया था. अधिवक्ता का अता पता नहीं था. मुझे उस पर गुस्सा आने लगा था. मेरे मन में विचार उठने लगा था कि मेरे अधिवक्ता मेरे विरोधी के पक्ष में तो नहीं चला गया. पर क्षण भर बाद ही अब तक की हुई प्रक्रिया पर विश्लेषण करता तो अपने ही विचार के प्रति मुझे स्वयं पर गुस्सा ही नहीं तरस भी आने लगता. अधिवक्ता अपने सही समय पर पहुंच गये. वे दूसरे पक्षकारों के काम निपटाने लगे. मैं बार बार उससे पूछता मैं निरपराध घोषित होंऊगा या नहीं. मैं बार बार उनके कार्य में अवरोध पैदा करते रहता. कई बार तो वह गुस्सा जाते फिर अपने को नरम करते हुए कहते- हां भई हां,तुम निरापराध घोषित होओगे. मुझे कुछ आवश्यक काम है उसे निपटाने दो. ‘ मैं यह भली भांति जानता था कि मेरे अधिवक्ता जिम्मेदार व्यक्ति है मगर वे जैसे ही किसी दूसरे कार्य से दूसरी ओर जाता तो मुझे लगता कि निर्णय के समय तक ये पहुंच नहीं पायेगें और मुझे सजा सुना दी जायेगी मगर ऐसा नही हुआ. जैसे ही मेरी पुकार हुई मेरे अधिवक्ता पहुंच गये. टाइप राइटर चलने लगा .
           मैं जान गया था कि इस टाइप राइटर से मेरा भविष्य लिखा जा रहा है. जैसे जैसे टाइप राइटर की बटन दबती तो कभी मुझे मेरा भविष्य उज्जवल दिखता तो कभी मुझे लगता मेरा भविष्य चौपट होने वाला है. जब मैं चाह रहा था कि जो कुछ भी टाइप किया जा रहा है. उसे मैं देखूं पर क्या यह संभव था. कदापि नहीं. मेरे हाथ पैर शून्य होने की स्थिति में पहुंच चुके थे. मैं मानसिक यंत्रणा झेल रहा था. मेरे अधिवक्ता निश्चिंत थे . मेरा मन निर्णय सुनने बेचैन था. मेरी बेचैनी को कोई महसूस नहीं कर रहा था. निर्णय जैसे ही मेरे पक्ष में आया. मुझे बाईज्जत बरी होने का निर्णय सुनाया गया. मैं इतना खुश हुआ कि अधिवक्ता समेत न्यायाधीश के कदम चूमने का मन हुआ पर मैं उतावला नहीं हुआ. मैंने आभार व्यक्त किया और अपने घर की ओर लौट गया. हालांकि मैं बाइज्जत बरी हो चुका था पर आरक्षी केन्द्र से लेकर न्यायालीन प्रक्रिया में भोगे दिनों की यंत्रणा चाह कर भी मैं नहीं भूल पाता.