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बुधवार, 20 जुलाई 2016

घुरवा के दिन घलाेक बहुरथे

सुरेश सर्वेद


        हलकू शहर ले लहूटगे. ओकर कर अब लबालब सम्पत्ति होगे रिहीस.धन दौलत के कारण अब गांव वाले मन ओला भरपूर मान सम्मान दे लगिन.जेन गांव वाले ओला देख के कन्‍नी काटय ,हलकू कहि के बलाय .उहू अब हलकू के नाव ले बर हिचकिचाये लगीन। 
            ये उही हलकू आवय  जेन कुछ बरस पहली गांव के छोटे किसान रिहीस । एक समय  नील गाय  मन इंकर खेत के फसल ल नास कर दिस त एकर पत्नी मुन्‍नी हर गुस्सा के किहिस - इहां हर बरस इही हाल होथय , फसल नास होथय .साहूकार मन के करजा नई छूटाए । ऊपर ले अउ करजा चढ़ जाथय । ऐकर ले बने , शहर जाके कमातेन - खातेन । दू पइसा बचातेन घलोक.....।''
       मुन्नी के सलाह हलकू ल जमगे। हलकू मुन्नी के बात ल स्वीकारत किहीस - तयं सिरतोन कहत हस। शहर मं कइसनो करके दू बेरा के रोटी मिल जाही। इहां पूस  रात मं जाड़ सहत परान निकल जही।''
       दूसर दिन ओमन शहर जाए बर निकलगे। ओमन सही बेरा मं रेल्वे स्टेशन पहंच गीन। जबरा घलक उंकर संग आए रिहीस। रेलगाड़ी छूटे के बाद ओहर लहुटगे रिहीस, उदास .... निरास ...।
       हलकू शहर के चकाचौंध ल देख के अकबकागे।  ओहर अभी तक टूटहा  - फूटहा खपरैल के मकान ल देखे रिहीस। गाड़ी के फिसलत चक्का ल देख के ओहर सोचिस - हम मन बने करेन, जउन जबरा ल संग म नइ लायन। ओहर गाड़ी के फिसलत चक्का मं आ के रउंदा जतिस त पाप हमला भोगे ल परतीस....।''
       हलकू अउ मुन्‍नी ल काम मिले म देरी नइ लगिस। ओमन भवन बनाए के काम पागे । उंकर कमई दिन दूनी रात चउगुनी बाढ़ते गीस । जीवन में सुख आते गीस । हलकू के मान मर्यादा बाढ़ते गीस। पहली हलकू दूूसर ठेकेदार मन के काम करय । अब ओहर खुद ठेकेदार बनगे। हलकू के आमदानी बढ़गे। अब मुन्‍नी घर म महारानी कस रहय  लगिस । पइसा के कमइ म उकंर रहन - सहन घलोक बदलगे। अब हलकू फूलपेंट सफारी पहनन लगिस अउ मुन्‍नी ऊंचहा लूगरा।
       हलकू मेर टी.वी.,कूलर,सोफा,फ्रीज,मोटर साइकिल गैस सिलेन्डर,अउ आधुनिक सबे सुख के साधन होगे। अब ओमन ल झोपड़पट्टी म रहवई खाय लगिस। ओमन कालोनी म किराया लेके रहय  लगिन। उहू मं अइसन कालोनी मं जिंहा रइस मन रहय । उहां के माइ लोगन मन संग मुन्‍नी के जान पहचान बाढ़गे ।
       एक दिन मुन्‍नी हर परोसी हरजीत कौर के घर मं बंटी नाव के विदेशी नस्ल के कुकुर देखिस । ओला अपन जबरा के सुरता आगे । पर ओहर उंहा जबरा के बारे मं नइ गोठियाइस । जबरा के बारे मं गोठियाये मं ओकर प्रतिष्‍ठा  मं आंच  आतिस। संझा बेरा जइसे हलकू लहूटिस । मुन्‍नी हर ओकर आगू म बंटी के ऐसे गुनगान करिस कि दूसर दिन हलकू हर एक ठन कुकुर धर लइस, वहू मं विदेसी नस्ल के । ओमन ओकर नाम टीपू रख दीन।
       टीपू निकलिस बड़ नखरेबाज। दिन भर ओहर घर मं धूम मचावै। मुन्‍नी ल खूब मजा आवै । ओहर ओकर संग खेले लग जावै।. टीपू जे डहर दउड़य ,मुन्‍नी ओकर पाछू भागय, अउ ओला उंचा के अनगिनत चुमा दे दे डारे। हलकू घलोक काम ले लहूटते सांठ टीपू के पाछू भीड़ जावै।. ओला खंध मं बैठावै ,छाती मं लगावै। दुलारे - पुचकारे ।
       सुख -सुविधा बढ़े  के साथ मुन्‍नी के भीतर आलस समाय  लगिस । ओहर एक झन काम वाली रख लीस। अब काम वाली जेवन बनाना छोंड़ सब काम करे लगीस। मुन्‍नी मेर समय  च  समय  रहय  लगिस । समय  काटे खातिर ओहर एक ठन क्‍लब के सदस्यता ले लीस।
       जेन दिन मुन्‍नी सदस्यता लीस, ओ दिन ओहर बिक्‍कट खुस रिहीस । ओला रात मं ढ़ंग से नींद घलोक नइ अइस। रात भर ओहर क्‍लब के बारे मं सोचत रिहीस। मुन्‍नी रोज क्‍लब के बारे मं परोसी ले सुनै। .सुन - सुन के ओकर मन घलोक क्‍लब जाए के होवय । आखिरकार ओहर अपन इच्छा ल  पूरा करै  खातिर सदस्यता ले लीस।
       पहिली दिन मुन्‍नी सहमे - सहमे रिहीस । ओहर उंहा के एक - एक गतिविधी ल जांचे परखे लगीस । मुन्‍नी चकाचौंध देख के झिझकत रिहीस । मुन्‍नी गांव के महिला रिहीस। अइसन वातावरण ओहर कभू नइ देखे  रिहीस । धीरे - धीरे ओकर झिझक मिटावत गीस । एक अवसर अइसन अइस कि  ओहर सब संकोच  ल बिसरगे।
       समय  अपन धूरी म चलत रिहीस।
        एक रात हलकू , मुन्‍नी के आगू मं गांव जाए के बात किहीस। मुन्‍नी तुरते मानगे। मुन्‍नी के आंखी म ओ महिला मन झूलगे , जेन मुन्‍नी के खपत शरीर ल देख ओकर बर दया मरय। उंकर गरीबी मं तरस खावै  अउ सांत्वना दे।
       एक दिन हलकू अउ मुन्‍नी शहर छोड़ गांव आ गे।
       जेन दिन ओमर अपन गाँव अइन, उंकर संग ढेर सारा समान रिहीस। रुपिया - पइसा रिहीस। गाँव वाले मन ट्रक ले उतरत समान ल देख के अकबका गे रिहीन। जेने समान ट्रक ले उतरय, गाँव वाले मन के आँखी ओला देखे बर उही मं गढ़ जाएं। हलकू सीना ताने समान ल उतरवाए अउ गाँव वाले मन डहर ल देखय। अभी समान उतरते रिहीस के जबरा कोनो डहर  ले लहसत - दउड़त अइस। जबरा हलकू ल सुंघयाय  लगीस। हलकू के फूलपेंट मं थोरिक दाग लग गे। ओहर गुस्सा के जबरा ल दुत्‍कार दीस। जबरा एक बार हलकू ल टकटक ले देखिस अउ लहसत मुन्नी कोती दउड़गे। जबरा देखिस - मुन्नी अपन छाती मं एक ठन कुकुर ल चिपकाए हवय। जबरा मुन्नी ल सुंघे लगीस। ओला मुन्नी के घलक दुत्कार मिलिस। जबरा दुरिहा छटक के खड़ा हो गे।
       मुन्नी के आजू - बाजू मं गाँव के महिला मन ठाड़े रिहीन। ये महिला मन मुन्नी पर तरस खाय, मुन्नी ल अब ओ महिला मन बर तरस आए लगीस।
       कुछ दिन बाद हलकू के घर मं बिजली लग गे। हलकू रंगीन टी.वी. लाए रिहीस। ओहर चालू होगे। गाँव वाले मन रंगीन टी.वी. देखे बर ओकर घर आए लगीन। अब हलकू के घर अइसन लोगन मन भी आए लगीन जउन हलकू से संबंध रखे बर कतराए।
       हलकू अउ मुन्नी के व्यवहार जबरा ल चुभगे। ओ समझ नइ पइस के जेन हलकू ओकर बिना एक घड़ी नइ रहाय, ओहर कइसे बदलगे। जबरा खाना पीना तियाग दीस। ओहर दिन भर बइठे हलकू के घर डहर ल देखय। कभू - कभू मुन्नी ओला फेंक के रोटी दे दे। उहू ल जबरा नइ खावै। जबरा के सरीर जर्जर होते गीस। अउ एक दिन हलकू ल खबर मिलिस के जबरा मरगे...।
       खबर सुनते सांठ हलकू अपन खेत डाहर दउड़िस। जबरा अपन परान ल उही जघा मं तियागे रिहीस जउन मेर जबरा अउ हलकू पूस के रात ल काटै। आगी ले पार कुदै । बीते दिन के सुरता मं हलकू के आंसू निकलगे। तीन - चार दिन तक हलकू ल जबरा के सुरता सताइस अउ ओकर बाद भुलागे ....।
       हलकू के किराना दूकान चल पड़िस। सहना के दुकानदारी मार खाय लगिस। सहना करजा मं बुड़त गीस एक अवसर अइसनों अइस कि सहना ल हलकू तीर उधारी मांगे ल जाए ल पड़गे । सहना ल देखके हलकू ल ओ दिन के सुरता आ गे,जब हलकू छोटे किसान रिहीस अउ सहना ले उधारी ले रिहीस । करजा नइ पटाय  के कारण दस ठन बात सुना दे रिहीस। हलकू के मन म एक बार अइस - सहना ल दुत्कार के भगा देवव । पर ओहर अइसे नइ कर पइस। ओहर सहना ल उधारी दे दीस ::::::।

सोमवार, 11 जुलाई 2016

बनकैना

सुरेश सर्वेद

       समारू हा कालू ल घर म बला लाइस। खुसुर - पुसुर आरो सुनके देवबती रंधनी खोली ले अंगना म अइस। ओहर देखीस - ओकर गोसइया समारु के संगे - संग एक झन आदमी कोठा डहर ल झांकत हवै। देवबती ल देख के समारु बताइस - ये कालू आवै। मरहा - खुरहा गाय - बइला मन ल लेथे।''
- तुम्मन कोठा म एला का देखावत हव।'' देवबती पूछीस।
- बनकैना ल देखावत रहेंव।'' समारु बताइस।
- काबर ... ?''
- बतायेेंव न येहर मरहा - खुरहा गाय - बइला लेथे।''
- तु्ंहर बिचार का हे ?''
- बनकैना ल बेच देतेन सोचथौं।''
- का मिल जही बनकैना ल बेचे म ?''
- पाँच सौ रुपिया तो मिल ही जही ।''
- पाँच सौ रुपिया के लालच म तुम बनकैना ल बेच देना चाहत हौ। पर हमला पाँच सौ का एक हजार दीही तभो ले बनकैना ल नइ बेचना हे।''
       समारु ल लगीस, बात बिगड़ने वाला है। किहीस - बनकैना बुढ़हागे हे। घर म रख के का करबो ?''
- बुढ़हा गे हे त घर ले खेदार देन।''
- येमा खेदारना कइसे? अब तहीं सोंच - कोठा म परे - परे हमला धन तो दीही नइ। उल्टा सेवा - जतन करवात रहीथे।''
- सुवारथ के घला पार होथे। जब तक मिलत हे तब तक मोहो मोहो, नइ मिलय त धूर्र्, ये ठीक बात नोहे। जीवन भर तो हमला बनकैना देय च देय हे, हमर से ले च का हे। अउ ये उमर म बनकैना से पाय के आस ?''
       समारु के मुड़ म बनकैना ल बेचे के भूत सवार हो गे रिहीस। देवबती समारु ल अउ समारु देवबती ल समझाय के उदीम करिन। दूनों एक - दूसर के बात ल समझे बर तियार नइ होइन। खिसिया के देवबती किहिस - बनकैना ल नइ बेचना हे, मतलब नइ बेचता हे। अउ रंधनी खोली में खुसरगे।''
       देवबती के बिरोध गलत नइ रिहीस। देवबती के कहे के मतलब का समारु नइ जाने। का समारु बनकैना के पेउस नइ झड़के रिहीस? दूध - दही - मही नइ पीये रिहीस ? दार म डार के घी नइ खाय रिहीस ? बनकैना के बछरु संग उही तो मेछराय रिहीस न ? जउन बछारु मन अब जवान हो के ओकर खेती - खार ल सम्हालत हवै। दही - मही - घी  अउ दू ठन कमइला लइका। का - का नइ दीस बनकैना। बनकैना से अतेक पाय के बाद अउ का पाय के आस? ठीक तो किहीस देवबती हा।
       अउ फेर देवबती कइसे तियार हो जतीस बनकैना ल बेचे बर। कतेक बच्छर होगे बनकैना ल घर म आय। जब ले बनकैना आय हे, देवबती सेवा - जतन करत हे। कोठा भर खोज लेव, कोनो मेर गंदगी देखे ल नइ मिलही। देवबती के सेवा- जतन के कर्जा उतारे म बनकैना घलोक पाछू नइ हटीस।
       जेन दिन बनकैना ल खरीद के समारु लाइस। अपन अंगना म बछिया देख के देवबती के खुसी उमंग के का कहीना। धरा रपटा आरती सजा लाइस। बनकैना के मुड़ म सुघ्घर असन चंदन लगइस। आरती उतारिस अउ लुगरा के अंचरा ल दूनों हाथ म धर के टपर - टपर बनकैना के माथ ल परिस। किहीस - मोर घर म दूध - दही - मही ल झन अतरन देबे। देवबती के मांग ल पूरा करै म बनकैना घलोक पाछू नइ हटीस। देखते - देखत बनकैना बछरु ले गाय बनगे। एक दिन गाभिन म हो के सुघ्घर असन बछरु घलोक दे दीस, देवबती के अंगना म मेंछराए बर। देवबती के परिवार के संगे - संग अरोसी - परोसी ल घलोक पेउस झड़के ल मिले रिहीस।
       साल भर नइ होइस अउ दूसर बछरु  दे दीस बनकैना। बछरु बाढ़े लगीन अउ बछवा बन के समारु के खेती - किसानी कमाये लगीन। अतेक पाय के बाद भी कइसे कउड़ी के भाव म बनकैना ल बेचे बर तियार हो जतीस देवबती।
       कोठा के खुंटा म बंधाये बनकैना तक समारु अउ देवबती के गोठियाये के आवाज पहुंचत रिहीस। उंकर बात सुने खातिर बनकैना पगुराना बंद कर दे रिहीस। समारु के बात सुन के बनकैना ल लगे - अब वोला बेच ही दे जाही पर देवबती के बिरोध ल सुन के वोला नइ बेचै के अंदेशा होवै। वोहर समारु के बात सुन के दुखी होवै अउ देवबती के बात सुन के खुश।
       समारु के अंगना म कालू ठाढ़े रिहीस। उंकर बीच के बात ल सुन के कंझावत रिहीस। समारु अपन बात ल मनाये बर वो दिन के सुरता देवबती ल देवइस जब देवबती वोला कांदी दे बर कोठा म गीस। कांदी ल देख के बनकैना मुड़ ल हलइस। ओकर सींग म देवबती के हाथ रोखड़ागे। लहू निकले लगीस। देवबती कांदी ल पटक दी। कि हीस - मरे जात हे खाये बर। मोर हाथ ल लहू - लुहान कर दीस रोघही ह। मरे के घला नाव नइ लेवै।
इही घटना के सुरता करात समारु किहीस- का तंय भूला गेस वो दिन ल जब तोला बनकैना हुमेल दे रिहीस। अउ रोज कोठा म कचरा उठावत बनकैना ल बखानत रहीथस।
       बनकैना के संगे संग देवबती घलोक समझ गे रिहीन के समारु अपन बात ल मनवाये बर देवबती के सेवा - जतन अउ बनकैना के हुमेले के बात करत हे। देवबती ये भी जानत रिहीस के बनकैना ओ दिन कोई जान सुन के नइ हुमेली रिहीस।   बनकैना के आगू म देवबती के कांदी डालना होइस अउ बनकैना के मुड़ हलाना होइस। अउ यहू बात सही रिहीस के कोठा म खुसरते सांठ देवबती के बड़बड़ाना सुरू हो जावै। कहे - कोठा भर चिखला कर डारै हे रोगही ह। कते - कते मेर ल बाहरो - पोछौ।''
       बनकैना के पूंछी ल अइठ के। पीठ ल ठोंक के देवबती सरकाय अउ कोठा ल साफ करै। जइसे कोठा के साफ - सफाई होवै। देवबती बनकैना ल सहलाय लगै। बनकैना सब समझे देवबती के बात ल पर बोल नइ पाये। ओहर देवबती के हाथ ल चांटे लगे। देवबती कहे - अब अइसन गोबर झन करबे जेमा कोठा भर चीखला हो जावै।
       बनकैना तब तो निश्चय करै के ओहर अब पतला गोबर नइ करही पर जइसे हरियर - हरियर कांदी ओकर आगू ल आवै ओकर से रही नइ जाय अउ पेट ले आगर चर डारै। अब ओकर उमर वो नइ रही गे रिहीस के जेला नइ तेला खाय अउ पचा ले। लालच म पड़ के पेट ले आगर खाये अउ पोकर्री मार देवै। पातर गोबर कोठा भर बगर जाये तेकर सेती संझा - बिहिनियां चार ठन सुने ल लगै। देवबती के बड़बड़ई म घला बनकैना ल मया दीखे।
       ये डहर कालू ल टेम होत रिहीस। ओहर किहीस - तुम मन ल गाय बेचना हे के नइ बताओ। मोला दूसर जघा घला जाना हे।''
       रंधनी खोली ले निकलत देवबती किहीस - तंय अब तक इही मेर काबर ठाढ़े हस। मंय कही देंव न हमला बनकैना ल नइ बेचना हे।''
       देवबती साफ - साफ सुना दीस। समारु के बोलती बंद होगे। कालू रोस म किहीस - जब गाय ल नइ बेचना रिहीस त मोला काबर बलायेस जी।''
- अभी तो तंय जा हमन सुलह हो लेथन फेर तोला बलाबोन।'' समारु किहीस।
- अउ सुलाह होय के सवाले च नइ हे। तंय बनकैना ल लेहे खातिर ये अंगना म अउ कभू झन फटकबे ...।''
       घर ले निकलत - निकलत देवबती के बात ल कान भर सुनिस कालू ह। देवबती कोठा म खुसरगे अउ साफ - सफाई म लग गे वइसने बड़बड़ावत। समारु छीन भर अंगना म ठाढ़े रिहीस फेर धीरे कुन उहू कोठा म समा गे। समारु बनकैना के मुंहू ल सहलाये लगीस। किहीस - तंय सिरतोन कहिथस देवबती। सही म हमला का - का नइ दे हे बनकैना ह .....।''  समारु के हाथ म दया - मया - स्नेह - अपनपन के भाव अनुभव करे लगीस बनकैना अउ चांटे लगीस समारु के हाथ ल ...।

ममता नगर, राजनांदगांव ( छत्‍तीसगढ़ )

शुक्रवार, 8 जुलाई 2016

रण म जीत

  • सुरेश सर्वेद
- बात - बात म लड़े बर तियार, अरे हमला का करना हे ? परदेशिया मंगलू के बारी ल टोरे के कोठार म कब्जा करे।''
       गुणवंती के ताना ल सुन के सुमेर तरमरागे। किहिस - '' तुम्हरे मन के अइसनेच सोच - बिचार हमला जिंहा के तिंहा ठाढ़े रखे हवै। परदेश ले आथे अउ जम्मों गाँव म अपन राज चलावन लागथे।''
- तुम्हर एक अकेला के करय ले कुछू होना जाना नहीं। फोकट म अपन लहू ल जरावत रहिथौ। जम्मों गाँव के मुँहू सियाये हे तब तुम काबर अपन मुंहॅू ल उलाथौ ?''
- अन्याय , अनीति मोर देखे नइ सहाय ?''
- त देखे सुने ल काबर जाथौ ?''
- तोर कहना हे, दिगर जइसे महूं आँखी - कान ल मूंद के रेंगव। मुँहूं ल घर म डार के रहवं।''
- अइसनेच मन के समे हे ....।''
- तोर गोठ बात मोला नइ जमे ...।''
        कहत सुमेर अपन घर ले निकले लगीस। गुणवंती किहिस - जेवन चूर गे हे। खा - पी लौ फेर जावत रहिना बइटका म ...।
       लाजवंती के ताना ल सुनके सुमेर के पेट भर गे रिहीस। सोचे रिहीस ओकर बाई लाजवंती ओकर पक्ष लेही। पर इहां तो पासा उल्टा पर गे रिहीस। अब डउकी परानी के मेर मुँह बजाना ओला ठीक नई लगीस। किहिस - तंय खा - खुवाके सो जबे। मोर रद्दा झन देखबे ।''
- हव हव, गुड़ीचउरा म सकलाय बइठका तुम्हर बिना न शुरु होवय न उसले ...।''
       लाजवंती मुंह बजाते रहीस। सुमेर गुड़ीचाउरा तिर पहुंचगे। उहां गाँव भर के लोगन जुरियाये रहय। कोनो आधा बीड़ी ल मुँहू म हुरसे जलावत रहय त कोनो कस खींच के धुंगिया के लच्छा ल बादर कोती फुंकत रहय। सुमेर सीधा मंगलू के तीर जा के बइठगे। धीरे कुन मंगलू ल कोचकिस अउ जानना चाहीस के बइठका म अब तक का होय हे ? मंगलू चुप रहिस। सुमेर समझगे - बइठका अभी शुरू नई होय हे। मंगलू के कंधा ल सहलइस अउ जताय के प्रयास करिस - तंय फिकर झन कर। कोनो तोर संग नइ हे त का होगे मंय तोर संग हंव।
       मंगलू के हाव - भाव म थोरकिन परिवर्तन अइस। ओकर हाव - भाव स्पष्ट करे लगीस कि ओहर अकेल्ला नई हे। कोनो ओकरो संग देवइया हे।
       गुड़ीचौरा म बइठका परदेशिया अउ मंगलू के विवाद ल ले के जुरयाये रहय। गाँव पटेल अइसनेच दिन के फिराक म रहय। जेन जतका ओकर सेवा - चाकरी करय ओकरे कोती हो जाये। ये बात ल परदेशिया घलोक जानै। इही कारन ये के ओला गाँव म आये जुम्मा - जुम्मा तीन - चार बरिस होय होही अउ गाँव म अपन मनमानी चलाना शुरु कर दे रिहीस। पटेल किहिस - कस ग मंगलू, तोर का शिकायत हे ?
- मंय हर बरिस खइड़का डांर म अपन कोठार बनात रहेेंव। गये साल मोला परदेशिया अपन धान मिंजे बर मांगिस अउ ये साल खुदे रुंधे लगे हे।''
- कहसे परदेशिया .... ?''
- पटेल साहेब, पर साल मंय खुद रुंधाय रहेंव। जब रुंधवायेंव त ओ जगह ह परिया परे रिहीस।''
       जम्मों गाँव जानत रहय - मंगलू हर साल उही जघा म कोठार बनात आवत हे। पर परदेशिया के गोठ ल सुनके कोनो विरोध करे बर तियार नई होइस त पटेल किहिस - कइसे मंगलू, अब तोर क कहिना हे ?
सुन के सुमेर के तन - बदन म आगी फूंकगे। उठीस। कहिस - पटेल साहब, ये गाँव म जनम ले तहूं रहत आवत हस अउ महूं। जेन बात ल मंय जानत हंव तहूं जानत हस। मंगलू च काबर ओकर ददा घलोक  उही ठीहा म कोठार बनावत रिहीस हे।
       पटेल चुप रिहीस। गाँव के परलोखिय उठिस। किहिस - सुमेर, तंय लुप ले काबर गोठियाये ल उठे हस जी। पटेल हर तो मंगलू ले जुवाप मांगे हे। ओला बोलन दे।''
- परलोखिया तंय झन भुला, तोरो ऊपर इही परदेशिया काली राज कर सकत हे।''
       बइठका जघा म बहस बढ़ते गीस। सुमरे ल दबाये के प्रयास पूरा गाँव भर करे लगीस पर आज तो सुमेर घर ले पागी बांध के निकले रिहीस के मंगलू ल नियावं देवा के रहही। संगे - संगे गाँव भर के बंद आँखी ल खोलही ? किहिस - आज तुम पूरा गाँव जेन परदेशिया के संग देवथौ कल तुहीं मन रोहू अउ मोर बात ल सुरता करहू।''
       मंगलू ल लगीस। सुमेर के कहे से गाँव के सियान मन बुरा मानही। ओकर बनत काम बिगड़ जाही। ओहर सभा म उठगे, हाथ जोड़ कहिस - समेर से कहे म कुछू गलती हो गीस होही त मंय माफी मांगत हंव। पर सच इही ये - मोर कोठार म जबरवाली परदेशिया रुंधना रुंधत हे।''
       सुमेर ल मंगलू पर गुस्सा अइस। किहिस - मंगलू इंहा मंय सच बात कहत हंव अउ तंय माफी मांगत हस। हमर इही नम्रता - सादगी अउ समरपन के कारण बाहरी व्यक्ति हमर ऊपर हावी होथे। अंगरी धर के मुड़ म चढ़ जाथे। अब समे वो नई कि सच बर नियाय हो। अन्यायी राज अउ न्यायी सजा भोगथे। तोर नम्रता, सादगी अउ समरपन तोला न्याय नइ देवा सके।'' परलोखिया डहर मुंहू करके समारु किहिस - अउ तंय बिसरगे रे परलोखिया, जब दू हजार दे के तोर से इही परदेशिया पांच हजार वसूल लीस। रोवत - गावत तंय मोर कर आय रेहेस।''
       गाँव वाले मन के अब आँखी खुले लगीस। मदन बड़ हिम्मत कर के उठीस किहिस - समारु, सच कहत हे। ये परदेशिया धीरे - धीरे हम सब ल मुड़त हवय।''
       ये वो मदन रिहीस जउन ल एक थपरा कोनो दे दे वे त दूसरा गाल ल घलोक आगू कर दे पर गाल बजाना उचित नइ समझे। मुंहू लुकवा के सभा म बोलई का होइस, बइठका म जुरायाये गाँव वाले मन के मुंहू खुले लगीस। परदेशिया ल अब समझत देरी नई लगीस कि पासा उल्टा परत हे। अपन बात जोंगे बर कहे लगीस - पर साल जइसे मंय कोठार रुंधे रहेंव यहू साल रुंधात भर हंव। मंय मंगलू ल उहां फसल मिंजे - ओसाये बर मना थोरे करत हंव।''
- पर के जघा म तंय कोन अधिकार से रुंधना - बंधना करबे। मंगलू के जघा ये मंगलू ओमा रुंधे चाहे परिया छोड़े तोला का ...।''
       गाँव के लोगन जाग चुके रिहीस। बइठका म खुसूर - पुसूर होइस अउ ये बात कोनो गाँव वाले कहि दिस। अब जम्मों गाँव परदेशिया से खतरा महसूस करे लगीस। सब ओकर विरोध म होय लगीस। परदेशिया के दू हजार खा के भी पटेल ल निरनय देय ल परीस - परदेशिया, तंय अपन हद म रह। हमन इहां पले - बढ़े हन। देखत आवत हन नानपन ले। जउन ठीहा ल तंय हथियाना चाहत हस उहां मंगलू के ददा - बबा कोठार रुंधत आवत हे। कोठार ल मंगलू रुंधही अउ ऐकर निर्णय उही लिही कि ओहर तोला उहां तोर फसल ल रखन देही या नहीं ?''
- पर पटेल ... ?''
       परदेशिया कुछू कहना चाहीस पर गाँव के चिहुर म ओकर बोली बचन समागे। जउन परदेशिया सोचे रिहीस - धीरे धीरे गाँव भर राज करे के ओकर ठिकाना नई रहिगे ...।
       ये जीत सिर्फ मंगलू के जीत नई रिहीस। गाँव भर के जीत रिहीस। सुमेर अपन मुंछ ल अइठत अपन घर अइस। ओकर मुस्कात चेहरा ल देखके गुणवंती किहिस - तुम्हर चेहरा ल देखके तो अइसे लगत हे जानो तुम रण ले बाजी मार के अवात हो ... ?''
       सुमेर कुछू नइ किहिस। ठाड़े खटिया ल धम्म ले गिरइस अउ ओमा बइठगे। एक हाथ म मूंछा अइठत लगीस अउ दूसर हाथ म जांघा ल ठठावत गुणवंती ल किहिस - चल, मोर बर जेवन निकाल ....।''
  • पता - तुलसीपुर, राजनांदगांव (छ.ग.)   

रविवार, 6 मार्च 2016

करे कोनो, भरे कोनो

सुरेश सर्वेद

     सुरुज धीरे - धीरे आगास म चढ़े लगिस। ओकर तेज बिगरे म अभी देरी रिहीस। मुलहा के परछी म एक ठन लकड़ी ल अइसे ढंग से रखे रहय जेमा दू चार मनखे आराम से बैठ जावै। उही ठउर म पहुंच गे मनसा हर। वैसे तो मनसा बारहों महीना बिहिनिया - बिहिनिया ले ओ मेर पहुंच जाये। आज कोई पहली बेरा नई रिहीस। मनसा के आये के आरो फुलबासन ल लग गे। फुलबासन मटमटावत घर ले बाहरी धर के निकलिस अउ अपन घर के खोर आगू ल बाहरे लगीस। यहूं चरितर कोई नवा नोहे। जब ले फुलबासन अपन मइके म आ के बइठे हे तब ले ये चलत हे। गांव म गुपचुप इन दुनों के कई तरपट के बात होते रहीथे पर दूनों के दूनों कान म कपास गोंजे कस अपन म लगे रहिथे। फलबासन बाहरी म खोर ल बहारत कहिथे - अच्छा, तंय बता। काली कहां चले गे रेहेस?
मनसा कहिथे - कहूं नई गे रेहेंव। बिहिनिया ले डोली डहर गे रहेंव। चना देखे बर।
- अच्छा, दिन भर नई दिखेस।
- कोनो जरुरी हे का तोला दिखना...? जान सुन के मनसा अइसन गोठिइस। ओ जानना चाहत रिहीस - मोर आये अउ नई आये म फुलबासन ल का फरक पड़थे। फुलबासन घला कम नई रिहीस। किहिस - मोला का जरुरी होही। सोंचेव - रोज आथस त काली काबर नई आयेस।
      अभी दूनों म बाताचीता चलत रहय के मुड़ भर लउठी धरे रतन उही तीर म पहुंच लगीस मनसा फुसफुसइस - देख, आवत हवै नीयत खोट्टा।
मनसा के तीर म पहुंच के रतन पूछिस - मनसा, तोर चना कइसे हवै।
- बने तो दिखत हे रतन, फेर जानथस जब तक घर नई आ जाही वोकर मानी पीना अच्छा नई हे।
- हव भई सहीच ल कहत हस। ठंडा घलोक रुसरुस रुसरुस बाढ़ते जावत हे।
- घर म जाड़ लगीस त रउनीय तापे ल पहुंच गेंव येमेर ...।
     जब पूरा डबरी गांव जानत रिहीस तब रतन ल कइसे पता नई रिहीस होही। पर मुंहु म कहे तो कहे का। तभो ले किहिस - हव भई, अपन घर के भुर्री घलक नई सुहाय, जतका पर डेरौठी के रउनिया सुहाथे।
     मनसा चुप रिहीस। फुलबासन घलक सुन लीस। ओहर भीतरी डहर जाये लगीस। रतन किहीस  - कस टुरी , तंय अपने च डेरौठी ल बाहर के भागत हस। का होतिस, दू बाहरी हमरो खोर डहर मार देतेस त?
जइसे फुलबासन अउ रतन के खेत आजु - बाजु रहै वइसने ऊंकर घर घलक रहै। फुलबासन रतन के डेरौठी ल बाहरे लगीस। फुलबासन के रतन के डेरौठी के बहरई मनसा ल बने नई लगीस पर कहे नई सकीस।
     फुलबासन लहुट  गे। खोर ल बाहरे लगीस। उही बेरा मनसा के बाई रमौतीन अपन घुरुवा म घर के कचरा ल डार के आवत रहय। ओला देख के रतन ल दिल्लगी सुझीस, किहिस - तंय इहां रउनियां तापे ल आय हस अउ देख ओती ले आगी आवत हवै। अइसे ल हो जाये तो रउनियां के तपई तोला मंहगा परे लगे।
     रतन के सब ईशारा ल मनसा के संग फुलबासन समझत रहय पर कहे त कहे का। मुंहु लगई म अपने फजिहत होय के डर। रतन से फुलबासन सीधा मुंहु बात नई करय अउ मनसा संग हंस हंस के गोठियाय। मनसा संग फुलबासन के गोठियई रतन ल फटे आंखी नई सुहाय, पर कहे कइसे। आखिर म फुलबासन रतन के लगथे त लगथे का। ओ हर गांव के टुरी अउ रतन गांव के टुरा। पर मनसा तो घलोक गांव के टुरा रहय। दू लइका के बाप। शरम मरम सब बिसर जाये, फुलबासन के मोहाटी म पहुंचे सांठ। जब फुलबासन अपन ससुराल ले मइके अइस। दू महिना बाद ओकर ससुराल वाले मन ओला लेहे बर अइन। मां बाप दूनों भेजे बर राजी। फुलबासन साफ कहि दिस - मंय नई जावव।
      बहुत बड़का बात होगे। गांव भर बिगरगे। कइसे बिगरिस कोनो नई जाने। घर म बात होय रिहीस अउ हवा पूरा गांव म बिगरा दीस। कोनो कहिथे - जउन बेरा फुलबासन ससुराल नई जावव किहिस ओ बेरा नाऊ हर दामाद बाबू के हजामत बनावत रिहीस। कोनो कहिथे - बरदीहा हर गाय दूहत रिहीस। सच म बात कते मेर ले फइलिस, न फुलबासन के दाई ददा ल गम परिस अउ न दामाद अउ फुलबासन ल। दामाद बाबू अपन संगवारी परलोखिया ल धर के आय रहय। दूनों कोई के मुंहू सुन के फक्क पड़गे। दाई - ददा, फुलबासन ल समझाये के उदिम करिन, पर फुलबासन अपने म डटे रिहीस। ससुराल नई जाय के कारन पूछित पर फुलबासन के तीर म कोनो कारन नई रिहीस। कहि दीस - अइसने नई जावव। बेटी ल अड़े  देख दाई - ददा दामाद बाबू ल समझाईस - लइका अपन म अड़े  हवे। हम समझाबो, बुझाबो।
     सास ससुराल के समझाईस ल समझ के दामाद बाबू अपन संगवारी परलोखिया के संग अपन गांव लहुटगे।
दामाद बाबू के दाई ददा ल पता चलिस त ओमन गुस्सा गे। तुरते गांव जाये के बिचार करे लगीन। पर ओमन सोचिन - जइसे लइका ल खाली हाथ पठो दिस हमला घला ल पठो दे। परलोखिया तो गांव भर म बो डरे रहे। अब लाज शरम ल जतने के लइक जघा नई रहिगे रिहीस। गांव के दू - चार सियनहा मन ल बला के दामाद बाबू के ददा अपन पीरा ल ऊंकर तीर रखीन। गांव के चार सियनहा दामाद बाबू के ददा संग ओकर ससुरार जाये बर तियार होगे।
     गांव म समधी के संग चार अउ सियनहा मन ल आये देख के फुलबासन के दाई ददा के हवा होगे। पर करे का। सगा मन ल बने अपन घर म बइठइन। चाय पानी पियाइन। एक सियनहा कहिस - कस रे भई, हमर लइका बहू ल लेगे खातिर आये रिहीस, ओला बाबू संग काबर नई पठोयेव?
- नोनी कहिथे, कुछ दिन रहूंहू फेर जाहूं कहि के। साफ लबारी मार दिस फुलबासन के ददा ह।
आये संग मन कोई नवा नेवेरिहा नई रिहीन। ओमन सब समझत रिहीन कि बहु के ददा परदा डारत हवै। एक सियनहा किहिस - जउन बात हे फोर के कहो सगा। हम मन इहां झूठ लबारी ल मोटरिया के गांव लेगे बर नई आय हन।
     अब तो सही ल कहिना परिस - का बतावंव सगा, जब ले दामाद बाबू जुच्छा हाथ गे हे। नोनी ल समझा समझा के हम दूनों प्रानी हताश होगेगन। ओहर अपने च अड़े हवै।
- जब तोर टुरी ल ससुराल नई जाना रिहीस त बिहाव ल काबर करिस? उचहा आवाज म एक सियनहा किहिस।
- घर के फदीता ल बाहर झन निकालो सगा। फुलबासन के ददा के हाथ जुड़गे।
- ये कोई तोपे ढांके के नोहे सगा, आज नई तो कल खुलबे करही। बहु ल बला। हम बात करबो। पहिली सियनहा किहिस।
      फुलबासन अइस। ओला गांव ले आये  सियनहा मन समझाइन पर ओहर एक ठन रट लगा ले रिहीस - मंय ससुराल नई जावव। काबर नई जावव ऐकर जुवाब ओहर देबे नई करिस। अब तो सियनहा मन के गुस्सा गरमा गे। किहिस - अइसन में चार समाज ल जोरे ल परही सगा।
     फदीता अब घर ले समाज अउ गांव म फैले ले कोनो नई रोक सके अइसन समे आ गे। फुलबासन ल फेर सबो के सबो समझाये के परयास करिन पर सब असफल। आखिर म गांव के मुखिया अउ दू चार गांव के सियनहा मन मेर सियनहा मन अपन बात ल रखीन अउ रात म बइठका के तियारी होय लगीस। अब तो फुलबासन के दाई ददा मेर मुड़ ल गड़ा के चार समाज के बात सुने के अलावा कोनो चार नई रिहीस। बइठका म गांव वाले मन जुरयागे। मजा लेवइया मन के कमी नई रिहीस। बात उठिस। बइठिस। फुलबासन अपने च अड़े रिहीस। आखिर म फइसला होइस- जब फुलबासन, अपन ससुराल नई जाना चाहय त येकरो लइका ल स्वतंत्र छोड़ो। ओकरो दिन जवानी हे। दूसरा बिहाव कर अपन परिवार चलाही।
     निर्णय होगे। फुलबासन अउ ओकर बिहाता के संग छुट गे। अउ जब ले फुलबासन अउ ओकर बिहाता संग छुटिक छुटा होइस। कतको झन मन फुलबासन ल बिहाय बर अइन पर फुलबासन नई मानिस। धीरे - धीरे फुलबासन के ससुराल छोड़े अउ दूसरा बिहाव नई करे के कारन न सिर्फ ओकर दाई - ददा ल बल्कि पूरा गांव ल समझ आये लगीस। पर कहे त कहे कोन।
     रोज बिहिनिया ले जइसे मनसा फुलबासन के खोर तीर म आ के ठड़  जाये वइसने आ जो ठाड़े हे रिहीस। फुलबासन बाहरी म खोर ल बाहरिस अउ अपन घर कोती खुसरगे। फुलबासन के घर म घुसरे के बाद मनसा अपन घर कोती लहुट गे।
     रमौतिन रोज - रोज  मनसा के चरितर ल देखे अउ ओकर तन - बदन म आगी लग जाये। कहे कुछू नई पर घर के बर्तन मन ल उठा पटक करे। ओहर छकछक ेले गोरी रिहीस ओकर गुस्सा नाक म चढ़े अउ ओहर ललिया जाये। ओकर गुस्सा ल मनसा अनुभव करे पर हंसत कहय - थोरिक धीरे पटक बर्तन मन ल, टूट - फूट जाही।
     रमौतिन कुछू नई कहय। गरम गरम चाय ल कप म ढार के मनसा मेर टेका दे। कप के ठेंठा ल खुदे धरे रहय अउ कप ल मनसा ल धरा दीस। चाय ले गरम कप रिहीस। मनसा के हाथ जर गे। मनसा किहिस - चाय दे के ये कोई तरीका आवै?
- अउ कइसे देथे ....। कहत रमौतिन रंधनी डहर चल दीस। मनसा चाय पीइस कोठा डहर गीस। घर के बाहिर चार ठन थुनिया लगा के खद्दर छा दे रहय। उही मेर कोटना रिहीस। बइला बांधे बर खूंटा रिहीस तेमा ल के बइला मन ल बांध दीस। कोटना म पानी डारिस अउ उही म कूटी डाल दीस। बइला मन खाये लगीस। मनसा बइला मन ल दाना पानी दे के फेर अंगना म अइस अउ रमौतिन ल आवाज दीस  - रमौतिन ....।
     रमौतिन रंधनी खोली डहर ले निकलत किहिस - का ये....।
- मंय तरिया डहर जावत हंव। मनसुख आही त बता देबे।
     रमौतिन उंकरिस न भुकरिस। मनसा के चरितर ल देख - देख के ओकर तन बदन म आगी फुकत रहै। कहे कुछु नई पर करके मनसा ल जेता दे कि ओहर मनसा ले नाराज हवै।
     गाँव के माई लोगन मन मनसा अउ फुलबासन के संबंध ल ले के खुसुर - पुसुर  करैं। उंकर खुसुर - फुसुर  रमौतिन के कान तक पहुंचे अउ ओहर जर - भुन जाये। कोनो ल कोई जुवाब नई दे पाये। दे ता दे कइसे, ओकर गोसइयां बइसने रिहीस।
     एक दिन गाँव म फुलबासन के पाँव भारी होए के फुसफुसाहट सुरु होइस अउ गाँव गली ल छानत रमौतिन के कान म पहुंच गे। अब तो घर म कलहा सुरु होगे। दुनों के गोठियाना - बतियाना लगे रिहीस पर अब तो उंकर चरितर - मरयादा लांघ डरे रहै। मनसा के कान म खबर पहुंचिस त उहू अकबकागे। ये बात ल मनसा अउ फुलबासन जानत रिहीस के उंकर बीच सिरिफ अउ सिरिफ गोठियाई - बोलाई के नाता रिहीस। येकर ले आगू कुछु नई। मनसा जानत रिहीस - फुलबासन अमल म कइसे होइस, ऐला फुलबासन ही बता सकत हे। ओहर फुलबासन के डेरौठी म जा के खड़ा होगे। फुलबासन अपन घर ले निकलिस। मनसा किहिस - ये सब कइसे हो गे, फुलबासन?
- इही बात मंय तोर ले पूछव त? फुलबासन किहिस।
- पर हमर बीच तो अइसन नाता नई रिहीस।
- ये ला सिरिफ मंय अउ तंय जानथन।
     उंकर बीच बाताचीता चलत रिहीस उही बेरा रतन उंकर बीच आ गे। रतन ल देख के फुलबासन मुसका दीस। रतन बर हरदम ललियाये फुलबासन के मुसकान कुछु अउ कहानी कहत रिहीस। रतन घला मुसका दीस। बात साफ रहै पर मनसा अउ फुलबासन के संबंध गाँव भर बिगरे रहै। रतन किहिस - मनसा, अब तो तोला फुलबासन ल रखे ल परही।
     तरिया खाल्हे दू खेत के आड़ म फुलबासन अउ रतन मन के खेत रहय। खेत के बीच मेड़ म मचान बने रहय। दुनों के खेत म चना अउ गहूं बोवाय रहिस। चरबज्जी बेरा फुलबासन सुआ हर्राये अउ बेंदरा भगाए बर खेत कोती जावै। उही बेरा रतन घलक लठंगा - लठंगा पहुंच जाए। मुंधियार होवत - होवत ओ मन खेत कोती ले लहुटे।
     रतन के फुलबासन के पीछु लगई मनसा ल नइ भावै पर कहे त कइसे? रतन अउ फुलबासन के खेत आजू - बाजू रिहीस। न रतन अपन खेत के रखवारी करे बर रुक सकत रिहीस न फुलबासन। मनसा एक दिन फुलबासन ल जरुर कहे रिहीस - देख फुलबासन, रतन नीयत खोट्टा हवै। ओकर ले बच के रहिबे।
- का तोला मोर ऊपर भरोसा नई हे। फुलबासन पूछे रिहीस।
- तोर ऊपर पूरा भरोसा हवै पर रतन ऊपर नई हे।
- तोला रतन ले अतका डर हवै त मोला चुरी पहिरा के अपन घर काबर नई ले जावस। सब झंझट खतम हो जाही। फुलबासन किहिस अउ जोर दार हंस दीस। हरदम फुलबासन के बोलई - हंसई मनसा न बड़ नीक लगे पर ओ दिन फुलबासन के  बोलई  हंसई मनसा ल नई भाईस। मनसा के बोलती बंद हो गे।
     फुलबासन अपन बात म कतका ईमानदार रिहीस येला तो उही जानें पर ओकर पाँव भारी होवई मनसा ऊपर भारी पर गे रिहीस।
     काकर - काकर मुंहूं ल मनसा रुंधतीस। ओहर हारे जुआरी बराबर अपन घर कोती लहुंट गे ....। 

गली नं- 5, एकता चौंक, ममता नगर
राजनांदगांव ( छत्‍तीसगढ़ )

रविवार, 10 जनवरी 2016

फुटहा छानी

सुरेश सर्वेद

            गांव भर चरचा च ले लगिस. अब पंचाइती चुनाव म सरपंच महिला ल चुने जाही. कोन अपन माई लोगन ल चुनाव म उतारही, दिन – रात इही बात होय लगिस. कम पढ़े लिखे गांव म जइसे माईलोगन ल चूल्हा फुंकइया अउ कोरा म बंस बढ़हइया के संग कोरा म लइका खेलइया समझे जाथे ये गांव, उही गांव के श्रेणी म आये. गांव म बइसका होय अउ कोन चुनाव लड़ही ये गोठ आये अउ जाये पर निणर्य नई होय पाय . काबर के कोनो मरद बइठका म अपन घरवाली ल चुनाव म खड़े करे के बात नई करय . खिलावन बिन बलाय बइठका म आवय अउ मने मन कामना करय के ओ बेरा कभू मत आये जब कोनो गांव के मरद उठके के कहे कि ओकर माईलोगन चुनाव लड़ही. ओकर मंशा अपन माईलोगन ल चुनाव लड़ाय के रिहीस. पर बइठका म ऐकर सेती फुरिया नई सकय के ओला गांव म आये अभी जुम्मा – जुम्मा एक बरिस होय होही.दुसंधा म रहय कि गांव वाले मन ओकर बात ल मानिस के नई मानिस. इही उधेड़बुन म ओहर अपन बात नई रख पात रिहीस. ओहर चाहत रिहीस के गांव वाले मन खुद होके ओला कहाय . पर गांव वाले मन के कहना तो दूरिहा के ओकर डहर हिरक के नई देखय . देखतिन भी काबर ओहर बाहिर ले आये हे अउ गांव के जिम्मेदारी ओला संउपे के कइसे बिचार गांव वाले मन करतीन . पुराना सरपंच घलोक सुधवा. अपन सियानी के दिन म कभू दू पइसा के गबन नई करिस. गांव के बिकास म जतका हो सकीस करे के परयास करिस. एक दिन के बइठका म ओकर माई लोगन ल सरपंची चुनाव म खड़ा कराय के बात अइस पर पुराना सरपंच कहे लगिस – मोर बाई कम पढ़े लिखे हे. पंचाय त म लाखों रूपिया के काम आथे, मंय तो जइसे तइसे च ला लेत रहेवं फेर बाई कर पाही ऐमा मोला संदेह हे. अउ फेर आजकल जनपद के बाबू भइया म खांव – खांव करथे. एक – एक काम म कमीशन मांगथे. मंय तो लड़ झगर लेत रहेंव पर डौकी परानी का करही.
            पुराना सरपंच के बात ल गांव वाले मन सुनके कहिन – तोर बाई नाव के सरपंच रही. काम बूता ल तंय करबे.
          गांव वाले मन के सलाह घला पुराना सरपंच ल नई जमिस. पढ़े – लिखे सरपंच के बात आते ही खिलावन के मुंह म पानी आय लगिस. ओहर मने मन बिचारे लगिस के गांव वाले मन जानतेच हे के ओकर बाई पढ़े लिखे हे. ओ चाहे लगिस के कोनो उठे अउ ओकर बाई के नाव धरदे. पर ओकर डहर ले गांव के गांव बेखर रिहीन.
            अब तो दिन अउ रात कोनो बेरा अइसन नई रिहीस जब माई लोगन के ये चुनाव म सरपंची चुनई के बात नई च लत रिहीस होही. जहां दू झन आदमी सकलाय बस एके च रचा कोन अपन माई लोगन ल चुनाव म खड़ा कराही ?
            पीपर के पेड़ तरी बने च उंरा म बइठे हिरामन गोठयाय अउ बीच – बीच म सुकदेव हुंकारू भरय .अब गांव डउकी सियानी म च Jही . सरकार J घJा पता नई का – का होवत रहिथे. कते – कते कर ले निय म कानून लाथे अउ सउप देथे हमला भोगे बर. जब डउकी परानी गांव के सियानी करही त घर के च उका – चूल्हा कोन देखही. कोठा के गोबर कोन हेरही. गोबर के छेना कोन थोपही ?
– आज समय बदल गे हे हिरामन, कब तक माइलोगन मन घर बइठे रहही ? सरकार जउन करथे, सोच – समझ के करथे जी ।
– तोर गोठ ल मंय मानव हंव पर जब माइलोगन गांव के सियानी करही, तब घर परिवार कते डहर जाही ?
– तंय शहर के माइलोगन मन ल देखेच हस हिरामन । ओमन नउकरी – चाकरी करथे अउ अपन घर परिवार ल घला सकेलथे ।
– तंय सिरतोन कहत हस संगवारी, मोर मति मारे गे रिहीस …।
            हिरामन अउ सुकदेव के जोड़ी ल का कहिबे. नानपन म दूनों जउन संगवारी बनीन ओला अब तक निबाहत हे. दुनों के जोड़ी ल टोरे के जलनखोरहा मन कई उपाय करिन. परपंच रचि न पर उंकर जोड़ी नई टुटिस. अब तो उमर साठ ले पार करले हे अउ नानपन ले एको दिन अइसन नइ गिस होही जब दूनों संगी अलग होय होही. कोनो गांव जाना रहय त दूनों संगे जाय . चाहे सुकदेव के सगा घर बर बिहाव, मरनी – हरनी के काम कारज राहय या फेर हिरामन के सगा घर. जवानी के दिन म जतका उतलंई ओमन करिन होही ओतका कोनो अउ करे होही अइसन सुने ल गांव म नई मिलिस. चाहे तरिया म डूबक – डूबक के नाहय के होय या फेर भैरी के बारी ले बिही – खिरा चोरय के होय .
            अभी उंकर मन के बाताचीता च लत रहिस के साय कल म नरोतम आवत दिखिस. नरोतम सुकलिया के गोसइया ये. नरोतम चार कक्ष्ाा पढ़े के बाद पढ़ई ल छोड़ नांगर – बख्खर के काम काज म जोतागे. ओकर बाई सुकलिया दसवीं कक्ष्ाा तक पढ़े रहय . पर कभू अइसन नई लगिस के सुकलिया ल अपन पढ़े लिखे के गरब गुमान होही. बड़े ल बड़े अउ छोटे ल छोटे माने म कभू अनाकानी नई करिस. अइसन बेरा घला कभू नई आइस जब ओकर संग कोनों माई लोगन के लड़ई – झगरा होय होही. दसवीं पढ़े के बाद भी ओहर गांव के रंग म रच बसगे. नरोतम उंकर कर अइस. साय कल ल ठाड़ कर कहिस – का गुनतारा च लत हे दुनों संगवारी म ?
– अरे नरोतम, तंय कहां ले आवत हस बाबू , आ बइठ. हिरामन कहिस.
– नहीं बबा, मोला बड़ बेर होगे घर ले निकले . गाय गरू ल पेरा भूंसा दे के बेरा होगे हे. फेर कभू बइठबो.
– हव रे भई, हमन तो होगेन ठेलहा, तंय कमइया. काबर समे खराब करबे हमर मन तीर.
– अइसन बात नोहे बबा,
– त अउ कइसन बात हे ? हिरामन तिखारिस.
– तहूं अतका ल नई जानस हिरामन. बड़ बेर घर ले निकले हे बिचारा. काम धाम नई करही त बहू ठठाही नहीं. अउ दुनों संगी हंसे लगिन. नरोतम – तहूं न बबा कहत साइकल के पइडिल ल ओंट आगू डहर बढ़गे.
हिरामन अउ सुकदेव के बात फेर च ले लगिस.
            दिन सरकते गिस अउ चुनाव बर परचा भरे के दिन लठियाते गिस. गाँव म फेर बइठका होइस. कोनो अपन माइलोगन ल चुनाव म उतारे बर तियार नई होइस. खिलावन समे के ताक म रहिस. कोतवाल समे कहिथे – हमर मेर जादा दिन नई हे. कोनो न कोनो ल परचा भरवाये के निरनय ले ल परही. नई ते हमर गाँव म सरपंच चुनई म देरी के साथ बिकास काम म घलो देरी होही.
            कोतवाल के बात सिरतोन रिहीस. बिन सियान के भला गाँव के समस्या सरकार तक कइसे पहुंच तिस अउ कइसे समस्या के निदान होतिस. पर इहां तो बिकट समस्या उपस्थित रहिस. कोनो ये कहे बर तियार नई रिहीस के मोर बाई हर चुनाव म उतरही. अभी गांव म बइठका च लते रहिस के गांव के समारू अउ जीवन अइन . ये दुनों के दिन कटे खिलावन के घर. इंकर माईलोगन मन पर के खेती म बनी भूती करे अउ बाल ब‚ा के साथ अपने गोसइयां के पेट घलोक पोसे. एक – एक चेपटी म अतका ताकत रिहीस के दुनों के दुनों खिलावन के परम भI बनगे रिहीन. खिलावन इही दुनों ल अपन पक्ष्ा म बोले बर तियार करे रिहीस. अउ आज बइठका म आ के ये दुनों अपन बात ल बकर डरिन. कहिन – हमर गांव म कोनो तियार नई होवत हे अपन बाई ल सरपंची चुनाव म उतारे बर ता काबर खिलावन के माइलोगन ल नई उतार देव चुनाव म.
            गांव भर के जुरायाये लोगन ल समझ आत देरी नई लगिस कि ये खिलावन के दारू बोलत हे. हिरामन तिलमिलागे. कहिस – खिलावन ल अभी जुम्मा – जुम्मा चार महीना होय हवे गांव म बसे अउ तुमन ऐकर माईलोगन ल गांव के सियानी सौंपे के गोठ गोठियाथो. ये गोठियाये के पहिली सोचो समझो काबर नई.
– तोर कहिना ठीक ये बबा, पर तहीं बता जब कोनो गांव के माईलोगन तियार नई हे चुनाव लड़े बर तब अउ का हमर मेर रद्दा हे. तहीं फुरिया, कोन अपन माई लोगन ल चुनाव म उतारे बर तियार हे ?
            हिरामन चुप होगे. नाव ले त ले आखिर काकर. कोनो तो मुंह फुटकार के कहत नई हे के मोर माईलोगन चुनाव म उतरही. गांव के सियानी करही. हिरामन कहिस – पराया ल सियानी सौपे के बजाय हम चाहत हन हमरे सियानी करे.
– पर कोन हे तेन ल तो बता बबा ?
– तुमन पर ल गांव के सियानी सौपे के जघा म अपन माईलोगन ल सियानी सौपे के काबर नई सोंच व ?
– पर हमर बाई तो पढ़े लिखे नई हे, सरपंची बिना पढ़े लिखे करही ता गांव के का होही, तहूं जानथस अउ महूं.
            बात सिरतोन रिहीस. जउन जतका जादा पढ़े लिखे रहिथे. ओहर ओतके अच्छा अधिकारी – मन संग बात करे ल जानथे अउ गांव के समस्या ल रखके ओकर निदान के उपाय सुझाथे. पर इहां दुनों दरूवाहा के माईलोगन मन तो एक कक्ष्ाा नई पढ़े रिहीस. इंकरो मुड़ मं गांव के सियानी देना मने अपन गांव के बिकास ल रोकना ये. दुनों दरूवाहा के बात ल सुनके खिलावन मंद – मंद मुसकाये लगिस पर हिरामन के अड़गा म ओला गुस्सा घलोक आये लगिस. पर करतीस ता करतीस का. एक डहर पूरा गांव रिहीस एक डहर खिलावन अउ ओकर दु पोसवा दरूवाहा. तीन झन से काम बनने वाला नई रिहीस. खिलावन तो च हत रिहीस – कम से कम आधा गांव ओकर पक्ष्ा म आ जाये फेर आधा ल बात माननेच ल परही. पर इहां आधा गांव तो दूरिहा के रिहीस. दू के सिवा तीसरा ओकर पक्ष्ा म नई रहिस. वइसे जब ले पचार् भरे अउ चुनाव होय के च चार् गांव म होय लगिस तब ले खिलावन सक्रिय होगे रहिस अउ गांव के अइसन कोनो आदमी नई होही जेन ल अपन जाल म फांसे के परयास नई करिस होही पर गांव वाले मन ओकर दारू तो पीगे पर ये दूनों दरूवाह के बाद तीसरा कोनो ओकर जाल म नई फसीस. गांव म जतका बेर बइठका होइस, कोनो ओकर पक्ष्ा नई लिस. अब तो निरनय के घड़ी तिरयागे रिहीस. अपन बात ल अपन मुंह न रखके दूनों दरूवाहा के द्वारा रखना उचि त समझ ओहर तीन दिन ले ओमन ल अतका पीयात हे के गांव में बिरोध के बावजूद ओमन अपनेच बात में अड़े रहय संगे संग गांव वाले मन ल भी अपन बात माने बर तियार करले. खिलावन जतका आसान बात बने के सोच त रहिस ओतका आसान नई होत रहिस. घुम फिर के बात घेरीबेरी अपनेच गांव के माईलोगन ल चुनाव म उतारे के आ जाय .
            अभी गुनताड़ा च लत रिहीस. उही बेरा नरोत्तम अइस. नरोत्तम ल देखके हिरामन के आंखी च मकगे. नरोत्तम ल अपन तीर म बलइस. कहिस – नरोत्तम, तोर माइलोगन पढ़े – लिखे हवे. तंय अपन माईलोगन ल सरपंच चुनाव के फारम भरवा दे.
– मंय गरीब आदमी बबा, दूनों परानी मेहनत – मजदूरी करके घर – परिवार ल च लाथन. फेर गांव के सियानी कइसे अपन मुड़ म लेबो. घर के छानी फूटहा हे. पानी टपकथे. अपनेच छानी ल टपराये के मोर ताकत नई हे तब कइसे गांव भर के छानी ल टपरा सकत हंव.
– तोला अपन फुटहा छानी के चिंता हे ? इहां गांव भर के साबुत छानी घलोक निथरे लगही, ऐकर चिंता फिकर नई हे ?
– अइसे कइसे होही बबा, भला साबुत छानी कइसे निथरे लगही ?
समारू गुमशुम बइठे कुछ सोचे लगिस । ओकर दारू के निशा उतरे लगिस । फेर डगमगावत उठीस अउ कहे लगीस – हिरामन बबा सिरतोन कहत हे नरोत्तम …।
            समारू के बात ल सुनके खिलावन के संगे संग गांव वाले मन घलो अकबकागे. समारू अपना कहना जारी रखिस – तोर घर के छानी ले पानी टपकथे ता का होगे. गांव घर के सरपंच बनही त छानी छवा जाही अउ पानी के टपकना घला रूक जाही पर पराया के हाथ सियानी जाय म साबूत छानी ले पानी टपकना शुरू हो जाही ….। समारू जीवन ल देखके कहिस – कइसे जीवन, का मंय गलत कहत हंव ।
– बिलकुल गलत नई कहत हस संगवारी …। जीवन हर समारू के साथ देय लगीस. उंकर बात ल सुनके खिलावन के गुस्सा भड़के लगीस. पर करे त करे का ? गांव के जुरयाये लोगन के बीच फुटकार के ये थोरे कहय कि मंय तुम्मन ल तीन दिन ल दारू अइसने कहे बर पीयाय हंव रे. ओकरे फजीहत होतिस. मन मारके बइठे रहिस …।
– गांव के सियानी गांव च के हा कर ही तभे गांव म बिकास होही. दारू पीयाके जउन सियानी चाही, वो अपन बिकास ल सोच ही… कइसे समारू ? जीवन किहीस.
– सिरतोन कहत हस संगवारी …। समारू हुंकारू भरिस.
            खिलावन दू ठन आदमी पोसे रहिस, उही मन ओकर बिरोध म होगे. अब खिलावन ल लगे लगिस – ओकर पोलपटृी खुले के बेरा आगे. ओहर बइठा ले सलटे के जुगत म रहीस. समारू ओकर कर अइस. कहिस – कइसे खिलावन, तंय हमर बिचार ले सहमत हस नहीं ?
            खिलावन का कहे. चुप रिहीस. जीवन किहिस – अरे समारू, खिलावन का कहही. ये हमर गांव के मामला ये. हम ये माटी म जनमे, ये माटी म खेले कूदे हन. नानपन ले हमर तन अउ मन म ये माटी समाय हे. पराया ल पूछे के काबर ? निरनय हम्मन ल लेना हे. नरोत्तम घर के भउजी सरपंच बनही, मतलब उहिच बनही…।
– कइसे नरोत्तम, अब तोला का कहिना हे ? हिरामन कहिस.
– अब मंय का कहव बबा, गांव वाले न जउन चाहही उही होही.
            नरोत्तम के कथन म स्वीकृति रहिस. पहली थपड़ी जीवन पीटिस अउ फेर बइठका भर थपड़ी के आवाज म गूंजे लगिस. थपड़ी के आवाज खिलावन के कान के परदा चीरे लगीस. ओहर बइठका ठउर ले उठके अपन घर डहर च ल पड़िस, पर थपड़ी के गूंज ओकर कान के संग नई छोड़िस….।

गउ हतिया

सुरेश सर्वेद

            ननकी कभू सोचे नई रिहीस के ओकर ऊपर अतका बड़े जान पाप थोप दे जाही। अंधियार कोठा म बइठे रिहीस ओहा। कोठा के अंधियारा ले जादा ओला अपन अंतस म अंधियार लगत रिहीस हे। ये अंधियारा ओला लीलत रिहीस। ओकर मन म विचार उठत रिहीस – का सेवा के आइसने परिनाम निकलथे ? का ओहर ओकर हतिया कर सकत हे जेकर ले ओला अपन जान ले जादा लगाव रिहीस हे ? का ओहर अपन सबले प्रिय ल ही अपन से दूरिहा करे के पाप कर सकत हे ? अइसन प्रश्न ओकर दीमाक म कुलबुलात रिहीस हे, ऐकर उत्तर खोजे के परियास करिस पर खोज नइ पाइस।
            ननकी ये बात म विश्वास नई करत रिहीस हे के जउन समाज परिवार के मुंहू ओकर गउ सेवा के प्रसंसा करत नई पिरावै उही परिवार अउ समाज ओकर ऊपर गउ हतिया के आरोप लगाही, ओला हिकारत के नजरिया से देखही। दूसर के बात का करबे ओकर पत्नी – रमसीला, ओ पत्नी जउन सात फेरा आगी के आगू म ले रिहीस अउ सात जनम तक संग म सुख दुख बांटे के कसम किरीया खाय रिहीस उहू हर दोस मढ़े बर नई चुकत रिहीस। जब खुदे के छइंहा संग छोड़ देही त आदमी करही त करही का ? ओकर छइहां रिहीस रमशीला। उहू हर ओकर संग दे के बदला ओकर खिलाफत म चले गे रिहीस। गाय के मरे के जिम्मा ननकी ऊपर थोपे ले नई चुकत रिहीस। ननकी करे त करै का ? ओकर हिस्सा म तो परिवार – समाज हर पश्चाताप सउंप दे रिहीन। ओहर प्रतिकार घलोक नइ कर सकै। ओकर सुनने वाला कोनो नई रिहीन। एक झन भी ओकर संग देतीस त ओहर प्रतिकार करे के या फेर अपन सफई दे के साहस करतीस पर इहां सब के सब ओकर काम ल घिनौना बताये बर, प्रमाणित करे कर चूकत नई रिहीन।
            अंधियार कोठा म ओला गुढ़ी चंउरा म सकलाये गांव वाले के चेहरा दिखे लगे रिहीस। बइसका म सकलाये लोगन मन के आवाज सुनाई दे लगे रिहीस। गांव के अइसन – अइसन लोगन मन बइसका म सकलाये रिहीन जउन मन ल गांव के बइसका से कभू कोई मतलब नई रहै। बइसका म सकलाये गांव वाले मन ओकर ऊपर गउ हतिया के दोस मढ़े बर कोताही नइ बरतत रिहीन अउ ओकर ऊपर घृणित नजर डारे ले बाज नई आवत रिहीन।
            गुड़ी चंउरा के जुरे बइसका म दोनो पक्ष अपन – अपन बात ल रखिन। राम्हू किहीस – ननकी गउ प्रेमी आवै मगर ओकर करम से अइसन लगथे ऐकर गउ प्रेम सिरफ देखावा अउ छलावा आवै। मोला लगथे ननकी जउन परकार के करम करे हे ओहर गउ हतिया ही हे, बाकी पंचाइत के निरनय …।
           अवसर मिले रिहीस त जगनू घलोक बोले बर काबर चूकतीस। ओला ओ दिन के सुरता आ गे जब ओकर गाय ननकी के खेत म खुसर के फसल ल चर दे रिहीस। ननकी हर गाय ल खेत ले हंकाल के जगनू ल केहे रिहीस – देख जगनू जब तब तोर जानवर मन खेत म खुसर के फसल ल बरबाद कर देथे। तंय ऐला अपन घर म बांध के रख या फेर बरदीहा ल चेता दे – गाय बरदी छोडक़े झन भागे नई तो बिवस हो के मोला तोर जानवर मन ल कांजी हाउस ले जाना परही।
            जगनू के जानवर मन भागोड़ा रिहीन। बरदी ले कतका बेर छिटक के खिसके बरदीहा घलोक गम नई पाय। जब बरदीहा गम नई पात रिहीस त ओला पता कइसे चलतीस के जगनू के जानवर बरदी ले छंट गे। एक – दू बार जगनू हर बरदीहा ल चेताय के परियास करे रिहीस। तब बरदीहा के जुवाब रिहीस – गांव भर के जानवर एक डहर त तोर जानवर एक डहर। मिलखी मारते बरदी ले खिसक जाथै। बरदी म लाय बर दउड़ो त हाथ नइ आवै। अब तहीं बता तोरे जानवर के पाछू दिन भर भागहू त दूसर के जानवर ल कोन चराही। मोर सलाह हे – तंय अपन जानवर मन ल कोठा म बांध के रख।
            बरदीहा के बात सुन के जगनू तिलमिला के रिहीस। पर करे त करे का ? ओकर एक जानवर के अइसन हाल होतिस त घर म बांध के रख लेतिस मगर ओकर मेर दू बइला, दो गाय अइसे चार जानवर रिहीन। ये मन ल ओहर घर म बांध के रखतीस त रखतीस कइसे। चार जानवर के हाल ये रिहीस के एक भी अइसन नई रिहीस जउन दिन भर बरदी म रहै। ओमन बरदी ले एक एक करके अइसे खिसके जइसे आपस म सुंता होय रहय होही। ननकी के भासा अउ कई गांव वाले मन जगनू ल कही डर रिहीन। जगनू ल आय दिन जानवर मन के सेती ककरो न ककरो सुनेच ल परे। आज ओला सुनाये के अवसर मिले रिहीस। ओहर किहिस – राम्हू के कहिना गलत नई हे। वास्तव म यदि ननकी के मन म जानवर के प्रति प्रेम होतिस त मोला नई कहितीस के तंय अपन जानवर मन ल घर म बांध के रख नई ते कांजी हाउस म ओइला देहूं। मोर तो कहीना हे – ननकी के अपराध ल सामान्य अपराध न माने जावै। ननकी ल कड़ा दण्ड दे जावे। मोला तो लगथे ननकी जान सुन के गाय ल अतेक जोर से धकेल दीस होही के गाय के परान पखेरु गिरते सांठ उड़ा गे।
            जगनू के बात ननकी ल चुभ गीस पर चार समाज के बीच अपन सफई दे त दे कैसे ? ओकर बाई जउन ओकर संगेसंग चलने वाली रिहीस। उहू आज पंचाइत म ओकर बिरोध म चल दे रिहीस। अइसन म ओकर सफई के असर समाज म होतिस ये बात नई रिहीस। ओहर मुड़ न नवा के पंचाइत म किहीस – मंय अपन सफई म का काहौ ? कहहूं भी तो काबर ? पंचाइत मोर सफई म धियान देही अइसन नई लागै। पंच परमेश्वर इहां सकलाय हे। जउन निरनय करही, मोला स्वीकार हे …।
           पंचाइत म जुरे लोगन मन के बीच कानाफुंसी होइस। निरनय सुनाय खातिर आपस म सुलह होइन। पंचाइत अपन निरनय सुनावत किहीस – भले ही ननकी से ये अपराध अनजाने में होइस होही। पर अपराध तो अपराध आवै। समाज म गउ हतिया के प्रवृत्ति दिन दिन बाढ़ते जात हे। मूक पशु मन के प्रति संवेदना मरते जावत हे। अपन पालतु पशु मन ल जेन माहौल म बांध के रखथन ओहर कतेक अमानवीय, क्रूर और पीरा दायक होथे ऐकर अहसास हमू ल होना चाही। पालतु पशु मन के प्रति हमरो मन म संवेदना जागना चाही। ननकी ले जउन अपराध होय हवै ओहर गउ हतिया ले कम नई। गउ हतिया ल हमर समाज महापाप माने हे अउ ऐकर प्रायश्चित के हल घलोक निकाले हे। ननकी ल एकाइस दिन उही कोठा म काटे ल परही जिंहा ऐकर गाय बंधात रिहीस। ये एकाइस दिन म न ननकी कोठा ले बाहिर आ सके अउ न ही कोनो कोठा म जा सके। हां, ओकर बाई ह समय म जेवन परोसही उहू हर परदा म। ये बीच म जउ कोई ननकी ल देखही उहू दण्ड के भागीदार होही चाहे ये मा ओकर बाई रमसीला ही काबर न होय।
            पंचाइत के निरनय बाद ओला कोठा म धकेल दे गीस। उहां ननकी ल ओ दिन के सुरता आये लगीस जब मालती ल ओहर पहली बार अपन कोठा म ल के बांधे रिहीस। मालती ल जब बिसाये बर सरजू के पास गीस त उहां सरजू के मरजी चलीस। ओकर दाम म मालती ल बिसाये ल परिस। मालती ल लेके जब ननकी घर अइस त रमसीला खुशी के मारे फुल गे। उहू चाहत रिहीस के ओकर घर एक ठन गाय होवै। गाभीन होवै अउ बछरु जनमे। घर के ही दूध, दही, मही, घीव खाये ल मिलै। जाने ओ कोठा कब के बीरान परे रिहीस। जब मालती पहली बार बिहा के अइस तब कोठा म एक मरही – खुरही गाय बंधाये रिहीस, कुछ दिन बाद ओहर अपन परान ल तियाग दीस। तब ले कोठा डहर झांक के देखे के फुरसत ककरो मेर नई रिहीस। अब मालती आ गे रिहीस। पहिली ओला अंगना म बांधे गीस फेर कोठा के साफ सफई कर उहां बांध दे गीस।
            मालती के सेवा जतन म कभू रमसीला चुकत रिहीस न कभू ननकी। समय म दाना पानी मिलते गीस। मालती फुनाते गीस। दिन सरकिस अउ एक दिन उहू अइस जब मालती गाभिन हो गे। ओ दिन रमसीला के संग संगे ननकी के खुशी के का कहिना। मालती हर समय म एक सुन्दर स्वस्थ बछवा ल जनम दीस। अब तो मालती के देखरेख अउ सेवा जतन अउ बाढ़ गे। मालती दूध दे लगीस। दूध के संगे संग दही, मही अउ घी के सुवाद चखे ल मिले लगीस।
            ननकी खेती – किसानी ले थक मांद के आवै। रमसीला ओला जेवन परोस दे जे बर चिल्लावत रहै पर ननकी मालती के पीला संग खेले ल लग जावै। फेर मालती बर कोठा म कांदी डारे ल चल देवै। रमशीला कहत रही जावै – मालती संझा कुन बरदी ले लहूटही उहू म कांदी चर के फेर अतेक जल्दी काबर ? पहिली तुमन जे लव फेर कांदी डारत रहीना मालती बर। ननकी कोठा ले चिल्ला के रमसीला से कहै – तोर से एको काम नई होवावै। कोठा ल देख तो कतेक चिखला माते हे। मोला लगथे तोर जरा भी धियान कोठा के साफ – सफई म नई जावै। रमसीला ताना मारे। कहै – ठीक हे .. ठीक हे, पहिली जे लो फेर खुदे कोठा के साफ सफई कर लेना। जेवन के तुरते बाद ननकी कोठा म बाहरी धर के घुसर जावै अउ सफई करे लगे पर काला साफा करतीस। उहां चिखला माटी राहय तब न ? पूरा साफ – सफाई के काम तो रमशीला निपटा डरे रहै। ननकी जइसे जाय रहै वइसने लहुट जावै, बाहरी ल धर के।
            जिंहा बिहिनिया संझा कांदी दे के जवाबदारी ननकी पर रिहीस उहीं गोबर उठाये अउ कोठा ल साफ – सफई करे म रमसीला जरा भी आलस नई देखात रिहीस। रात म जब ननकी सोवै त मालती के बछरु ल अपन खटिया के खुरा म बांध के राखै। रात भर ओहा जतका आरो बछरु के लेवय ओतके आरो मालती के लेवत रहै। जब – जब रात म ओकर नींद उजरे ओहर एक नजर कोठा म बंधाये मालती ल जरुर देखतीस। वोला सुकून मिलय कि मालती पगुरावत आराम करत हवै। बिहिनिया होते सांठ बरदिहा पहुंच जावै। बरदिहा के आवै के भनक बछरु ल लग जावै। ओहर हम्मा – हम्मा चिल्लावन लागै। कोठा म बंधाये मालती तक आवाज पहुंचे। बरदिहा बछरु ल खोल देवै। बछरु दउड़ के अपन महतारी मेर पहुंच दूध पनपाय बर थन ल चुसे लगे। कुछ देर बाद बरदिहा बछरु ल मालती ले दूरिहा कर दे अउ कसेली भर दूध दूहू के बछरु ल छोड़ देवै। बछरु महतारी के दूध पीये लगे।
            ननकी कभू सोचे भी नई रिहीस के गउ सेवा के ओला अतेक बड़ सजा मिलही। पर अब करतीस त करतीस का ? ओकर ऊपर गउ हतिया के कलंक लग गे रिहीस अउ पंचाइत इककाइस दिन बंद कुलूप कोठा म बिताये के निरनय दे दे रिहीस। ननकी जइसे कोठा म घुसरिस, ओला मालती दिखे लगीस। ओला लगे लगीस – मालती मरे नई, जिंदा हे। पर सच्चाई इही रिहीस के मालती ये दुनिया ल छोड़ के परलोक सिधार चुके रिहीस। ननकी ल ये बात के पश्चाताप रिहीस के जब मालती के खुर से ओकर पांव दब गे तब हकाल के दूरिहा कर देना रिहीस। धक्का नई मारना रिहीस। ओहर धकेलिस तेकरे सेती मालती गिरगे अउ ओकर प्रान निकल गे। इककाइस दिन कोठा म काटना ओकर बर कठिन परिछा रिहीस। इककाइस दिन … पूरा इककाइस दिन। ओला इककाइस जनम के बरोबर लगे लगीस। बाहिर बछरु के हम्मा – हम्मा ओकर करेजा ल चीरे असन लगे। ओकर मन होवत रिहीस – जाके बछरु ल गला लगा ले। ओला दुलारे – पुचकारे। पर इहां कहां संभव रिहीस। कोठा से निकलना तो दूरिहा के रिहीस, कोठा म दूसर के खुसरना घलोक मना रिहीस। रमसीला बाहिर ले कोठा के भीतर जेवन के थारी ल धकेल दे। दू – तीन दिन ननकी से जेवन करे नई गीस पर भूखे पेट रहतीस त कब तक अभी तो ओला पूरा इकाइस दिन काटना रिहीस।
            समय निकलत गीस। दिन के गिनती होते गीस। एक … दू … तीन … बीस … पूरा बीस दिन होगीस ननकी ल अंधियार कोठा म कैद होवै। ओहर उजियारा के तलास म रिहीस। बाहिर के उजियारा नइ ओला ओ उजियारा के तलास रिहीस जउ उजियारा ओला इककाइस दिन बाद अपन करम के पश्चाताप के बाद मिलना रिहीस। पाप धोवै के बाद मिलइया उजियारा के। बीसवां दिन अउ बीसवां रात के आखिर पहर म ओकर नींद उजर गे। ओला लगे लगीस – इहीं कहीं मालती ठाढ़े हे अउ अपन गोसइया के दुर्दशा ल देख के बिकट दुखी हवै। ओकर आंखी म आंसू हवै अउ ननकी ओ आंसू ल पोंछे के परयास करे के बाद भी नई पोंछ पावत हवै।
           सूरुज उगे म अभी थोरिक देरी रिहीस। ननकी के कान तक मालती के बछरु के आवाज अइस। रमसीला अंगना ल बाहरत रिहीस। अचानक मालती के बछरु हर गला म बंधाये गेरवा ल तोर दीस। रमसीला ओला धरना चाहीस। रमसीला ओला धर पातीस ओकर पहिली बछरु हर कोठा के कपाट ल पेल के कोठा म घुसर गे। ओहर ननकी के तीर म जाके खड़ा होगे अउ ननकी ल चांटे लगीस। ननकी ल लगीस – ओकर सारा पाप धोवा गे। ओकर आंखी छलछला गे। ननकी बछरु ल पोटार लीस। ननकी ल लगीस – ओहर अनजाने म जउन अपराध करे रिहीस, ओकर सजा भोग डरिस। ओकर मन म जउन अपराध भाव रिहीस ओहर खतम होगे। ओकर ऊपर पोते कालिख बिहिनिया के उजियारा के संग मिटा गे। अब अंगना भर सूरज के उजियारा बिगर गे रिहीस।

नियांव के जीत

सुरेश सर्वेद

– बात – बात म लड़े बर तियार, अरे हमला का करना हे ? परदेशिया मंगलू के बारी ल टोरे के कोठार म कब्जा करे।
            गुणवंती के ताना ल सुन के सुमेर तरमरागे। किहिस – तुम्हरे मन के अइसनेच सोच – बिचार हमला जिंहा के तिंहा ठाढ़े रखे हवै। परदेश ले आथे अउ जम्मों गाँव म अपन राज चलावन लागथे।
– तुम्हर एक अकेला के करय ले कुछू होना जाना नहीं। फोकट म अपन लहू ल जरावत रहिथौ। जम्मों गाँव के मुँहू सियाये हे तब तुम काबर अपन मुंहॅू ल उलाथौ ?
– अन्याय , अनीति मोर देखे नइ सहाय ?
– त देखे सुने ल काबर जाथौ ?
– तोर कहना हे, दिगर जइसे महूं आँखी – कान ल मूंद के रेंगव। मुँहूं ल घर म डार के रहवं।
– अइसनेच मन के समे हे ….।
– तोर गोठ बात मोला नइ जमे …।
             कहत सुमेर अपन घर ले निकले लगीस। गुणवंती किहिस – जेवन चूर गे हे। खा – पी लौ फेर जावत रहिना बइटका म …।
            लाजवंती के ताना ल सुनके सुमेर के पेट भर गे रिहीस। सोचे रिहीस ओकर बाई लाजवंती ओकर पक्ष लेही। पर इहां तो पासा उल्टा पर गे रिहीस। अब डउकी परानी के मेर मुँह बजाना ओला ठीक नई लगीस। किहिस – तंय खा – खुवाके सो जबे। मोर रद्दा झन देखबे ।
– हव हव, गुड़ीचउरा म सकलाय बइठका तुम्हर बिना न शुरु होवय न उसले …।
            लाजवंती मुंह बजाते रहीस। सुमेर गुड़ीचाउरा तिर पहुंचगे। उहां गाँव भर के लोगन जुरियाये रहय। कोनो आधा बीड़ी ल मुँहू म हुरसे जलावत रहय त कोनो कस खींच के धुंगिया के लच्छा ल बादर कोती फुंकत रहय। सुमेर सीधा मंगलू के तीर जा के बइठगे। धीरे कुन मंगलू ल कोचकिस अउ जानना चाहीस के बइठका म अब तक का होय हे ? मंगलू चुप रहिस। सुमेर समझगे – बइठका अभी शुरू नई होय हे। मंगलू के कंधा ल सहलइस अउ जताय के प्रयास करिस – तंय फिकर झन कर। कोनो तोर संग नइ हे त का होगे मंय तोर संग हंव।
            मंगलू के हाव – भाव म थोरकिन परिवर्तन अइस। ओकर हाव – भाव स्पष्ट करे लगीस कि ओहर अकेल्ला नई हे। कोनो ओकरो संग देवइया हे।
            गुड़ीचौरा म बइठका परदेशिया अउ मंगलू के विवाद ल ले के जुरयाये रहय। गाँव पटेल अइसनेच दिन के फिराक म रहय। जेन जतका ओकर सेवा – चाकरी करय ओकरे कोती हो जाये। ये बात ल परदेशिया घलोक जानै। इही कारन ये के ओला गाँव म आये जुम्मा – जुम्मा तीन – चार बरिस होय होही अउ गाँव म अपन मनमानी चलाना शुरु कर दे रिहीस। पटेल किहिस – कस ग मंगलू, तोर का शिकायत हे ?
– मंय हर बरिस खइड़का डांर म अपन कोठार बनात रहेेंव। गये साल मोला परदेशिय अपन धान मिंजे बर मांगिस अउ ये साल खुदे रुंधे लगे हे।
– कहसे परदेशिया …. ?
– पटेल साहेब, पर साल मंय खुद रुंधाय रहेंव। जब रुंधवायेंव त ओ जगह ह परिया परे रिहीस।
            जम्मों गाँव जानत रहय – मंगलू हर साल उही जघा म कोठार बनात आवत हे। पर परदेशिया के गोठ ल सुनके कोनो विरोध करे बर तियार नई होइस त पटेल किहिस – कइसे मंगलू, अब तोर क कहिना हे ?
सुन के सुमेर के तन – बदन म आगी फूंकगे। उठीस। कहिस – पटेल साहब, ये गाँव म जनम ले तहूं रहत आवत हस अउ महूं। जेन बात ल मंय जानत हंव तहूं जानत हस। मंगलू च काबर ओकर ददा घलोक  उही ठीहा म कोठार बनावत रिहीस हे।
           पटेल चुप रिहीस। गाँव के परलोखिय उठिस। किहिस – समेर, तंय लुप ले काबर गोठियाये ल उठे हस जी। पटेल हर तो मंगलू ले जुवाप मांगे हे। ओला बोलन दे।
– परलोखिया तंय झन भुला, तोरो ऊपर इही परदेशिया काली राज कर सकत हे।
            बइठका जघा म बहस बढ़ते गीस। सुमरे ल दबाये के प्रयास पूरा गाँव भर करे लगीस पर आज तो सुमेर घर ले पागी बांध के निकले रिहीस के मंगलू नियावं देवा के रहही। संगे – संगे गाँव भर के बंद आँखी ल खोलही ? किहिस – आज तुम पूरा गाँव जेन परदेशिया के संग देवथौ कल तुहीं मन रोहू अउ मोर बात ल सुरता करहू।
            मंगलू ल लगीस। सुमेर के कहे से गाँव के सियान मन बुरा मानही। ओकर बनत काम बिगड़ जाही। ओहर सभा म उठगे, हाथ जोड़ कहिस – समेर से कहे म कुछू गलती हो गीस होही त मंय माफी मांगत हंव। पर सच इही ये – मोर कोठार म जबरवाली परदेशिया रुंधना रुंधत हे।
            सुमेर ल मंगलू पर गुस्सा अइस। किहिस – मंगलू इंहा मंय सच बात कहत हंव अउ तंय माफी मांगत हस। हमर इही नम्रता – सादगी अउ समरपन के कारण बाहरी व्यक्ति हमर ऊपर हावी होथे। अंगरी धर के मुड़ म चढ़ जाथे। अब समे वो नई कि सच बर नियाय हो। अन्यायी राज अउ न्यायी सजा भोगथे। तोर नम्रता, सादगी अउ समरपन तोला न्याय नइ देवा सके। परलोखिया डहर मुंहू करके समारु किहिस – अउ तंय बिसरगे रे परलोखिया, जब दू हजार दे के तोर से इही परदेशिया पांच हजार वसूल लीस। रोवत – गावत तंय मोर कर आय रेहेस।
             गाँव वाले मन के अब आँखी खुले लगीस। मदन बड़ हिम्मत कर के उठीस किहिस – समारु, सच कहत हे। ये परदेशिया धीरे – धीरे सह सब ल मुड़त हवय।
            ये वो मदन रिहीस जउन ल एक थपरा कोनो दे दे वे त दूसरा गाल ल घलोक आगू कर दे पर गाल बजाना उचित नइ समझे। मुंहू लुकवा के सभा म बोलई का होइस, बइठका म जुरायाये गाँव वाले मन के मुंहू खुले लगीस। परदेशिया ल अब समझत देरी नई लगीस कि पासा उल्टा परत हे। अपन बात जोंगे बर कहे लगीस – पर साल जइसे मंय कोठार रुंधे रहेंव यहू साल रुंधात भर हंव। मंय मंगलू ल उहां फसल मिंजे – ओसाये बर मना थोरे करत हंव।
– पर के जघा म तंय कोन अधिकार से रुंधना – बंधना करबे। मंगलू के जघा ये मंगलू ओमा रुंधे चाहे परिया छोड़े तोला का …।
            गाँव के लोगन जाग चुके रिहीस। बइठका म खुसूर – पुसूर होइस अउ ये बात कोनो गाँव वाले कहि दिस। अब जम्मों गाँव परदेशिया से खतरा महसूस करे लगीस। सब ओकर विरोध म होय लगीस। परदेशिया के दू हजार खा के भी पटेल ल निरनय देय ल परीस – परदेशिया, तंय अपन हद म रह। हमन इहां पले – बढ़े हन। देखत आवत हन नानपन ले। जउन ठीहा ल तंय हथियाना चाहत हस उहां मंगलू के ददा – बबा कोठार रुंधत आवत हे। कोठार ल मंगलू रुंधही अउ ऐकर निर्णय उही लिही कि ओहर तोला उहां तोर फसल ल रखन देही या नहीं ?
– पर पटेल … ?
            परदेशिया कुछू कहना चाहीस पर गाँव के चिहुर म ओकर बोली बचन समागे। जउन परदेशिया सोचे रिहीस – धीरे धीरे गाँव भर राज करे के ओकर ठिकाना नई रहिगे …।
            ये जीत सिर्फ मंगलू के जीत नई रिहीस। गाँव भर के जीत रिहीस। सुमेर अपन मुंछ ल अइठत अपन घर अइस। ओकर मुस्कात चेहरा ल देखके गुणवंती किहिस – तुम्हर चेहरा ल देखके तो अइसे लगत हे जानो तुम रण ले बाजी मार के अवात हो … ?
            सुमेर कुछू नइ किहिस। ठाड़े खटिया ल धम्म ले गिरइस अउ ओमा बइठगे। एक हाथ म मूंछा अइठत लगीस अउ दूसर हाथ म जांघा ल ठठावत गुणवंती ल किहिस – चल, मोर बर जेवन निकाल ….।

देखावा

सुरेश सर्वेद

अकरसहा पानी गिरे लगिस। रामधन फिकर- मगन होगे। ओला समझ नई आवत रिहीस के अब का करे? जेन बइला गाड़ी म ओ बइठे रिहीस ओमा चाउर भराय रहय। ओहर फंसे ओ जघा रिहीस जिहां दुरिहा – दुरिहा ले कोन्हों गांव दिखत नई रिहीस। कोन्हों गांव के तीर म फंसे रिहीतिस त ऊंहा थिरवाव कर सकत रिहीस। छइहां देख के चाऊंर ल भींगे ले बचा सकत रिहीस पर इहां तो दुरिहा – दुरिहा ल सिरिफ खेते – खेत रिहीस। बइला मन गाड़ा ल खींचना चाहत रिहीन पर पानी के बूंद बड़े – बड़े रिहीस ऊपर ले आंधी धूंधी उठे रिहीस। बइला मन गाड़ा ल खींच नई पात रिहीन। रामधन अपन आप ल बचाए बर पंछा ल मुड़ म डारे रिहीस पर ऊहूं भींग गे। अउ पानी ओकर मुड़ ल भींगाये लगिस। रद्दा मं एक पेड़ मिलीस। बइला मन ऊही मेर रुक गे। रामधन ल घलोक ऐ जघा मुड़ बचाय के लइक लगीस।  ओहर गाड़ा के खाल्हे आ के खुसरगे अउ पानी रुके के रद्दा जोहे लगीस।
          पानी सोसन भर गिरके धीरे – धीरे रुके लगीस। रामधन गाड़ा के खाल्हे ने निकलिस। ओहर देखिस – चाऊंर भराय बोरा मन भींग गे हे। ओहर एक ठन बोरा ल खोल के देखिस – चाऊंर घलोक भींग गे रिहीस। रामधन ल अब अपन भींगे के नई, चांऊर भींगे के फिकर सताये लगीस।
          रामधन फिकर म एकर सेती बूढ़गे काबर के ओहर एक नौकर रिहीस। ओहर गौंटिया के घर नौकरी करय। गौटिया के नाव दो दयाराम रिहीस पर ओकर करम दया धर्म ले दुरिहा के रिहीस। ओकर ले एक पांव आगर ओकर सुवारी रिहीस। नाव तो ओकरो कलयानी रिहीस पर कलयान का होथे ऊहू ल ओहर नई जानय। ओमन छुआछूत मानथे या नई ऐला तो कोनो समझ नई पाइन पर अतका लोगन जानत रिहीन के ओकर घर जेन भी जाथे, ओला दुरिहा म बइठे ल परथे। ओकरे ही गांव के आदमी मन काबर, अतराब भर के गांव वाले मन घलक ओकर तीर म बइठे के हिम्मत नई कर पावै। काबर के अतराब भर मं ऊही एक ठन गउंटिया रिहीस जेकर डेरौठी म सब ल झूके ल परे। ओ क्षेत्र आरक्षित क्षेत्र रिहीस। पंच सरपंच आरक्षित कोटा के रहय पर पंचायत ल चलाय गौटियां हर।  गौटियां के इशारा पर पंचायत के काम होवै। अधिकारी – कर्मचारी होवय या नेता मंत्री, सबे गौटियां के घरे म  आवय। चुनाव के समे लोगन ल कंबल, लुगरा, दारु, पइसा मिलय ऊहू ल गांव वाले मन गौटिया के ही मेहरबानी मानय …।
          पानी रुके गे रिहीस। पर गाड़ा ल आघू डहर बढ़ाये के हिम्मत रामधन नई कर पात रिहीस। रामधन बइला मन ल ढिलके पेड़ म बांध दे रिहीस। ओहर फेर गाड़ा तरी आ के बइठ गे।
          रामधन के आंखी के आगू म ओ दिन के घटना दिखे लगीस – रामधन एक कोंटा म बइठे रिहीस। ओहर डोरी आंटत रिहीस। उही बेरा गौटियां के बेटी धोये चाऊंर सुखोये ल जावत रिहीस। ओकर लुगरा के अंचरा रामधन ल छु दीस। बात गौटिया तक पहुंचिस, तब गौटिया गुसियागे। किहीस – तुम छोटे मन ल थोरिक भाव का देथन, मुड़ी म चढ़े बर तियार हो जाथौ। ये चाऊंर अपन घर ले जा, खा लेना। आगू अइसन करबे त ठीक नई होही …।
          ओ दिन तो चाऊंर दू ऐ किलो रिहीस होही। गौटिया सहज म दे दे रिहीस पर आज कई बोरा  म चाऊंर  भराये रिहीस। सबो बोरा के चाऊंर भींगगे थोरिक – थोरिक भींग गे रिहीस। का ऐ चाऊंर ल घलोक मोला गौटिया दे दिही … नई … नई… अइसन नई हो सकै। मोर कमाई मे से काटही। पर मोर साल के कमई भी तो अतका नई होवै, जेमा एक साल म छुटा जाही। … पर मोला तो कमई के मजदूरी नई देही त मोर घर कइसे चलही? कइसे बने होही मोर लइका …?
          रामधन के आंखी के आगू म ओकर लइका के चेहरा किंजरगे – ओहर बीमार रिहीस। कतको उपचार कराये के बाद भी ओकर बीमारी नई जावत रिहीस। रामधन सोचे रिहीस – अब के बार जेन मजदूरी मिलही, ओकर ले लइका के शहर ले ग के इलाज कराहूं। रामधन ल अपन बाई के सुरता आगे जउन मरत समे कहे रिहीस – रघु के ददा, मोर रघु ल खूब लाड़ पियार देहू। कोनो किसम के दुख मत देहू। आज ले तुम ऐकर ददा ही नइ दाई घलोक आवौ … अउ ओकर बाई सुवरग सिधारगे …।
          जब ले रामधन के बाई सुवरग सिधारे रिहीस, तब ले घर के जम्मों जिम्मेदारी राधन के मुड़ म आ गे रिहीस। परिवार – समाज के लोगन मन रामधन ल दूसरा बिहाव करे बर किहीन पर रामधन ककरो बात ल नई मानिस …।
          अभी रामधन बिचार म भटकत रिहीस तभे गांव के एक किसान दीना आइस। कहिस – अरे, रामधन तंय कहां ले आवत हस अउ ऐ मेर काबर गाड़ा ल खड़ा कर दे हस ..?
रामधन गाड़ा तरी ले बाहिर अइस। किहीस – मंय गौटियां के घर के धान कुटाये बर गे रेहेवं दीना। गाड़ा म रखे सबो बोरा के चाउंर भींग गे हे।
– पानी तो छोड़ दे हे फेर काबर इही के इही मेर हस …।
– का बताववं दीना … मोला तो कुछू उमझत नई हे के का करवं …?
– आखिर बात का हे, कुछू तो फुरिहा …?
          रामधन ओ दिन के जम्मों कहानी दीना ल सुना दीस। सुन के दीना हंसे लगीस। दीना ल रामधन बोक बाय देखे लगीस। ओ ल लगीस – दीना घलक ओकर बिबसता के हांसी उड़ावत हे … कहिस – हंसे ले भइया, हसं ले। गरीब मजदूर पर सब ला हांसीच तो आथे।
          दीना हांसी ल रोक के किहीस – मूरख, मंय तोर गरीबी अउ लाचारी पर नई हांसत हवं … मोला तो तोर मुरखता पर हंसी आवत हावै। इहां तोर भाग के तारा खुले हवै अउ तंय रोये धोये ल बइठे हस …?
– भाग के तारा … का कहत हव, मंय समझ नई पावत हवं दीना …।
– तंय एक काम कर … दीना रामधन के कान म कुछू फुसफुसाइस। अब रामधन के समझ म दीना के हंसी के बात आ गे।
          रामधन गाड़ा म बइला म ल फांद के गांव डहर चल परिस। ओहर गाड़ा बइला ल गौटिया के घर न लेग के अपन घर लेगे। अउ अपन घर करा गाड़ा बइला ल ढील के गौटिया के घर रेंगत अइस।
गौटिया घर ले बाहिर आइस। देखिस – रामधन बिना गाड़ा बइला के आय हवै। ओहर रामधन ल पूछिस – रामधन, गाड़ा बइला दिखत नई हे …।
          रामधन रुआंसू होगे। गौटिया हड़बड़ाइस – कहूं गाड़ा ल कोनो लूट लाट तो नइ लीस। अभी जादा दिन होय घलोक नई रिहीस – गांव वाले मन धान कुटा के आवत रिहीन। कुछ लुटेरा मन ऊंनला लुट ले रिहीन। गौटिया हड़बड़ाहट म रामधन ले पूछ बइठिस – रद्दा म कोनो लुट तो ….।
          गौटिया अपन बात ल पूरा करतिस के रामधन किहीस – नइ, अइसन कोनो बात नइ होय हावै।
– फेर गाड़ा बइला कहां हे …?
– मोर घर मेर …।
– काबर ..?
– ओमा रखाये जम्मों बोरा के चाउंर ह भींग गे हे मालिक … मोर ले गलती होगे, मोला क्षिमा देहू …।
– क्षिमा .. कइसे गोठियाथस रामधन …?
– बोरा म भराये चाऊंर भींग गे हे, त ओहा छुआ गे हे गौटिया …।
अब गौटिया के ओठ म मुसकान तयरे लगीस। किहीस – मूरख, कहूं अन्न घलोक छुआथे ?
– पर ओ दिन …।
          अब गौटिया ल सब बात समझ आ गे। किहीस – अच्छा, त तंय ओ दिन के बात ल आज ले धरे हस … ओहर एक कन चाऊंर रिहीस। ये तो गाड़ा भर हे… परलोखिया, मंय तो मजाक करे रहे हव। जा अपन घर अउ गाड़ा बइला ल ले के आ …।
          रामधन अपन घर गीस। बइला गाड़ा ल गौटिया के घर तीर लइस। ओमा रखाय चाऊंर ल निकालिस अउ गौटिया के घर म रख दीस। अब रामधन ल समझ आ गे कि जात – पांत, छूआछूत, भेदभाव सब दिखावा आवै। ये सब उही मेर लागू होथय जिहां आदमी ल जादा नुकसान नइ होवै। जादा नुकसान के संगे संग आदमी के आस्था घलोक डगमग हो जाथे।
          गौटिया के घर भींगे चाऊंर रखत रामधन के ओंठ म मुसकुराहट तैरे लगीस।

गुरुवार, 7 जनवरी 2016

मनहरण भइया

खेत के मेढ़ म पांव धरते ही मनहरण के गुस्सा सातवां आसमान म चढ़गे  खेत के धान फसल उनला बैरी जइसन लगे लगीस। खेत म जिहां - जिहां ओकर नजर दउड़िस, ओकर गुस्सा बाढ़ते गीस। ओहर बखुलागे - सब ल जला देहूं। साले मोला बिजरावत हवै।
सच म कहे जाय त मनहरन ये सब्द गुस्सा के कारन कही दीस। मनहरन किसान रिहीस अउ ओकर मुख्य काम खेती - किसानी के रिहीस। खेती ओकर जीये खाये के साधन रिहीस अउ कोई अपन रोजी - रोटी बर गुस्साही ? पर मनहरन ल गुस्सा आगे रिहीस। क्षीन भर बाद ओकर सोच म बदलाव अइस। ओहर खुदे ल कोसे लगीस - मंय कतेक मूरख आंव। खेत के फसल के ऐमा का दोस। जब पानी च नई रहही त फसल कहां ले हरियाही ? मनहरन अपन मन के भड़ास ल निकाले बर बिधायक - संसद अउ मंत्री मन ल बड़बड़ा के गारी दे डारिस - भिखमंगा मन जइसन आथे साले मन चुनाव के बेरा म ? किसीम - किसीम के लालच देथे। कहिथे - नरवा बनवाबो, तरिया बनवाबो, बांध - बंधिया बनवाबो ... सड़क बनवाबो, स्कूल खोलवाबो, अस्पताल खोलवाबो पर चुनाव जीतिस नई के बिसर जाथे सब के सब बोल बचन ल। परपंची बन गेहे साले मन। माटी ले भी सस्ती होगे हे इंकर मन के जुबान ....।
मनहरन के सोच करवट ले ले रिहीस। जेन फसल मन म ओला गुस्सा आवत रिहीस। अब उंकर ऊपर ओला तरस - दया आय लगे रिहीस। ओकर मन गदगद होगे। ओकर मन रो परिस। अउ आंखी डहर ले आंसू निकले लगीस। दू - तीन आंसू के बूंद उही मेर टपकगे। आंखी के कोर ल गला म डारे पंछा म पोंछ लिस। ओहर खेत भीतर ल देखिस - भुइयां म दरार पर गे रिहीस। धान के फसल अब फसल नइ रही गे रिहीस। फसल पिंवरा होके सुखाय लगे रिहीस। फसल के दुदर्सा देख के ओकर अंतस छटपटागे। अब ओकर से खेत मेढ़ म ठाड़े रहना संभव नइ हो पाइस। ओहर अपन घर डहर लहुट गे।
आषाढ़ के महीना, पानी - बरसात के दिन, पर एकदम उल्टा। पानी के एक बूंद गिरे के नाव नइ लेत रिहीस। मनहरन अपन घर अइस। आते सांठ अपन बाई मालती पर भड़किस, फेर लइका मन ऊपर बरसिस अउ आखिरी म अपने आप पर। मनहरन के बखुलइ ल घर वाले मन समझ गे रिहीन। घर वाले मन के खेर इही म रिहीस के ओमन कलेचुप रहै। ओमन कलेचुप अपन - अपन काम बूता म लग गे। लइका मन किताब कापी निकाल के पढ़े लगिन। मालती चाउंर निमारे लगिस। मनहरन देवाल म संट के रखे खटिया ल धम्म ले जमीन म बिछइस अउ ओमा चीत्ता सुत गे। घर के पूरा वातावरन शांत होगे। अइसन शांति जइसे सूजी गिरे अउ सूना जाये। ओ शांति म कोनो खलल पइदा करत रिहीस त ओहर सूपा के धाप आये जेमा मालती चाउंर निमारत रिहीस।
धरती के लइका मनहरन वइसे तो शांतिप्रिय आदमी रिहीस। ओहर कभू च कभार अशांत हो जावै। जे दिन ओहर अशांत होवै ओ दिन ओकर ले बात करना तो दूरिहा के बात रहय ओकर संग आंखी मिलाय के कोनो हिम्मत नइ कर पावै। ओहर सहय भी बड़ मगर ओतकी सहै जतका सोभा देवय। जहां ओकर सहे के सबर खतम होवै फेर बइहाय मनहरन। ओकर सहनसक्ति ओ बांधा के समान रिहीस जेन अपन पूरा ताकत भर पानी ल थामथे अउ जब सहनसक्ति जवाब दे जाथे तब फूट के तबाही मचा देथे ...।
संझा बेरा रिहीस। चिरई - चुरगुन मन दाना चुग के अपन खोंदरा डहर लहुटे लगिन, दुधारु गाय मन रंभाये लगिन। बछरू मन अपन महतारी लें मिलय बर हड़बड़ाय लगिन। मंदिर म घंटा- घंटी बजे लगिस आरती पूजा होय लगिस। संझा धीरे- धीरे रात के रूप धरे लगिस। जेवन बनगे रिहीस। मालती मनहरण ल खाय बर किहिस। मनहरण खाये बर बइठगे। मनहरण जइसे निवाला खाये बर करिस कि कोटवार के हांक ओकर कान मन सुनाई दीस। मुंह तक पहुंचे निवाला ला रोक ओहर कोटवार के हांक ल सुने लगिस। कोटवार रात म पंचायत जुड़े के हांका लगात राहय।
रात म गांव वाले किसान- वसुंधरा पंचायत के ठउर में सकलागे।
गांव ले दूरिहा मसानघाट रिहीस। उहां गांव के अवारा कुकुर मन भुके लगिन। उंकर आवाज रिकिम- रिकिम के रिहिस हे। एक दूसर के सूर ल दबाय बर ओमन अपन पूरा ताकत ल झोकत रहै। उंकर भुके के लहर गांव तक पहुंचे लगिस।
मनहरण के गांव के रिवाज उटपुटांग रिहिस। जब जब इहां पंचायत जुड़िस। तब तब असली मुद्दा खतम हो जावै। बहस छिड़ै अउ गांव वाले आपस मं झींकातानी करै। गांव बंइसका म ओ दिन अउ जादा गांव वाले मन जुरियाय जब कोई मजेदार बइसका होवै। उंहा गाड़े मनखे ल उखारे। फबति कस के ओकर हंसी उड़ाय जेकर खिलाप पंचायत जुड़े।
पंचायत लगभग जुड़ गे रिहिस। काबर बइसका बलाय गेहे ये ल कोनो नई जानत रिहिस अतका सब जानत रिहिन- बइसका सरपंच बलाय हे। सब जानना चाहत रिहिन कि काबर बलाय हे। सरपंच अइस, अपन अपन बाह कहे लगिस- गांव के भाई हो, आज बइसका ऐकर सेती बलाय गे हे के हमर गांव म पानी के बड़ समसिया हे पानी के। जब- जब पानी नई गिरय हमला खेती करे म बड़ तकलीफ होथे। धान ठाड़े- ठाड़ सूखा जाथे। पैरा तक हमला नई मिल पावय। हम चाहत हन हमरों गांव म पानी के भरपूर बयवस्ता होवै। परोस के गांव मं बांध बने हवै पर हमर गांव के खार म नहर नाली नई होय के कारन हमर खेती ल पानी नई मिल पावय। हम नहर बनवाना चाहत हन। पर नहर बने म कतको के जमीन डूबही। अगर तुम मन अपन डुबान के जमीन दे बर अनाकानी नई करहू त हमला नहर बनाये म अड़चन नई आही।
गांव वाले मन सोचे- विचारे लगिन- ओमन ल सरपंच के बात म अपन हित दिखिस। ओमन सहमत होंगे। सरपंच किहिस- अगर तुम सब सहमत हो त इही बइसका म परस्ताव बना देथन....। परस्ताव बनिस। नहर कते डहर ले निकालना हे एकर निरनय विभाग के रिहीस गांव वाले मन मानगे। गांव वाले के संग पंच मन घलोक सहमत होगे। बइसका उसलगे। गांव वाले मन अपन अपन घर द्वार चल दीन।
ओ परस्ताव के बाद म गांव वाले मन रद्दा जोहन लगिन कि अब का होही। नहर कब ले बनना शुरु होही। एक दिन गांव म खबर फइलगे - जेन डहर ले विभाग नहर बनाये के बिचार राखे रहीस ओ दिसा म उलट फेर कर दे हे। ओहर जेन डहर ले नहर बनाना चाहत रिहीस ओहर डहर ले गांव के मात्र बीस परतिस खेती ल पानी मिलतिस ऊपर ले कई किसान मन के खेती डूबान म आये ले नई बचतिस। गांव मं कानाफूंसी होय लगीस। जेन डहर ले नहर बनाये के उदिम रचे गे रिहीस ओ डहर सिरिफ सरपंच भर ल लाभ रिहीस। खबर मनहरन के कान तक घलोक पहुंचिस। ओहर सरपंच मेर गिस। किहीस - सुने हंव, विभाग नहर बनाये के दिसा ल बदल देहे ...।
- तंय ठउंका सुने हस ...।
- पर अइसन काबर ?
- तंय तो जानत हस। हम मन ह रक्सेल ले भंडार नहर बनाये के परस्ताव भेजे रेहेन। उड़ती - बूड़ती गांव होय के कारन हम नहर ये दिशा म नई चहत रेहेन पर विभाग के कहना हे - रक्सेल ले भंडार नहर बनाये म जंगल के करोड़ों रुपिया के लकड़ी काटे ल परही। जंगल के जमीन नहर के चपेट म आ जाही। ये सुरक्षित जंगल ये। सुरक्षित जंगल ले लकड़ी नई काटे जा सके। दू विभाग म विवाद होही अउ नहर बन नई पाही ...।
- अब का होही सरपंच ... ? मनहरन के मुंहु ले उदास शब्द निकलिस।
- मंय खुद समझ नई पावत हो मनहरन, ऐकरे सेती आज रात म अउ बइसका बलाय हंव ...।
मनहरन सरपंच के घर ले निकल अपन घर आ गे। रात म फेर पंचायत जुरिस।
सरपंच किहीस - तुम सब ला पता चल ही गेहे। विभाग हर नहर बनाये के दिसा बदल देहे मंय जानना चाहत हवं कि अब का करना हे ? का हम मन ल विभाग जइसे जेने दिसा ले चाहे नहर बना ले ऐकर बर हम तियार हो जान। तुमन अपन - अपन बात ल राखव ...।
सरपंच के आगू म मुंहू खोले के हिम्मत गांव वाले का ओमन भी नई कर पात रिहीन जेन पंच मन के भरोसा सरपंच कुर्सी म डंटे रिहीस। ऐही कारन रिहीस के गांव म उही होवै जउन सरपंच चाहे। पर आज तो कोई न कोई ल अपन बात रखना रिहीस काबर के जेन दिसा ले विभाग नहर बनाना चाहत रिहीस ओ दिसा ले गांव वाले के हित तो रिहीस नई उपर ले खेती डूबान म जाना रिहीस। मगर बोले त बोले कोन ? मनहरन देखिस कोनो बोलत नई हे त खुद उठगे। कहिस - गांव वाले भाई, तुमन अगर आज्ञा देवव त मंय अपन बात रखवं।
गांव वाले मन चुप रहिके मनहरन ल बोले के आज्ञा दीन। मनहरन कहे लगीस - आज से दस बरस पहिली के घटना ल कोनों नई बिसरे होही। ओ बरिस घलो अंकाल परे रिहीस। हम तराही - तराही होगे रेहेन। पानी नई मिले के कारन खेत म फसल सुखागे - भुंजागे। हम अपन जानवर ल घलोक नई बचा पायेन। पानी के मोल हमला अपन जमीन ल बेचे ल परिस। रोजी - रोटी के चक्कर म गांव छोड़ना परिस। हम मन तब नहर के मांग करे रेहेन। अउ रक्सेल ले भंडार दिसा म ही नहर बनाये के मांग करे रेहेन जेन ल विभाग मान गे रिहीस। इहां तक ले नहर बने के स्वीकृति घलोक मिलगे रिहीस पर अब उही विभाग सुरक्षित जंगल होय के अटघा लगात हे।
बइसका म सन्नाटा छा गे। पूरा गांव मनहरन के बात ल सुरलगा के कान धरे लगिन। मनहरन आगू किहिस - तुम सब जानत हव जेन दिसा ले हम मन नहर मांगे रेहेन ओ डहर ले नहर बनना शुरु हो गे रिहीस। कुछ दिन बाद नहर बनना बंद होगे अउ बरसात के दिन आगे फेर ओ डहर ककरो धियान नई गिस। बीच म काम काबर रोके गिस गांव वाले तुम मन जानथौ ... तुम मन कोनो नई जानवौ, मंय जानथवं ....।
गांव वाले मन ल कुछू समझ नई आवत रिहीस। पर सरपंच के समझ म सब आगे रिहीस। मनहरन आगू कहे लगीस त सरपंच किहीस - अब बिसरे बात ल करे म का फायदा मनहरन ... ?
- बिसरे बात ल करे म ही फायदा हे सरपंच .... अब आपे बतावव ओ समे भी आप सरपंच रेहेव ...।
- हव ...।
- अब आपे बतावव, नहर बनत - बनत रोक काबर दे गिस .... पहली उही दिसा म नहर बने के सहमति हो गे रिहीस। अब अड़ंगा काबर ?
- जतका के स्वीकृति मिले रिहीस, ओतका के काम कराये गिस, अउ फेर दिसा ल मंय थोरे बदले हंव, वो तो विभाग के काम आवै।
- अउ कतका लबारी मारहू सरपंच साहेब। तुम गांव वाले मन के नई अपन हित देखत हव। गांव वाले मन के जमीन डूबान म जावै अउ तुम्हर खेती ल पानी मिलय एकरे सेती दिसा ल बदले के बात करत हव। पहिली स्वीकृति के अनुसार नहर बनवाये के काबर नई सोचत हव। अउ तुम कहिथौ न कि पइसा खतम होये के कारन काम रोक दे रिहीस। मनहरन गांव वाले मन डहर देख के किहिस - सरपंच के एको बात भरोसा लाइक नई हे मंय आज तुम मन ल सच बतावत हंव, ओ समे भरपूर पइसा नहर बनाये दे रिहीस पर फरजी मस्टररोल म फर्जी दस्तखत करके पइसा खतम कर दे गिस। अउ तुम मन भरोसा नई करहू पर ये सच हे जेन दिसा ले हम नहर बनाये के मांग करे हन ओ दिसा म पहिले ले नहर बनगे हे ...।
गांव वाले मन सकते म आगे। किहिन - तंय कइसे गोठियाथस मनहरन। ओ दिसा म तो नहर नई बने हे ...।
- तुहर कहना गलत नई भई मगर ये लबारी नई हे कि जेन दिसा म हम नहर के मांग करत हन ओ दिसा म नहर कागद म बन गे हे ...।
सरपंच के मुड़ी नविस त नवते चले गिस। ओकर पोल खुलते गिस। गांव वाले मन सरपंच ल घेरे लगीन। कानाफंसी सुरु होगे। गांव वाले मन ल अब सुरता आय लगीस, ओ दिन के बात। पंच मन घलोक सरपंच के खिलाफ होगे। मनहरन किहिस - ये सरपंच कभू हमर हित के नई सोचिस। हम इंन ला पढ़े लिखे हे गांव के उद्धार करही सोचे रेहेन मगर ये सिरफ अउ सिरफ अपने हित देखिस। का हम अब भी ये ला सहिबो ... ?
पूरा गांव सरपंच के बिरोध म आ गे। नारा लगे लगीस - सरपंच मुर्दाबाद ... सरपंच धोखाबाज ... सरपंच ल हटावव ....।
सरपंच उंहा ले खिसके के फिराक म रिहीस पर गांव वाले मन ओला खिसकन नई दीन। सचिव घलोक बइसका म रिहीस। सब पंच तो ओकर विरोध म आ ही गे रिहीन। बइसका म ही परस्ताव तियार होगे - सरपंच ल हटाये के ... सबो पंच मन दस्तखत कर दीन अउ परस्ताव शासन ल भेज दीन ....।
कुछ दिन बाद गांव म एक नारा अउ गूंजे लगीस - मनहरन भइया ...।
- जिन्दाबाद ...।
- गांव के नेता कइसन हो ...।
- मनहरन भइया जइसन हो ...।
एकरे संग गांव जाग गे।
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मतलाहा पानी


गाँव म जब ले राजनीति अपन पांव धरिस। गाँव के गाँव जम्मों निर्दयी अउ निष्ठुर होगे। लोक लाज के बात बिसर गे। सुवारथ अउ पाखण्ड अपन अउकात म आ गे। समारु ल राजनीति ले का लेना - देना पर गांव वाले मन ओकर बिगाड़ करे के निश्चय कर ले रहै। दू पारा के लड़ई म ओल पेराय लगीस। सरपंची चुनाव म जेन रामधीन चुनइस उहू समारु ल बदमाश कहाय अउ जउन मंगल हारिस उहू ओला बदमास कहय। समारु के परिवार मं रहय छै सदस्य छै बोट ले जीतिस रामधीन अउ छै बोट ले हारिस मंगल। मंगल के कहना रहय ये सबो वोट रामधीन ल मिलिस अउ रामधीन के कहना रहय ये छै बोट दीवान के परिवार के आय।
दीवान, दीवान रहिस। राजनीति के पक्का खेलइया। कभू ए डहर कभू ओ डहर। जेन तरफ परला भारी रहय उही म समा जाय। दीवान के चरितर ल सब जाने पर ओकर मेर बोले के अउ आदमी ल पटाया के अतेक गुन रहय के अपनेच बात ल सच कहवाय ले नइ चुके। सही सही बात तो इही रहिस के समारु के परिवार के जम्मों बोट रामधीन ल गे रिहीस अउ दीवान के परिवार के बोट चुनाई म हारे मंगल ल गे रिहीस। पर दीवान एक डहर रामधीन ल कहाय मंय मोर परिवार समेत तोला बोट दे हंव तब तंय जीत पाय अउ दूसर डहर रामधीन ल कहाय मोर घर के जम्मों वोट गिस तो हे पर का करबे तोला समारु के परिवार के वोट नई मिल पाइस तेकर सेती तंय हार गेस।
दूनों पारा के बीच म रहय समारु के घर बारी। जीते रामधीन पंचाइत म बइठते ही परस्ताव लाइस के जेकर जेकर घर दुआर अतिक्रमण म बने हवय ओला तोड़ना हे। ऐकर साथ मंगल घलो दे लगिस। काबर के दूनों के दुश्मन बने रहय समारु। अउ गांव भर म ककरो घर दुआर अतिक्रमण के चपेट म आये केसंभावना बने त ओ रहय समारु के घर दुआर। माथा पीट लीस समारु। कोन - कोन ल समझाय के ओहा जीतइया ल बोट दे हे। कलेचुप रहय अउ मन - मन फिकर म जरत रहय। जब ले पंचाइत म अतिक्रमण तोड़े के बात चले लगिस तब ले समारु ल अपन उजाड़ दिखे लगीस। मेहनत - मजदूरी करके परिवार के पेट पोसने वाला करे त करे का। काकर - काकर संग लड़े। गाँव भर के लोगन सरपंच के पक्ष म। समारु ल पंचाइत म बलाये गिस। समारु एक कोंटा म जा के बइठ गे। सरपंच किहिस - समारु, तंय अतिक्रमण करके घर बनाये अउ बारी रुंधे हस। तोला बारी के रुंधना अउ घर दुआर ल तोड़े ल परही।
- मंय कते मेर अतिक्रमण करे हंव। मंय तो उही ठीहा म घर बनाय हंव जेन ल पहले के सरपंच ह मोला दे हे। रहिस बात बारी के त आधा म मकान बनाय हंव अउ आधा म बारी हे।
- सब के तो परचा पट्टा हे, तोर काबर नइ हे। परचा पट्टा नइ हे मतलब तोर घर दुआर अउ बारी अतिक्रमण म बने हे।
- बीस बरिस होगे रहत। अब तुम्मन ल अतिक्रमण लगत हे। ये नियाव नई हे सरपंच साहेब।
- बीस बच्छर म चार चुनई आगे। अलग - अलग सरपंच बइठगे पर तंय काबर परचा - पट्टा नइ बनवाय।
- अर्जी तो देय रहेव। नइ बनिस त मंय का करंव। कहू त अर्जी तहूं मन ले दे देहू।
- जइसे तोर मर्जी बोट बर चलिस वइसने मर्जी तंय अभू चलाना चाहत हस। जब जेन ल मन आय बोट दे दे अउ जब मन आये अर्जी दे दे।
- कसम किरिया खाके कहत हंव मंय अर्जी देय रहेवं अउ बोट घला आपेच ल दे रहेवं।
- हम तोर बात ल नइ पतियावंन।
- सही सही होथे, तुम्मन मानो के मत मानो।
- तोला अपन घर दुआर तोड़े ल परही। ये मोर निरनय नई हे। ये निरनय पंचायत के आवय। गाँव वाले मन के आवय।
समारु समझ गे ओकर सुनने वाला कोनो नइ हे। ओहर उठिस अउ अपन घर कोती आगे। बुधयारिन ओकर लुगई चांउर ल तोसकत रहय। अंगना म धम्मा ले ठाड़े खटिया ल गिरइस अउ ओमा बइठ गे। समारु के तेवर ल समझत बुधयारिन ल देरी नइ लगिस। पूछीस - का होइस पंचाइत म ...।
- का होही, मोर घर बारी ल तोड़े बर सब किरिया खा ले हे।
- तुमन कुछू नइ केहेव।
- कोनो सुने त न, पंचायइती राज आय। पंचायइत म जउन निरनय होगे उही आखिरी आय। चाहे ओहर तिनका भर सच भले मत हो।
- कब टुटही ...।
अब समारु रकबकागे। कहिस - तंय तो अइसे पूछत हस मानो तहूं पंचाइत के डहर हस। कइसे टुटजाही मोर घर दुआर। बीस बच्छर ले रहत आवत हंव।
कलेचुप होगे बुधियारिन। जानत रहिस। समारु सुधवा बर सुधवा हे अउ कहूं अपन म आ गे त ककरो नइ सुने। नाक के फुलगी म गुस्सा फनफनाथे अउ का करत हे तेकरो सुध नइ रहय। कलेचुप ओहर चाउर निमारे लगिस। समारु अब चुप बइठे म अपन अहित समझे लगीस पर करे ता करे का। ओला सुरता अईस मनसा। ननपन के संगवारी। परोसी गांव म जा के बस गे रिहीस। समारु मुड़ भर के लउठी ल धरे पहुंच गे मंनशा मेर। मंसा ननपन के संगवारी ल देख के बड़ खुश होइस। दूनों संगवारी गले लग के मिलिन। उंकर आंखी म आंसू आ गे। प्रेम के आंसू, अपनपन के आंसू, बहुत दिन बाद मिले के आंसू। मंसा किहिस - सब बने बने तो हे न समारु।
समारु ओकर ले अलग होवत किहिस - क बताव मंनसा। तहीं बने करे जउन मोर गांव ल छोड़ के आ गे।
- तोला तोर गाँव म का तकलीफ होगे।
- राजनीति , कुटनीति हावी होगे हे। आदमी के पहिचान आदमी नई कर पावत हे। भाई - भाई दुश्मन बनगे हे। मोर घर बारी ल टोरे के पंचाइत म निरनय होगे हे। नानकुन झोपड़ी बनाय हंव। लोगन मन के महल अटारी हे। मोर आंखी ककरो घर बारी म नई गड़े मोर झोपड़ी म जम्मों गांव वाले मन के आंखी गढ़ गे हे।
- अइसन काबर .... ?
- सरपंच कहिथे, चुनई के बेरा मंय उनला वोट नई दे हंव। हरोंडा मंगल कहिथे तंय वोट नई देस तेकर सेती मोर हार होइस।
- वोट तो स्वतंत्र निरनय हे। फेर येमा तोर झोपड़ी तोड़े के बात काबर।
- लोगन मन कहन लगे हे, मोर झोपड़ी बारी के पट्टा नई हे। जेन - जेन सरपंच बइठिन उनला अर्जी देंय। मोर परचा - पट्टा नई बनाइन त मंय का करवं। अब कहत हे ... मोर कर परचा पट्टा नई हे। अतिक्रमण म मंय निरमान करे हंव। बीस साल ले अंधरा मन ल नई दिखीस। अब दिखत हे।
मनसा ल सारी बात समझ आ गे। वोहर मुड़ भर लउठी ल देख के किहिस - कब टुटही तोर झोपड़ी ... ?
समारु अचरज म पड़गे। सोच के आय रिहीस - ओकर नानपन के संगवारी ओकर आंसू ल पोंछही। ओला सांत्वना देही पर इंही तो उही पूछे लगे रिहीस के कब टूटही तोर झोपड़ी । अचरज म मनसा डहर ल ओ देखे लगिस। मंनसा के सिरफ मुंह म ही नहीं आंखी ल घलोक हंसी दिखे लगीस। समारु के लउठी ल एक टक देख के किहिस - तोर मेर तो बड़ बड़े चीज हे अउ तंय डर्रावत हस ...।
आगू डहर मनसा कुछू कहितिस ओकर ले पहिली समारु ल समझ आगे। ओहर किहिस - मंय समझ गेंव संगवारी .. मंय समझ गेंव ...। अब मंय अपन ठउर लहुट हंव।
जब अपन गांव ले समारु चले रिहीस त निराश रिहीस। मन म पीरा अउ तन म सुस्त पन रिहीस। पर संगवारी घर ले लहुटत ओर मन म आशा, तन म जोस रिहीस। ओहर अपन गांव पहुंचिस। रद्दा म दीवान दिख गे। समारु अपन मेछाा ल जोर दार अइठिस। लउठी ल धरती म ठोकिस। समारु के रुद्ररुप ल देख के दीवान के सिट्टी पिटटी गुम होगे। समारु जे परकार के अपन रुप ल देखाय रिहीस। ओमा आक्रोश रिहीस। समारु दीवान ल टेरवा के देखत अपन घर मोहाटी म पहुंचिस अउ जोर - जोर से एक हाथ म धरे लउठी ल भुइंया म पटके अउ दूसर हाथ म मूंछ ल अइठत कहे लगीस - कोन माइ के लाल हे जउन मोर झोपड़ी ल टोरही ... आवव देखहूं तुम्हर राजनीति ल ...।
गांव के एक कान ले दूसर कान बात पहुंचिस। गांव के लोगन माजरा देखे खातिर समारु के घर कोती अइन। समारु के मइंता अउ भड़कते गिस। ओहर जोर - जोर से लउठी ल पटके लगीस। मेछा ल अइठ अइठ के ठाड़ कर डरिस। ओकर रौद्ररुप ल देख के गांव वाले मन के रुंआ कांपे लगीस। जउने मांजरा देखे ल अइस ओला लगीस - समारु के लउठी ओकरे मुड़ म गिरे बर तियार हे ...। सरपंच के कान तक बात पहुंचिस तब तक समारु के तेवर सातवां आसमान म चढ़गे रिहीस। सरपंच आरो ले असन समारु के घर कोती अइस। ओकर संग चार लंगुरुवा रिहीन। सरपंच ल देख के समारु किहिस - कइसे सरपंच, मोर झोपड़ी ल टोरे खातिर आय हस ?
सरपंच चुप .. ओकर एक चमचा किहिस - समय आही त तोला कहे ल नई परही टूट जाही तोर झोपड़ी ...।
समारु अपन पूरा औकात म आगे। जोरदार लउठी ल भुइंया म पटक। मूंछ ल अइठिस अउ थूंक दीस। समारु के अइसन रुप गांव म कभू कोनो नई देखे रिहीन। सिधवा ले महा सिधवा रिहीस समारु पर इहां तो आज ओकर अलगे रुप रिहीस। सरपंच ल समझत देरी नई लगीस। ओहर अपन चम्मच मन ल किहिस - चलो, जल्दी टरो इंहा ले ...।
संसकीत तो सबो के सबो होगे। ओमन लहुटे लगीन। समारु पूरा ताकत के साथ चिल्ला के किहिस - मोर झोपड़ी टोरे ल आय के पहिले अपन मुड़ म पागा बांध लेना ... मतलाहा पानी हवय ओला मंय साफ करहूं। अउ जोर दार फेर एक बार मुड़ भर के लउठी ल भुंइया म पटकीस ...।
जउन दिन ल ओ घटना घटिस। ककरो मुंह ले ये सुने ल नइ मिलीस के समारु अतिक्रमण म झोपड़ी बनाय हवै ....।