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शुक्रवार, 3 मार्च 2017

तसमई

सुरेश सर्वेद
     - माँ, मुझे तसमई खाना है। पुत्र की माँग सुनकर माँ असमंजस में पड़ गई। पुत्र की माँग ऐसी थी जिसकी पूर्ति चाहकर भी कर पाना माँ के लिए संभव नहीं था। गरीबी उस परिवार पर इतनी मेहरबान थी कि दो समय का भोजन मिल जाये इतना ही पर्याप्त था। अतिरिक्त व्यय की स्थिति जब भी पैदा हुई उसके लिए उसे बहुत ही मेहनत करनी पड़ी। अतिरिक्त व्यय की व्यवस्था के लिए तो उसे समय मिल जाया करता था पर यहाँ तो तत्कालिक व्यवस्था करने जैसी माँग पुत्र ने रखी थी।
     माँ दो - तीन घरों में झाड़ू - बर्तन कर जीविका चलाती थी। अभाग्रस्त जीवन इतना व्याप्त था कि रुखी - सूखी खाकर पेट भरना होता था। पुत्र ने कभी कोई चीज की माँग नहीं की थी। माँ, पुत्र की माँग को कुचलना नहीं चाहती थी। उसने पुत्र को आश्वस्त किया - हाँ बेटा, आज शाम को तसमई बनाऊंगी। चटकारे लेकर पेटभर खाना।
     माँ की विवशता - लाचारी पुत्र से छिपी नहीं थी। वह भलीभांति जानता था कि उसने जो माँग माँ से रखी है, उसकी पूर्ति कर पाना माँ के लिए संभव नहीं। इसके लिए दूध - शक्कर आवश्कता होती है। माँ जुगाड़ करेगी भी तो कैसे ? कहाँ से ?
     संध्या का बेला था। माँ ने चूल्हा फंूकी। चांवल को एक पपीली में धोकर चढ़ा दी। बालक माँ की क्रिया देख रहा था। माँ कुछ - कुछ परेशान दिख रही थी। आग की आंच से चांवल उबलने लगा। वह पककर उफनने लगा। माँ का ध्यान बंटा हुआ था। पुत्र समझ रहा था - पुत्र और शक्कर नहीं भिड़ा पाने की माँ की पीड़ा। पुत्र ने करछुली ले ली। उसने माँ की पीड़ा को भीतर तक अनुभव किया। उसने करछुली चांवल पर चलाते हुए माँ का ध्यान अपनी ओर खींचा। कहा - माँ, तसमई का चांवल उफनने लगा है। देखो, कितना गाढ़ा दूध है। उफान से दूध गिर जायेगा। आग की तपन कम करो।
     माँ का भटका मन वापस आया। उसने आग को कम करने चूल्हे से जलती लकड़ी खींची। पुत्र के हाथ से करछुली ली और चांवल पर चलाने लगी। माँ आश्चर्य में थी। वह समझ नहीं पा रही थी कि उसने जब पतीली में पानी और चांवल के अतिरिक्त कुछ नहीं डाला है पर पुत्र को उसमें दूध डलने की अनुभूति कैसी हुई। पुत्र ने माँ की दूविधा को पकड़  लिया। उसने कहा - देखो न माँ, दूध कितना गाढ़ा हो गया है। माँ आश्चर्य घोर आश्चर्य में करछुली चलायी जा रही थी। चांवल लगभग पक चुका था। माँ ने उसमें नमक डाला। पुत्र यह जाकर भी कि माँ ने नमक डाला है, कहा - माँ, अधिक शक्कर मत डालो। ज्यादा मीठी हो गई तो तसमई गले से नीचे नहीं उतरेगी।
     माँ समझ गई कि पुत्र चांवल की पसिया को दूध एवं सफेद महीन नमक को शक्कर मान रहा है। वह गदगद हुई जा रही थी।
     अब तसमई बनकर तैयार थी। उसने पुत्र को एक थाली में परोसी। पुत्र चटकारे लेकर तसमई खाने लगा। उसने कहा - र्मा, तसमई बहुत ही मीठी और लजिज है। दूध का स्वाद भी बहुत ही स्वादिष्ट है। आप भी खाइये न?
     माँ भी एक थाली में ले ली। वह भी खाने लगी। माँ ने कहा - हाँ बेटा, तसमई बहुत ही स्वादिष्ट बनी है।
     माँ और पुत्र दोनों जान रहे थे कि वे खिचड़ी खा रहे हैं पर उस खिचड़ी में तसमई के स्वाद की अनुभूति दोनों कर रहे थे। दोनों में संतुष्टि इतनी थी कि उन्हें लगा ही नहीं कि वे खिचड़ी खा रहे हैं ....।

बुधवार, 13 जुलाई 2016

साधु और कंजूस

कहने को तो वह सेठ था.उसकीसम्पत्ति कितनी थी इसका भी उसे पूरा ज्ञान नहीं था पर कंजूसी की पराकाþा वह पार कर गया था इसलिए लोग उसे कंजूस के नाम से ही पुकारा करते थे.उसे चंदा मांगने वालों या अन्य  प्रकार के दान मांगने वालो का सदैव भय  लगा रहता अत: वह भोजन करने बैठता तो भी दरवाजा बंद कर देता था ताकि जो भी आये दरवाजा बंद देख बिना कुछ लिए लौट जाये.एक दिन वह दरवाजा बंद करना भूल गया.अभी वह भोजन का पहला निवाला उठाया था कि एक साधु आ धमका.साधू ने कहा - बेटा,मैं भूखा हूं.मुझे एक  रोटी दे दो...।
कंजूस भोजन कर ना छोड़ उठ खड़ा हुआ.कहा- य हां तो मेरे लाय क ही भोजन है.मैं आपको कहां से भोजन कराऊंगा.आप किसी के द्वार जाइये.
साधू वहीं पर अडिग खड़ा हो गया.कंजूस समझ गया कि य ह कुछ लिए बगैर नहीं जायेगा.उसने कहा- तो ठीक है मैं आपको आधी रोटी ही दे सकता हूं.
 - नहीं ,मुझे तो एक रोटी चाहिए...। साधु ने कहा.
कंजूस ने एक रोटी देने से इंकार दिया और साधु ने आधी रोटी लेने से.कंजूस ने भोजन किया और अपने व्य पार के लिए निकल पड़ा.शाम को लौटा तो देखा- साधू उसके दरवाजे पर ही बैठा है.कंजूस ने एक रोटी साधू की ओर बढ़ाते हुए कहा - लो बाबा,आप एक ही रोटी ले  लो पर य हां से च ले जाइये.
- अब एक रोटी से काम नहीं च लेगा.अब तो मुझे दो रोटियां चाहिए यिोंकि भोजन का दूसरा समय  है. साधू ने कहा.
- एक रोटी लेनी है तो ...। कंजूस ने कहा.
न ही कंजूस ने रोटी दी और नहीं साधु ने एक रोटी ली.कंजूस खाया-पीया और दरवाजा भिड़ा कर सो गया.प्रात: उठा तो देखा - साधू अब तक दरवाजे से हटे नहीं हैंअब तो कंजूस घबरा गया- य दि य ह भूखा य हां मर गया तो मैं अनावश्य क फंस जाऊंगा.उसने साधू को दो रोटियां देनी चाही पर साधू ने कहा- य ह तो भोजन का तीसरा समय  है.अब तीन रोटी दोगे तभी काम बनेगा.
पूवर् की ही प्रक्रिया दोहरायी गयी अथार्त्ा न ही कंजूस ने तीन रोटियां दी और नहीं साधू ने दो रोटियां ली.इसी तरह चार दिन बीत गये.साधु चार दिनों से भूखे रहे.वे मरने लाय क दिखने लगे कंजूस घबरा गया.उसने हाथ जोड़ते हुए कहा- बाबा,आपको जितनी रोटियां चाहिए आप लेलो पर य हां से च ले जाओ.
- अब तो रोटी से काम नहीं च लेगा बेटा,य हां से तब मैं जाऊंगा जबकि तुम मेरे लिए कुंआ खुदवाओगे.
- ये आप यिा कह रहे  है.आपको मालूम है कुंआखुदवाने में कितना खच र् आता है.मैं य ह नहीं कर सकता.
- तो ठीक है...जब तक तुम मेरी कह नही मानोगे मैं य हां से हटने वाला नहीं. साधू ने कहा.
कंजूस फिर अपने काम पर च ला गया.आज कंजूस का मन काम पर नहीं लग रहा था.उसका तो दिल दिमाग साधू पर अटक गया था वह बीच  में ही घर लौट आया.उसने कहा- बाबा,आप रोटियां खालो.मैं आपके लिए एक कुंआ खुदवा दूंगा.
- नहीं बेटा,अब तो तुम्हें दो कुंआ खुदवाने पड़ेगे.एक मेरे नाम से एक तुम्हारे नाम से...।  
कंजूस साधू की शतर् अस्वीकार देना चाहा मगर तभी उसनेसोचा- य दि मैंने साधू की बात नहीं मानी तो वे कुंए की संख्या बढ़ते जायेंगे.भलाई इसी में है कि मुझे साधू की बात स्वीकार लेनी चाहिए.उसने साधू की बात स्वीकार ली.कंजूस दो कुंआ खुदवाने तैयार हो गया.कुछ दिनों बाद दोनो कुंए खुद गये तो साधू ने कहा- मैं एक वषर् बाद फिर लौटूंगा तब मेरे कुंए का पानी तुम्हारे कुंए के पानी से कम रहा तो मैं तीसरा कुंआ खुदवा लूंगा.इतना कह कर साधू च ला गया.कंजूस ने सोचा- साधू जिद्दी है.मुझे एक काम करना चाहिए.मैं अपना कुंआ खुला छोड़ देता हूं.साधू के कुंए को बंद कर देता हूं.लोग मेरे कुंए से पानी भरेंगे और साधू का कुंआ सुरक्षित रहेगा.इससे निश्च य  हीमेरे कुंए का पानी कम होगा और साधू के कुंए का पानीज्यों की त्यों रहेगा. कंजूस ने ऐसा ही किया.
एक वषर् बाद साधू पुन: आया.उसे देख साधू ने गवर् से कहा- आप अपने कुंए और मेरे कुंए के पानी को नाप लीजिए.मेरेे कुंए में आपके कुंए से कम पानी है.
साधू कंजूस के साथ कुंए के पास गये.कहा- च लो नापो....।
कंजूस ने दोनो कुंए का पानी नापा.नाप होते ही कंजूस हड़बड़ा गया.उसे साधू की शतर् याद आयी.उसने कहा-मुझसे आप जो भी सौंगध लेनाचाहें ले सकते हैं.मैंने आपके कुंए का पानी किसी को निकालने नहीं दिया.जबकि मेरे कुंए से लोग रोज कई गुंडी पानी ले गए.मैं समझ नहीं पा रहा हूं इसके बावजूद मेरे कुंए में यिों अधिक पानी है और आपके कुंए में कम...।
साधू मुस्काया.कहा- थोड़ी गहराई से सोचो,तुम्हें सब समझ आ जायेगा.
कंजूस सोच ने लगा- सोच ते- सोच ते आखिरउसने उत्तर पा ही लिया.कहा- मुझे सब समझ आ गया....।
- यिा...? साधू ने पूछा.
- मैं आपके कुंए को बंद रखा.उसमें से एक बूंद भी पानी किसी को निकालने नहीं दिया.फिर भी उसका पानी घट गया जबकि मैंने अपने कुंए को खुला छोड़ दिया और प्रतिदिन सैंकड़ों गुंडी पानी निकाला गया पर भी मेरे कुंए में आपके कुंए से ज्यादा पानी है.अथार्त दान करने से धन नहीं घटता अपितु तिजोरी बंद रखने से घट जाता है.आपने मेरी ज्ञानच क्षु खोल दी.
उस दिन से कंजूस को लोग दानी के नाम से पुकारने लगे.   साधू और कंजूस

सोमवार, 7 मार्च 2016

और बारिस हो गई

सुरेश सर्वेद




     एक गांव में एक साधु आया। उसने घोषणा की कि आगामी दस वर्षों तक पानी नहीं गिरेगा। क्षेत्र में सूखा रहेगा। पानी नहीं गिरने से फसल नहीं होगी। ग्रामीण सकते में आ गये। वास्‍तव में बरसात के दिन होने के बाद भी पानी नहीं गिर रहा था। ग्रामीणों ने अपना हल अपने घर में ही रख दिया। और रोजी रोटी के लिए कहीं जाने की योजना बनाने लगे।
     एक किसान का बच्‍चा कागज का नाव बनाने लगा। बच्‍चे को कागज का नाव बनाते देख किसान ने कहा - बेटा, जब पानी ही नहीं गिरेगा तो यह नाव बनाकर क्‍या करेगा। किसान के बच्‍चा ने कहा - पिता जी, दस वर्ष बहुत लम्‍बा समय होता है। इतने दिनों तक मैं कागज का नाव बनना छोड़ दूंगा तो मैं नाव बनाना ही भूल जाउंगा।
     किसान ने सोचा - लड़का ठीक कहता है, वास्‍तव में दस वर्ष लम्‍बा समय होता है। इस अवधि में मैं हल नहीं चलाया तो हल चलाना भूल जाउंगा। उस किसान ने घर में रखे हल को निकाल खेत की ओर जाने लगा। ग्रामीणों ने देखा तो उसे पागल कहने लगा। तब उसने वही बात कही जो उसके बच्‍चा ने उससे कहा था। ग्रामीण सोचने लगे - इसका कहना सच है, हमें भी खेत जाना चाहिए।
     एक एक कर सभी किसान अपनी खेत की ओर हल बैल लेकर जाने लगे।
     इतने में बादल ने सोचा सच में दस वर्ष लम्‍बा समय होता है। यदि मैं छाना भूल गया तो, बदली छाने लगी। बिजली ने सोचा - यदि मैं चमकने भूल गयी तो। बिजली चमकने लगी, गर्जना ने सोचा यदि मैं गरजना भूल गया तो, वह गरजने लगा। वर्षा ने सोचा यदि मैं बरसना भूल गयी तो और जो से बारिस होने लगी। किसान वर्षा होते देख खुशी से नाच उठे।